पर्यावरण संकट की जब बात आती है तो सबसे पहले देश की प्रदूषित नदियों, पानी के लिए होते झगड़ों, निरंतर घटते भूजल स्तर के कारण होने वाली तकलीफों की ही तस्वीर सामने आती है। पर्यावरण और पानी के संरक्षण को लेकर कितनी सजग है सरकार और जनता? क्या देश भीषण जल संकट के मुहाने पर खड़ा है? स्वच्छता अभियान से कितनी सुधरेगी देश की नदियों की सूरत और क्या विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी हैं?

पेशे से आयुर्वेद के चिकित्सक राजेन्द्र सिंह  ने राजस्थान में 1980 के दशक में पानी को लेकर काम करना शुरू किया था। शुरूआत में इस मुहिम में वह अकेले थे, लेकिन फिर गांव के लोग जुड़ने लगे और तरूण भारत संघ बना। जल संचय पर काम बढ़ता गया। इसके बाद गांव-गांव में जोहड़ बनने लगे और बंजर धरती पर हरी फसलें लहलहाने लगी। अब तक जल संचय के लिए करीब साढ़े छह हजार जोहड़ों का निर्माण हो चुका है और राजस्थान के करीब 1000 गांवों में फिर से पानी उपलब्ध हो गया। दुनियाभर के लोगों ने उनके इस काम काम को सराहा।

राजेन्द्र सिंह का जन्म 6 अगस्त 1959 को, उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के डौला गाँव में हुआ था । उनके पिता एक किसान थे और उनके पास एक एकड़ की जमीन पर खेती की व्यवस्था थी, जहाँ वह गन्ना, धान तथा गेहूँ आदि फसलें उगाते थे । राजेन्द्र का बचपन वहीं खेतों में पशुओं के साथ खेलने-कूदने में बीता । हाई स्कूल पास करने के बाद राजेन्द्र ने बागपत उत्तरप्रदेश में स्थित भारतीय ऋषिकुल आयुर्वेदिक महाविद्यालय से आयुर्विज्ञान में डिग्री हासिल की ।

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बच्चों को पर्यावरण सरंक्षण का पाठ पढ़ते हुए राजेंद्र सिंह | Image Source

उसके बाद राजेन्द्र सिंह ने जनता की सेवा के भाव से गाँव में प्रेक्टिस करने का इरादा किया । साथ ही उन्हें जयप्रकाश नारायण की पुकार पर राजनीति का जोश चढ़ा और वे छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के साथ जुड़ गए । छात्र बनने के लिए उन्होंने बड़ौत में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सम्बद्ध एक कॉलेज में एम.ए. हिन्दी में प्रवेश ले लिया ।

एम.ए. करते ही उनको 1980 में सरकारी नौकरी मिल गई, जिसने उन्हें नैशनल सर्विस वालिंटियर फॉर एजुकेशन बना कर जयपुर भेज दिया । वहाँ इन्हें राजस्थान के दौसा जिले में प्रौढ़ शिक्षा का प्रोजेक्ट दिया गया । राजस्थान की स्थिति से वह धीरे-धीरे परेशान भी हो रहे थे, पानी का संकट उन्हें चुनौती दे रहा था ।

1981 में ही, जब उनका विवाह हुए बस डेढ़ बरस हुआ था, उन्होंने नौकरी छोड़ी, घर का सारा सामान बेचा । कुल तेईस हजार रुपए की पूँजी लेकर अपने कार्यक्षेत्र में उतर गए । उन्होंने ठान लिया कि वह पानी की समस्या का कुछ हल निकलेंगे । आठ हजार रुपये बैंक में डालकर शेष पैसा उनके हाथ में इस काम के लिए था ।

राजेन्द्र सिंह के साथ चार और साथी आ जुटे थे, यह थे नरेन्द्र, सतेन्द्र, केदार तथा हनुमान । इन पाँचों लोगों ने तरुण भारत संघ के नाम से एक संस्था बनाई जिसे एक गैर-सरकारी संगठन (एन.जी.ओ) का रूप दिया । दरअसल यह संस्था 1978 में जयपुर यूनिवर्सिटी द्वारा बनाई गई थी, उस समय इसको लेकर ज्यादा काम नहीं हुआ ।

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तरुण भारत संघ का कार्यालय | Image Source

तरुण भारत संघ का अभियान शुरू करने लिए 2 अक्टूबर 1985 को राजेन्द्र सिंह और उनके साथी अलवर जिले के किशोरपुर गाँव में आ गए, जो कि कस्बे थाना गाजी से बीस किलोमीटर दूर था । किशोरपुर में तरुण भारत संघ ने ठिकाना तो बनाया लेकिन उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या किया जाना चाहिए ।

यहाँ से तरुण भारत संघ का दोहरा संघर्ष शुरू हुआ । एक तो उन्हें गाँव वालों का विश्वास जीतना था जिन्हें इस बात पर पूरा यकीन नहीं आ रहा था कि ये लोग अच्छी-भली नौकरी छोड्‌कर पागलों की तरह यहाँ चले आए हैं, दूसरे उन्हें अभी वह तय करना था कि क्या करने से समस्या का हल पाया जा सकता है । इन्हें जो कुछ भी सीखना था, इन्हीं अनपढ़ से दिखने वाले गाँव वालों से सीखना था । इसमें भी साथियों का थोड़ा अहं भाव आड़े आता था । लेकिन राजेन्द्र सिंह इस बात के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थे कि वह कुछ-न-कुछ राह जरूर खोजेंगे ।

