देश एवं दुनिया में बढ़ते रसायनों के प्रयोग से उत्पादित होने वाले कृषि-उत्पादों की लोकप्रियता में कमी आने लगी है । हरित क्रांति एवं रसायनों के प्रयोग से देश में खाद्यान्नों का उत्पादन तो बढ़ गया है लेकिन शरीर में रसायनों से होने वाले नुकसान और जमीन का बंजर होना बढ़ गया है । विगत कुछ वर्षों में देश के कई कृषि वैज्ञानिक एवं किसानों ने जैविक खेती को बढ़ावा दिया है । आज हम एक ऐसे कृषि वैज्ञानिक की बात कर रहे है जिन्हे कृषि का ऋषि और पदम् श्री पुरुस्कार जैसे सम्मान मिल चुके है । जिन्होंने अपना पूरा जीवन जीरो बजट खेती (Zero Budget Farming) के लिए समर्पित कर दिया है । हम बात कर रहे है महाराष्ट्र के अमरावती जिले के बेलोरा निवासी किसान वैज्ञानिक एवं गांधीवादी सुभाष पालेकर ( Subhash Palekar ) की ।

जीरो बजट खेती यानी ‘हींग लगे न फिटकरी रंग भी आए चोखा’। ऐसी खेती जिसमें सब कुछ प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। इस तरह की खेती में कीटनाशक, रासायनिक खाद और हाईब्रिड बीज किसी भी आधुनिक उपाय का इस्तेमाल नहीं होता है। यह खेती पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। इस तकनीक में किसान भरपूर फसल उगाकर लाभ कमा रहे हैं, इसीलिए इसे जीरो बजट खेती का नाम दिया गया है।

सुभाष पालेकर का जन्म वर्ष 1949 में भारत में महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में बेलोरा नाम के एक छोटे से गांव में हुआ। उन्होंने नागपुर से कृषि विषय में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। कॉलेज की शिक्षा के दौरान वह सातपुड़ा आदिवासी क्षेत्र में जाकर उनकी समस्याओं के बारे में आदिवासियों के साथ काम किया। पढार्इ के बाद वर्ष 1972 में वह अपने पिता के साथ कृषि करने लगे।उनके पिता एक किसान थे, लेकिन कॉलेज में रासायनिक कृषि सीखने के बाद, श्री पालेकरजी ने अपनी कृषि में रासायनिक कृषि करना शुरू कि‍या। वर्ष 1972-1990 से अभ्यास करते समय वह मीडिया में इस वि‍षय पर लेख भी लिखते थे।

जीरो बजट फार्मिंग तकनीक से सुभाष सैकंडों किसानों को आर्थिक मजबूती प्रदान कर चुके हैं।  वह पिछले 38 साल से नेचुरल फार्मिंग के लिए एक आंदोलन चला रहे हैं। पालेकर के मार्गदर्शन में महाराष्ट्र  राज्य के साथ ही देश के लाखों किसान अब तक प्राकृतिक खेती का नि:शुल्क प्रशिक्षण हासिल कर चुके हैं। उन्होंने ‘जीरो बजट’ खेती की सोच से खेती की दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है।

वर्ष 1996-98 से उन्हें पुणे, महाराष्ट्र से एक प्रसिद्ध होने वाले ‘बलीराजा’ मराठी कृषि पत्रिका की संपादकीय टीम में शामिल किया गया लेकिन, आंदोलन की गति को बढ़ाने के लिए, वर्ष 1998 में उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने कृषि‍ के बारे में मराठी में 20, अंग्रेजी में 4 और हिन्दी में 3 पुस्तकें लिखी। मराठी में लिखी गई पुस्तकों का सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया जा रहा हैं।

Training_zero_budget
सुभाष पालेकर जी के ट्रेनिंग सेशन का उद्घाटन करते हुए आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू | Image Source

उनके आंदोलन ने मीडिया के जरिए राजनेता, किसानों का ग्रामीण अर्थव्यवस्था की वास्तविक समस्याओं के प्रति ध्यान आकर्षित किया। वे मानते हैं, अब शून्य बजट प्राकृतिक (आध्‍यात्‍मि‍क) कृषि के अलावा किसानों की आत्महत्याओं को रोकने का और कोई विकल्प नहीं है। उनका यह भी विश्वास है कि इंसान को जहरमुक्त भोजन उपलब्ध करने का एक ही तरीका है, शून्य बजट प्राकृतिक (आध्‍यात्‍मि‍क) कृषि

पालेकर बेहद शास्र संगत तरीके से किसानों को रासायनिक खाद के इस्तेमाल के खतरों और प्राकृतिक खेती के फायदों की जानकारी देते हैं। इसलिए इन्हे कृषि का ऋषि भी कहा जाता है । पुरातन संस्कृति एवं ज्ञान से इन्होने कृषि के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन करने का बीड़ा उठाया है । आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जिस वक्त भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार दिए जाने की घोषणा कि तब सुभाष पालेकर जी आंध्रप्रदेश के काकीनाड़ा में किसानों को जीरो बजट खेती के बारे में प्रशिक्षण देने में व्यस्त थे।

