आमतौर पर रेडियो और टीवी को मनोरंजन का साधन समझा जाता है, लेकिन अगर इस माध्यम को शिक्षा के साथ जोड़ दिया जाये तो नतीजे चौंकाने वाले भी हो सकते हैं। ऐसा ही कुछ हुआ है उत्तर प्रदेश(Uttar Pradesh) के कानपुर (Kanpur) देहात इलाके में। यहां पर वक्त की आवाज (Waqt ki Awaz) नाम के एक सामुदायिक रेडियो स्टेशन ने अपने को सरकारी स्कूलों के साथ क्या जोड़ा, वहां के बच्चे पढ़ाई में पहले के मुकाबले ज्यादा होशियार और तेज तर्रार हो गये हैं।

इतना ही नहीं ये रेडियो स्टेशन अपने कार्यक्रमों के जरिये घर की चारदीवारी में कैद महिलाओं को बाहर निकालने में जुटा है। गांव में रहने वाली यहां की महिलायें रेडियो के जरिये ना सिर्फ अपनी बात रखना सीख गई हैं, बल्कि गीतों के जरिये लोगों के सामने अपनी खुशी और अपने जज्बात रखना भी जान गई हैं।

राधा शुक्ला, जिनके हाथों में ‘वक्त की आवाज’ नाम से इस सामुदायिक रेडियो स्टेशन की कमान है, उनका मानना है कि ‘वक्त की आवाज’ के कारण यहां पर कई बदलाव देखने को मिले हैं। फिर चाहे वो बदलाव शिक्षा के क्षेत्र में हो या सामाजिक क्षेत्र में। तभी तो ‘वक्त की आवाज’ के कार्यक्रम लोगों की नब्ज को अच्छी तरह पहचानते हैं।

‘वक्त की आवाज’  32 सरकारी स्कूलों के साथ मिलकर काम कर रहा है। इसके तहत ‘सोचो और खेलो’ कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है। इस कार्यक्रम में सरकारी स्कूलों के टीचरों को भी जोड़ा गया है। कार्यक्रम में खासतौर से गणित, अंग्रेजी और इंग्लिश जैसे विषयों पर खास ध्यान दिया जाता है। ये कार्यक्रम पांचवीं क्लास से लेकर 8वीं क्लास तक बच्चों के लिये होता है। इसके तहत स्कूली बच्चों से हर विषय के मुताबिक प्रश्न पूछे जाते हैं। इसके लिए टीचर को वक्त दिया जाता है कि वो बच्चों को इस प्रतियोगिता की तैयारी पहले से करा कर रखें।

इसके बाद ‘वक्त की आवाज’ की टीम उस स्कूल में जाती है बच्चों से सवाल जवाब करती है। तीन राउंड की इस प्रतियोगिता में जो बच्चा सवालों के जवाब नहीं दे पाता उसे सजा के तौर पर कहानी, चुटुकला या कोई गीत सुनाना होता है। ऐसे में बच्चों का ज्ञान तो बढ़ता ही है साथ ही उनमें इतना हौसला आता है कि वो अपनी बात दूसरे बच्चों के सामने रख सकें।

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wakt ki aawaz के रिले सेण्टर का विहंगम दृश्य | Image Source

इस कार्यक्रम का असर ये हुआ कि अब सरकारी स्कूलों में बच्चों के साथ साथ टीचर भी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देने लगे, क्योंकि उनके स्कूल के बच्चों का ये कार्यक्रम रेडियो पर प्रसारित होता है। इसलिए ये उनकी प्रतिष्ठा का सवाल भी हो जाता है। इस कार्यक्रम की सफलता को देखते हुए सरकारी स्कूलों के अलावा 5-6 दूसरे प्राइवेट स्कूल भी इस कार्यक्रम के साथ जुड़े हुए हैं।

सामाजिक संस्था ‘श्रमिक भारती’ की ओर से चलाया जा रहा ‘वक्त की आवाज’ सामुदायिक रेडियो स्टेशन सितंबर, 2013 से चल रहा है। श्रमिक भारती के साथ राधा शुक्ला पिछले 19 सालों से जुड़ी हैं। इस दौरान इन्होंने सामाजिक कार्यों से जुड़े अलग अलग प्रोजेक्ट पर काम किया।

धीरे-धीरे संस्था ने महसूस किया कि लोगों तक अपनी बात को प्रभावी ढंग से पहुचाने के लिये कम्यूनिटी रेडियो शुरू करना चाहिए। जिसके बाद साल 2009 में एक प्रोजेक्ट के तौर पर राधा शुक्ला के ऊपर इसे शुरू करने की जिम्मेदारी दी गई।

