नयी तकनीक से कई तरह से खेती की जा रही है लेकिन जागरूकता के अभाव में भारतीय किसान रसायनों के लिए हज़ारों रुपये खर्च करके भी मनचाहा फायदा फसलों से नहीं ले पा रहे है । परम्परागत खेती से पानी, जमीन एवं पैसों का खूब नुकसान होता है लेकिन अनपढ़ किसान खेती करने के नए तरीके इस्तेमाल ही नहीं कर पा रहा है ।

खेती चाहे किसी भी तरह की हो, उसमें मिट्टी की भूमिका अहम होती है, लेकिन राजस्थान के चित्तौडग़ढ़ जिले में अब बिना जमीन, मिट्टी और खाद के सिर्फ पानी से तरकारी उगाई जा रही है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि स्थानीय कृषि विभाग के अधिकारी जलीय खेती को लेकर अनजान बने हुए हैं।

जल संवर्धन या हाईड्रोपोनिक्स (Hydroponics) एक ऐसी तकनीक है, जिसमें फसलों को बिना खेत में लगाए केवल पानी और पोषक तत्वों से उगाया जाता है। इसे ‘जलीय कृषि‘ भी कहते हैं।

पौधे उगाने की यह तकनीक पर्यावरण के लिए काफी सही होती है। इन पौधों के लिए कम पानी की जरूरत होती है, जिससे पानी की बचत होती है। कीटनाशकों के भी काफी कम प्रयोग की आवश्यकता होती है। मिट्टी में पैदा होने वाले पौधों तथा इस तकनीक से उगाए जाने वाले पौधों की पैदावार में काफी अंतर होता है। इस तकनीक से एक किलो मक्का से पांच से सात किलो चारा दस दिन में बनता है, इसमें जमीन भी नहीं लगती है।

राजस्थान के चित्तौरगढ़ शहर के गांधी नगर इलाके में रहने वाले प्रकाश पुरी ने अपने मकान की छत पर मात्र 22 हजार रुपए की लागत से जलीय खेती के लिए स्ट्रेक्चर तैयार करने में सफलता प्राप्त की है। पुरी ने चार माह पहले जलीय खेती शुरू की थी।

इसे मूलत: इजराइल की खेती कहते है, जिसे हाइड्रोपॉलिक पद्धति के नाम से जाना जाता है। इस खेती में पानी की खपत दस फीसदी भी नहीं होती। पौधों को जितने पानी की जरूरत होती है, उतना पानी ही काम आता है, शेष पानी पुन: ड्रम में एकत्रित हो जाता है। पुरी की माने तो पूरा मार्गदर्शन एवं जानकारी मिलने पर इस खेती को और अधिक बढ़ावा मिल सकता है।

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फसल उगाने की हाइड्रोपॉलिक पद्धति जिसे प्रकाश पूरी इस्तेमाल कर रहे है | Image Source

भारत और इजरायल में कृषि एवं विज्ञान के क्षेत्र में विगत कुछ वर्षों में कई करार हुए है और कई स्थानीय किसानों को इजरायल जाकर वैज्ञानिक खेती सीखने का मौका मिला है । ये किसान भारत लौटकर नयी तकनीक से खेती करके अपने क्षेत्र में आदर्श स्थापित कर रहे है ।

जलीय खेती करने वाले पुरी का राजस्थान पत्रिका से कहना है कि पिछले दिनों प्रधानमंत्री इजराइल गए थे तो उन्होंने जलीय खेती को लेकर इजराइल की तारीफ की थी। इससे प्रेरणा लेकर उन्होंने ठान लिया कि वे भी जलीय खेती करेंगे।

भारत में किसानों को कालाबाजारी एवं नकली बीज एवं यंत्रो से ठगना आम बात हो चली है और कई लोग भोले-भाले किसानों को नकली कृषि यंत्र या बीज देकर फुर्र हो जाते है । प्रकाश पूरी को भी इस तरह की समस्या का सामना करना पड़ा ।

पुरी का कहना है कि वे बाजार से बीज लेकर आए थे, लेकिन एक ही थैली में चार तरह की बीज निकले। कृषि विभाग के अधिकारियों से भी इस बारे में बात की, लेकिन नकली बीज बेचने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई किसान बुवाई करता है और तीन माह में परिणाम मिलते है तब तक हजारों रुपए खर्च हो चुके होते हैं।

सब्जियों के बीजों की बुवाई नारीयल के बुरादे और छोटे-छोटे कंकड़ में की, लेकिन एक जैसे परिणाम मिलने के बाद पुरी ने नारियल के बुरादे के बजाय कंकड़ में तनें लगाकर सब्जियां उगाना शुरु किया। नारियल के बुरादे के लगातार उपयोग से उसमें फफूंद की शिकायत हो सकती है । जिसके चलते उन्होंने केवल कंकड़ का ही इस्तेमाल करना शुरू कर दिया ।

पूरी का कहना है की उन्होंने तीन-चार विश्वविद्यालय से हाइड्रोपॉलिक खेती के बारे में जानकारी ली। जोधपुर विश्वविद्यालय से पता चला कि वहां तो इसका सिर्फ डेमो ही बनाया गया था। उदयपुर से इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई।

चित्तौड़गढ़ के अधिकारियों ने हाइड्रोपॉलिक खेती के बारे में जानकारी देने के मामले में हाथ ही खड़े कर दिए। उन्होंने भिंडी,टमाटर, लौकी, खीरा, करेला अनानास आदि की बुवाई की है।

Be Positive प्रकाश पूरी के जज्बे को सलाम करता है तथा अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर एक सफल किसान बनकर देश के युवाओ और खासकर किसान वर्ग के सामने एक मिसाल पेश की है ।

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