पालेकर के चार कृषि सिद्धांतों ने किसानों को आर्थिक मजबूती प्रदान की है। उनकी राय में संकरित अनाज में पौष्टिकता, स्वाद, सुगंध, प्रतिरोधात्मक शक्ति और टिकाऊपन नहीं होता।इसलिए यह अनाज खाने वाला कुपोषण का शिकार होता है और उसका शरीर अनेक रोगों का घर बनकर रह जाता है। साथ ही यह संकरित प्रजातियां कभी भी देसी प्रजातियों की तुलना में ज्यादा शुद्ध लाभ भी नहीं देती, इसलिए उन्होंने गांव-गांव जाकर हाईब्रिड फसल का बहिष्कार कर प्राकृतिक खेती की अलख जगाई।

सुभाष पालेकर के मुताबिक फसलों की सिंचाई यह पूरी तरह से मानवीय सोच है। कोई भी फसल मूलत: सिंचाई से नहीं होती। अगर ऐसा होता तो पहाड़ों पर भरी गर्मी में हरियाली नहीं होती। जंगल तैयार ही नहीं होते। फलों से लदे पेड़ जिंदा ही नहीं रहते। बारिश के पानी को पूरी तरह से जमीन में ही समाहित करके खेत में एक आर्द्रता चक्र (ह्यूमिडिटी साइकिल) तैयार किया जा सकता है जिसमें बिना सिंचाई ही भौगोलिक परिस्थिति व बारिश के मुताबिक खेती की जा सकती है।

सुभाष पालेकर ने जिस तकनीक को ईजाद किया है जिसमें खेतीबाड़ी के लिए आवश्यक पदार्थ सब कुछ प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर होता है। इस तरह की खेती में कीटनाशक, रासायनिक खाद और हाईब्रिड बीज किसी भी आधुनिक उपाय का इस्तेमाल नहीं होता है। इस तकनीक में किसान भरपूर फसल उगाकर लाभ कमा रहे हैं, इसीलिए इसे जीरो बजट खेती का नाम दिया गया है।

इसमें रासायनिक खाद के स्थान पर देशी खाद जिसका नाम ‘घन जीवा अमृत’ का इस्तेमाल होता है। यह खाद गाय के गोबर, गौमूत्र, चने के बेसन, गुड़, मिट्टी तथा पानी से बनती है। इसे तैयार करने वाले सुभाष ही हैं। इस खाद से फसल को कीड़ा नहीं लगता है।  जीरो बजट खेती में खेतों की सिंचाई, मड़ाई और जुताई का सारा काम बैलों की मदद से किया जाता है। इसमें किसी भी प्रकार के डीजल या ईधन से चलने वाले संसाधनों का प्रयोग नहीं होता है जिससे काफी बचत होती है।

वह रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर नीम, गोबर और गौमूत्र से बना ‘नीमास्त्र’ इस्तेमाल करते हैं। इससे फसल को कीड़ा नहीं लगता है। संकर प्रजाति के बीजों के स्थान पर देशी बीज डालते हैं। देशी बीज चूँकि हमारे खेतों की पुरानी फसल के ही होते हैं इसलिए हमें उसके लिए पैसे नहीं खर्च करने पड़ते हैं जबकि हाईब्रिड बीज हमें बाजार से खरीदने पड़ते हैं जो काफी महँगे होते हैं।

jiwamrita-palekar
प्राकृतिक खाद एवं कीटनाशक बनाकर दिखाते हुए सुभाष पालेकर जी | Image Source

भारत के महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, गुजरात राज्यों के 30 लाख किसान शून्य बजट प्राकृतिक (आध्‍यात्‍मि‍क) कृषि कर रहे हैं। कर्नाटक राज्य ने उन्हें वर्ष 2005 में, एक क्रांतिकारी संत बसवराज के नाम पर दिया जाने वाला पुरस्कार श्री मृग राजेन्द्र मठ, चित्रदुर्ग द्वारा “बसवश्री” पुरस्‍कार से सम्मानित किया था, जिसमें 1 लाख रुपये व प्रशस्ति दिया गया। वर्ष 2007 में उन्हें श्री रामचद्रपुरमठ, शिमोगा कर्नाटक द्वारा भारतीय पशु संवर्धन के लिए ‘गोपाल गौरव पुरस्कार‘ भी प्रदान किया गया था। उन्हें वर्ष 2016 का भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘पद्म श्री‘ से सम्मानित किया गया है।

Be Positive, सुभाष पालेकर (Subhash Palekar) जी के कृषि क्षेत्र में दिए गए अमूल्य योगदान को सलाम करता है और उम्मीद करता है कि देश के किसानों को उनकी खेती तकनीक से जरूर फायदा होगा । सुभाष पालेकर जी के बारे में अधिक जानकारी के लिए उनकी वेबसाइट भी विजिट कर सकते है ।

Comments

comments