राधा शुक्ला के मुताबिक, ये पहली बार था कि मुझे इस तरह का कोई प्रोजेक्ट शुरू करने को कहा गया था, इसलिए मैं काफी डरी हुई थी। असल में इस तरह के काम का मेरे पास कोई अनुभव नहीं था। मैं अब तक संस्था में रिसर्च करने के अलावा मॉडल तैयार करने के साथ-साथ लोगों को ट्रेनिंग देने का काम करती थी। लेकिन मैंने हिम्मत जुटाई और कानपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर मेथा ब्लॉक के बैरी दरियांव गांव के 15 लोगों को वालंटियर के तौर पर अपने साथ जोड़ा। इन वालंटियर में कोई अच्छा गाने वाले वाला, कोई अच्छा लिखने वाला था, तो कोई बोलचाल से लोगों को प्रभावित करने वाला था।

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wakt ki aawaz के प्रोग्राम सुनते ग्रामीण | Image Source

इस तरह एक टीम बनाने के बाद राधा शुक्ला ने कम्यूनिटी रोडियो शुरू करने से पहले नेरो कास्टिंग सेवा को शुरू किया। इसके तहत उन्होंने एक एमपी3 प्लेयर और स्पीकर खरीदा। इसके बाद वो समाज के अलग अलग वर्ग के लोगों के कार्यक्रम तैयार कर उनके बीच पहुंच कर उस कार्यक्रम को सुनाती थी। इस दौरान वो लोगों को एक फीडबैक फॉर्म भी देती थी ताकि ये पता चल सके कि उनको किस तरह के कार्यक्रम पसंद आ रहे हैं? क्या नहीं आ रहा है? राधा और उनकी टीम ने लगातार तीन साल तक आसपास के कई गांव में नेरो कास्टिंग सेवा जारी रखी।

इसका फायदा ये हुआ कि लोग ये समझने लगे की रोडियो उनके लिये कितना जरूरी है। इसके बाद श्रमिक भारती संस्था को 1 सिंतबर 2013 को कम्यूनिटी रेडियो चलाने का लाइसेंस मिला तो राधा शुक्ला के ऊपर और ज्यादा जिम्मेदारी आ गई। इस जिम्मेदारी को राधा और उनके सहयोगियों ने बखूबी निभाया। इस तरह वक्त की आवाज तब से अब तक रोज 8 घंटे अपने कार्यक्रम प्रसारित करता है।

आज इनके पास 8 हजार लोकगीतों का संग्रह हैं। ‘वक्त की आवाज’ को कानपुर शहर और उनके आसपास के पांच ब्लॉक में सुना जाता है। इनमें से एक मैथा ब्लॉक भी है जहां से ये रेडियो स्टेशन चल रहा है। अकेले मैथा ब्लॉक में 72 पंचायत के दो सौ गांव हैं। साथ ही कानपुर शहर के दो ब्लॉक और कानपुर देहात के दो ब्लॉक इसमें शामिल हैं। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि करीब 3 लाख लोग इस रेडियो स्टेशन के श्रोता हैं।

‘वक्त की आवाज’ का प्रसारण दिन में तीन बार होता है। पहला प्रसारण सुबह 6 बजे से 9 बजे तक, दूसरा प्रसारण दोपहर 12 बजे से 2 बजे तक और दिन का तीसरा और अंतिम प्रसारण शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक होता है।

‘वक्त की आवाज’ में भोर भई, गांव की बात, हमारा अन्नदाता, लोटम-लोट, अक्कड़-बक्कड़, सिंहासन बत्तीसी, चटकारा जैसे कई कार्यक्रमों के अलावा स्वास्थ्य, स्वच्छता, कृषि, पर्यावरण और दूसरे मुद्दों पर कई धारावाहिकों का प्रसारण किया जाता है। इस रेडियो स्टेशन में महिलाओं के लिए खास कार्यक्रम ‘गांव की गठरिया’ खासा चर्चित है। इस कार्यक्रम में त्योहारों में गाये जाने वाले गीत सावन, कजरी, आला, फाग को स्थानीय महिलाएं गाती हैं। इसके अलावा तीज त्योहार के मौके पर गाये जाने वाले गीत भी इस कार्यक्रम में खूब सुनाये जाते हैं।

राधा शुक्ला के मुताबिक हमने महसूस किया था कि किसी भी कार्यक्रम में पुरूषों के मुकाबले महिलाओं की हिस्सेदारी कम होती थी, जबकि गांव की महिलाओं के अपने गीत होते हैं। उनकी बातें होती हैं। जिनके बारे में दुनिया को जानना चाहिए। गीत ही हैं जिनके जरिये वो अपने जज़्बात ज़ाहिर कर सकती हैं, किसी को उलाहना दे सकती है। इसके बाद हमने ऐसी महिलाओं के गीत रिकॉर्ड करने शुरू किये जो अच्छा गाती थीं।

इसका असर ये हुआ कि चारदीवारी तक सीमित महिलाएं अब बाहर आने लगीं। राधा शुक्ला की इन्हीं कोशिशों के कारण उनको लाडली मीडिया अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।

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