राजस्थान अपनी बहुरंगी वस्त्र परम्परा के लिए प्राचीन काल से विख्यात रहा है। यहां के वस्त्र-वैभव का उल्लेख अनेक मध्यकालीन ग्रन्थों में हुआ है और विश्व के कई संग्रहालयों में यहां के रंगे-छपे वस्त्र आज भी सुरक्षित हैं। यहां की पीली मरुभूमि और पीले प्रकाश में समरसता के प्रतिरोध में रंग-बिरंगी वेशभूषा की विशेषता हमेशा पहचान पाती रही रही है।राजस्थान के परम्परागत वस्त्र रंगाई एवं छपाई के कुटिर उद्योग में सांगानेर, बगरु, कोटा तथा बीकानेर के साथ ही दक्षिणी राजस्थान के आकोला का नाम भी विश्व में अपनी पहचान बनाए हुए है।

राजस्थान की पुरानी रियासत मेवाड का एक छोटा सा कस्बा है आकोला, जहां की पारम्परिक दाबु और बंधेज कला आज राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी कलागत पहचान बना चुकी है। इस गांव की सांस्कृतिक पहचान ही यहां की छीपा जाति के लोगों ने अपनी इस दाबू प्रिंट नामक कलाकारी से प्रदान की है। इस जाति की पारम्परिक हस्तकला की विविध छटाएं हम इस गांव की दैनिक जिंदगी में देख सकते हैं। केवल इतना ही नहीं, वस्त्रों के अनुरुप रंगों का सामंजस्य बिठाकर वंशानुगत सूझबूझ और कला कौशल के कारण इस गांव का नाम ही छीपों का आकोला पड़ गया।

गोपाल छीपा जो कि दाबु कला के अच्छे कामगार है एक बातचीत में कहते हैं कि कुछ सौ वर्षो पूर्व मेवाड़ की राठौड़ा रानी ने बड़च नदी के किनारे छीपा जाति के व्यक्तियों को बसाया था। वर्तमान में यहां छीपा जाति के लगभग 200 से अधिक परिवार बसे हुए है जिनमें से आधे परिवार इस पुश्तैनी व्यवसाय से जुडे हुए हैं।

लगभग 14,000 की आबादी वाले इस गांव में वस्त्र छपाई के कामगारों के सामाजिक आर्थिक परिवेश को भी हमें ध्यान में रखना होगा। अधिकांश कामगार मध्यम एवं निम्न आय वर्ग से वास्ता रखने वाले हैं। 220 छीपा परिवारों में से मात्र 5-6 परिवार ही अपना स्वयं का प्रतिष्ठान स्थापित करने में सफल हो पाये हैं जिसमें सुरेश हेण्डप्रिंट, बरगद हेण्डप्रिंट, अनिल हेण्डप्रिेट, गोविन्द हेण्डप्रिंट, शिवओम हेण्डप्रिंट एवं गोपाल हेण्डप्रिंट कुछ चयनित नाम हैं।

जानेमाने दाबू प्रिंट के कारीगर भेरुलाल छीपा के अनुसार वर्षों पूर्व उनके पूर्वज यहां इस वस्त्र छपाई उद्योग के लिए बसाए गए बाद में इस धंधे से उन्हें भी लगाव हो गया था और वे इस काम को आगे बढाते हुए वर्तमान समय की मांग के अनुसार अपनी मेधा से अभिनव प्रयोग भी करते रहते हैं।

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दब्बू प्रिंटिंग से डिज़ाइनर कपडे तैयार करती महिला कारीगर | Source : Design Raaga

छपाई कला के एक और युवा और सक्रीय कारीगर सुरेश कुमार छीपा के अनुसार दाबु का हिन्दी में अर्थ दबाना होता है। दबाने की इस प्रक्रिया में एक मिश्रित पेस्ट का प्रयोग होता है जिसमें चूना, गोंद, गुड़, तेल, गेंहू एवं काली मिट्टी को कुण्डे में मिलाया जाता है साथ ही आकोला की पहचान यहां के इंडिगो रंग से है जो लगभग गहरा नीला होता है।