गाँव वालों से विमर्श करके तथा देश के अन्य इलाकों की स्थिति से जानकारी लेकर यह हल सामने आया कि कुएँ तथा जोहड़ों को फिर से जिन्दा किया जाए । पुराने जोहड़ मुद्दतों से सूखे पड़े थे और तरुण भारत संघ के इन पाँच लोगों में से किसी को भी कुएँ की खुदाई के बारे में कुछ पता नहीं था । इस असमंजस में उन्हें एक वृद्ध गाँव वाले ने ज्ञान दिया । उसने कहा ”कुआँ खोदने के लिए कोई इंजीनियर नहीं चाहिए, केवल हौसले की जरूरत है ।” इस काम में इन्होंने गाँव के मंगू लाल पटेल को साथी बनाया और काम की शुरुआत के लिए गोपालपुरा गाँव चुना गया ।

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नदियों को सरंक्षित रखने के लिए रैली का आयोजन करते हुए राजेंद्र सिंह | Image Source

शुरुआती कदम के रूप में बरसात के पानी को धरती के जलस्तर को रिचार्ज करने के लिए व्यवस्था करनी थी । बारिश का पानी जमीन से बह कर फैल न जाए इसके लिए बाड़ बनाकर जमीन पर पानी को रोका गया । पहला जोहड़ बनाने के लिए ठिकाना चुना गया मानोटा कोयाला । ग्राम सभा बुलाकर तय किया कि इस काम में पूरे गाँव की मदद लेनी होगी । इस में हर घर के लिए जिम्मेदारी तय की गई । यह भी समझाया गया कि जोहड़ बन जाने के बाद उसकी मरम्मत-सफाई कैसे करनी होगी, ताकि वह उपयोगी बनी रही ।

6 मार्च 1987 को मानोटा कोयाला जोहड़ का काम शुरू हुआ । अपने उद्यम से गाँव वालों ने देखा कि जोहड़ में पानी आ गया । इसी काम के साथ-साथ दूसरे नए जोहड़ों के लिए जगह तय की गई ।

पहले जोहड़ के काम सफल होने से गाँव में उत्साह का संचार हुआ । उस गाँव में कभी अरवारी नदी हुआ करती थी । तरुण भारत संघ ने कल्पना की कि वह नदी फिर से वहाँ बहने लगेगी । उसके पहले जरूरत इस बात की थी कि बारिश के पानी की एक-एक बूँद धरती के लिए भीतर जाए । इसके लिए बारिश के पानी को रोकने के लिए बाँध बनाने की व्यवस्था हुई । सबसे बड़ा बाँध 244 मीटर लम्बा तथा सात मीटर ऊँचा बनाया गया ताकि, पानी धरती के भीतर नीचे तक पहुँचने के पहले बह न जाए ।

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राजेंद्र सिंह के प्रयास से मृत:प्राय नदी भी बहने लगी | Image Source

1995 में एक-एक कदम की मेहनत तथा बूँद-बूँद पानी के बचाव से अरवारी नदी ने बहाव ले लिया । इसके बाद तो चार और ऐसी ही धाराएँ उस इलाके में फिर से जिन्दा होकर बहने लगीं । इस क्रान्ति का असर दूसरे दूर के गाँवों तक भी पहुँचा । हमीरपुर गाँव में जब्बर सागर की धारा अब बहती है और उसमें नावें चलती हैं तथा मछली पालन होता है ।

जब राजेन्द्र सिंह तथा उनके साथी आज की प्रगति को देखते हैं तो उन्हें वह अविस्मरणीय दिन जरूर याद आता है । जब ये लोग पहले किशोरीपुर गाँव पहुँचे थे, तब गाँव वालों ने इन्हें आतंकवादी समझकर पकड़ लिया था । कुछ दिन पहले रेडियो से यह खबर आई थी कि कुछ आतंकवादी पंजाब से राजस्थान में घुसे हैं । पकड़े जाने पर इनका कोई विश्वास कैसे करता । बस इन्हें पहले तो एक मन्दिर में बन्द कर दिया गया । खैर किसी की पहचान पर ये छूटे लेकिन इनकी कुछ कर गुजरने की जिद नहीं छूटी । उसी जिद का नतीजा है कि आज राजस्थान का यह क्षेत्र सूखे से मुक्त हो कर नया जीवन जी रहा है ।

वर्ष 2001 में सिंह को एशिया का नोबेल माने जाने वाले रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से नवाजा गया। वर्ष 2008 में गार्डियन ने उन्हें 50 ऎसे लोगों की सूची में शामिल किया था जो पृथ्वी को बचा सकते हैं। सिंह ने 2012 में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण से यह कहते हुए किनारा कर लिया था कि सरकार की गंगा के पुनरूद्धार में कोई दिलचस्पी नहीं है।

जलपुरूष के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह को 26 अगस्त 2016 को पानी का नोबेल पुरस्कार माने जाने वाले स्टॉकहोम वाटर प्राइज से सम्मानित किया । स्वीडन के राजा कार्ल सोलहवें गुस्ताव स्टॉकहोम सिटी हॉल में सिंह को यह पुरस्कार प्रदान किया । पुरस्कार के तहत एक लाख 50 हजार डॉलर और एक विशेष कलाकृति दी जाती है।

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