देश एवं दुनियां में बढ़ते प्रदुषण के बीच कई तरह के सकारात्मक कार्य किये जा रहे है. वृक्षारोपण के साथ ही प्रदुषण कम करने के लिए गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्श्रोतों का उपयोग किया जा रहा हैं. मध्यप्रदेश में एक ऐसा गांव हैं .जहां किसी भी घर में चूल्हे पर खाना नहीं बनता है. गांव के लोग अब लकड़ी लाने के लिए जंगल नहीं जाते हैं. यहां हर घर में इंडक्शन पर खाना बनता है. जिसके लिए लोग बिजली का प्रयोग नहीं करते.

मध्यप्रदेश के बैतूल जिले स्थित बाचा गांव से हम सभी लोगों को सीख लेने की जरूरत है. दावों के मुताबिक यह गांव दुनिया का पहला सोलर गांव है. दुनिया का पहला सोलर गांव होने का दावा भी देश के जाने-माने संस्थान कर रहे हैं. इस गांव में न लकड़ी का चूल्हा जलता है और न ही कोई एलपीजी गैस का प्रयोग करता है. सबके घर में इंडक्शन है, जिस पर लोग खाना बनाते हैं. साथ ही सौर उर्जा से ही अपने गांव को रोशन रखते हैं.

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इंडक्शन कुकर पर खाना बनाती ग्रामीण महिला | चित्र साभार : ANI

बैतूल जिले के घोड़ाडोंगरी ब्लॉक में स्थित बाचा गांव की पहचान पूरे इलाके में एक खास वजह है. यहां बल्ब जलते हैं, पंखा चलता है, टीवी चलता है लेकिन ये सब बिजली से नहीं सौर उर्जा से होता है.

आईआईटी मुंबई, ओएनजीसी और विद्या भारतीय शिक्षण संस्थान ने इस गांव की तक़दीर बदल दी हैं. आईआईटी मुंबई ने इस गांव का चुनाव दो साल पहले किया था. उसके बाद से इस गांव को सोलर विलेज बनाने का काम शुरू हुआ. दिसंबर 2018 में सभी घरों में सौर उर्जा प्लेट, बैटरी और चूल्हा लगाने का काम पूरा हो गया.

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इंडक्शन कुकर पर खाना बनाती ग्रामीण महिला | चित्र साभार : ANI

एक घर में सोलर यूनिट और चूल्हे लगाने में अस्सी हजार रुपये की लगात आई है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ज्यादा ऑर्डर आएं तो लागत कम हो सकती है. इस चूल्हे से पांच सदस्यीय परिवार में एक दिन में तीन बार खाना बनाया जा सकता है.

बाचा गांव में सभी चूल्हे नि:शुल्क लगाए गए हैं. सौर उर्जा से चलित चूल्हे की सोलर प्लेट से 800 वोल्ट बिजली बनती है. इसमें लगी बैटरी में तीन यूनिट बिजली स्टोर रहती है.

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सौर ऊर्जा के बाद गांव में आये बदलाव के बारे में बात करता ग्रामीण | चित्र साभार : ANI

बाचा गांव के ग्रामीणों ने न्यूज़ एजेंसी ANI से कहा कि अब हमें जंगल लकड़ी के लिए नहीं जाना पड़ता है. न ही आग बुझाने के लिए समय बिताना पड़ता है. बर्तन और दीवारें अब काली नहीं होती हैं. भोजन भी समय पर पकाया जाता है. इससे समय की बचत होती है.

आदिवासी बाहुल्य वाले इस गांव में 74 घर है और सभी घरों में सोलर यूनिट है. सौर उर्जा के प्रयोग से न केवल लोगो को जंगल से लकड़ी लाने के लिए जाना पड़ता हैं बल्कि जंगल से पेड़ कटना भी कम हो गया हैं. इसके साथ ही गांव प्रदुषण मुक्त हो गया और धुए के कारण होने वाली बीमारियों से भी निजात मिल सकेगी.

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