वस्त्र रंगाई छपाई उद्योग से जुडे सभी व्यवसायी ये मानते है कि इंडिगो की जो प्रिंटिंग आकोला में उभरती है वो विश्व में अपनी अलग पहचान रखने वाली साबित हुयी है। ये यहां की प्राकृतिक विशेषता ही है जो अपने प्राकृतिक रंगी की बदौलत आकोला को अलग पहचान दिलाती है।

आकोला रंगाई छपाई के कामगार रंगोें का प्रयोग भी प्रकृति के अनुरुप ही करते हैं। यही कारण है कि आकोला का नाम आज भी इको फ्रेडली छपाई से जुडा हुआ है। ये सभी रंग प्रकृति से प्राप्त होते है जैसे गुड़, अनार की छाल, सकुड़, केसुला, हरड़ा, हर सिंगार, गोंद, कोचा हल्दी, मजीठा, कत्था, रतनजोत, लोहे की जंग, मिट्टी, गोबर, मुल्तानी, खाखरे के पत्ते, छाबड़ी के पत्ते तथा गेरु आदी वनस्पति रंगों के साथ फिटकरी, सोड़ा, सास्टिक, एलिजर, इंडिगो तथा नेफ्थोल का प्रयोग भी किया जाता है।

कामगारों का मानना है कि इस हुनर में वो ही व्यक्ति जगह बना पाता है जिसको रंग की प्राकृतिक सामग्री, उसके द्वारा रंग निर्माण तथा रंगों का संयोजन का तजुर्बा हो। ये सभी रंग वे हैं जो आदमी के स्वास्थ्य पर प्रतिकुल प्रभाव नहीं डालते है। इस प्राकृतिक रंग संयोग के कारण ही आकोला ने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर ली है क्योंकि यहां की छपाई में जितनी रंगीनी है, उतनी अन्य प्रदेशों में नहीं दिखती है।

आकोला में वस्त्र छपाई उद्योग की एक महत्वपूर्ण विशेषता है इस इलाके का फेंट्या। फेंट्या आकोला के आस-पास के ग्रामीण क्षेत्र की कृषक जातियों की स्त्रियों द्वारा पहने जाने वाला अधोवस्त्र है। जिसे आम बोलचाल में घाघरा कहा जाता है।इन जातियों में जाट, गायरी, माली, रेगर जातियां ख़ास है। फेंट्ये की लम्बाई अमूमन छ से बारह मीटर के बीच में होती है। मुख्यतः इसके दोनों किनारों पर बार्डर एवं बूटे होते हैं। यह लहंगे के स्थान पर पहना जाता है तथा लट्ठे के कपड़े पर इसकी रंगाई एवं छपाई होती है।

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फेट्या के निर्माण की चरणबद्ध विधि | Source : Gaatha.com

फेंट्ये की छपाई मुख्य रुप से पांच चरणों में होती है। पहले चरण में कामगार बाजार से खरिदे गये सफेद रंग के सूती वस्त्र (लट्ठे) को बिना साबुन एवं बिना डिटर्जेन्ट का प्रयोग करते हुए दो तीन बार साफ पानी से धोते है जिससे उसका कलफ दूर हो जाता है। दूसरे चरण में इस धुले हुए कपड़े पर लकड़ी के ब्लोक का प्रयोग करते हुए नेफतोल से फेंट्ये की छपाई की जाती है।

तीसरे चरण में नेफतोल प्रिंट के इस कपड़े को ख़ास प्रकार के साल्ट के पानी में लगभग पांच मिनिट रखते हैं जिससे जहां नेफ्थोल से छपाई की गई वो लाल मेरुन रंग में निखर आती है। इस प्रक्रिया को ये कामगार ठंडी विधि के नाम से जानते हैं। इसमें चौथा चरण आकोला छपाई का महत्वपूर्ण चरण हैं जिसमें लाल मेरुन उभरे हुए ब्लोक को एक मिश्रण द्वारा दबा दिया जाता है। पांचवे चरण में आठ से दस बार इंडिगो से छपाई की जाती है जिससे कपड़े पर जहां दाब होता है वहां इंडिगो प्रिंट नहीं होता है। अंत में गरम पानी में धोकर दाब हटाया जाता है।

फेंट्ये की छपाई में जिन ब्लोक का प्रयोग किया जाता है वे मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं – पहला रेख, दूसरा गड़ एवं तीसरा डट्टा। रेख ब्लोक का प्रयोग आकृति के आउटलाइन बनाने में किया जाता है जबकि गड़ ब्लोक का प्रयोग मुख्य आकृति को उभारने के लिए किया जाता है।

दाबु छपाई में डट्टा ब्लोक का प्रयोग बहुत महत्व का होता है क्योंकि इसी से दाब लगाने का कार्य किया जाता है। इन ब्लोक में जो आकृतियों का प्रयोग किया जाता है वो मुगलकाल से अपनी विशेष पहचान कायम किये हुए हैं। जबकि दाबु छपाई का सम्बन्ध सिन्धु घाटी सभ्यता से जोड़ कर देखा जाता है।

छीपा जाति की अंधिकांश महिलाएं बंधेज छपाई का कार्य करती है जो आकोला की वस्त्र छपाई की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता है। बंधेज छपाई में कपड़े को धागे एवं अनाज के दानों का प्रयोग करते हुए जगह-जगह बांध दिया जाता है तथा इसके बाद उस पर परम्परागत रंग उकेरा जाता है। मेवाड़ क्षेत्र में महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली ओढ़नी, साड़ी और चुनर में साथ ही पुरुषों द्वारा सिर पर पहने जाने वाली पगड़ी में इस बंधेज छपाई के नमूने देखे जा सकते हैं दाबू के साथ इस नए काम से भी यहाँ के लोगों के रोजगार को बढ़ावा मिल रहा है ।

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डिज़ाइन के लिए काम आने वाले ब्लॉक्स या साँचे  | Source :  Gaatha.com

राजस्थान के कुटिर उद्योगों को प्रमोट करने हेतु वर्ष 2006 में 26 कलस्टर में से आकोला भी एक कलस्टर के रुप में चुना गया था जहां बंधेज और दाबु ब्लोक छपाई को प्राथमिकता से चिन्हित भी किया गया। इस कला के कुशल प्रशिक्षण के लिए राजस्थान सरकार ने उद्योग विभाग के निर्देशन में स्वयंसेवी संस्था व्हील एण्ड वे के मार्फत वर्ष 2007 से प्रशिक्षण कार्य भी प्रारम्भ कराया जिसमें 20-20 व्यक्तियों के समूह बना कर प्रशिक्षण प्रदान किया गया।

वर्ष 2008 में यहां से उत्पादित सामग्री को जयपुर स्थित बिड़ला ओडिटोरियम में लगे हाट बाजार मेें प्रदर्शित करने यहां के कुशल कामगार सुरेश, ललित, हीरालाल, सीमादेवी एवं सुशिला देवी को अवसर भी मिला। आकोला वस्त्र छपाई उद्योग को सहायता प्रदान करने हेतु राज्य सरकार ने यहां 55 लाख की लागत से सी.एफ.सी. (कोमन फेसिलिटी सेन्टर) को वर्ष 2007 में प्रारंभ किया गया। उसी दौर में आकोला में स्थानीय कामगारों ने भी अपने इस कला के विकास हेतु अपनी स्वयंसेवी संस्था नामदेव हेण्डप्रिंट विकास संस्थान का गठन किया था।

भूमण्डलीकरण के इस दौर में परम्परागत शैली की अपनी यह आकोला दाबु छपाई हालांकि बाज़ार से अभी भी लड़ रही है मगर इन मझले कारीगरों की अपनी सीमाएं हैं। नवीन दिशाएं तलाशी जा रही है युवा अपनी पढ़ाई का उपयोग इस काम में करना सीख रहे हैं।

इंटरनेट और ऑनलाइन ट्रेडिंग के समीकरण भी यहाँ के कुछ युवा समझने लगे हैं ये सभी कुछ सकारात्मक संकेत ही तो हैं। चित्तौड़गढ़ ज़िले के इस आकोला कस्बे की ये दाबू प्रिंट कला और यहाँ के कारीगर प्रगति के पथ पर बढे ऐसी Be Positive की कामनाएं हैं।

Story Credit : Apni Mati

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