भारत में दोपहिया वाहनों की भारी मांग बनी रहती हैं और कुछ ऐसे ब्रांड्स है जिनकी बाइक खरीदने के लिए लोग छह महीने तक इंतजार करते हैं। एक वक्त में जो कंपनी बंद होने की कगार पर थी, उसी कंपनी का इस व्यक्ति ने कायाकल्प कर दिया।

आयशर मोटर्स के सीईओ सिदार्थ लाल ने वो करके दिखाया है जो आज के प्रतियोगी युग में लगभग नामुमकिन है। आयशर मोटर्स के इस फ्लैगशिप ब्रांड ने इटली के मिलान शहर में आयोजित ऑटो एक्सपो-2017 में आने वाली 650 CC की बाइक प्रदर्शित की है। आज यह ब्रांड ने केवल भारत बल्कि विदेशों में भी अपने झंडे गाड़ रहा है।

रॉयल एनफील्ड आज भारत का सबसे पसंदीदा बाइक ब्रांड है और उसके बाइक्स की डिमांड भारत के अलावा अमेरिका औऱ यूरोप में भी बहुत ज्यादा है। आज इनकी बाइक जितनी सफल है उतने ही संकट से 17 वर्ष पहले थी। रॉयल एनफील्ड और आयशर मोटर्स की सफलता का क्या महत्व है, यह आप इस उदाहरण से समझ सकते हैं।

यदि आप ने 2001 में रॉयल एनफील्ड खरीदने के लिए 55000 खर्च किये है तो अभी आपके पास एक पुरानी बुलेट बाइक होगी लेकिन अगर आप ने आयशर मोटर्स में 55000 का निवेश किया होता तो आज उनकी कीमत लगभग साढ़े तीन करोड़ हो जाती है।

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इस अपार सफलता का श्रेय सिद्धार्थ लाल को जाता है जिन्होंने एक स्पेशल लुक वाली एनफील्ड को आज सबकी ख़्वाहिश बना दिया। 2004 में सिद्धार्थ जो कि अपनी ग्रेजुएशन करके आयशर मोटर्स को जॉइन किया तब तक आयशर मोटर्स लगभग पंद्रह प्रकार के बिज़नेस में था.

जिनमें ट्रक, ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल, फुटवियर के साथ ही गारमेंट उद्योग में था लेकिन किसी में भी मार्केट लीडर नही था। बाइक के शौक के चलते सिद्धार्थ ने रॉयल एनफील्ड में खासी दिलचस्पी दिखाई और उसे नंबर वन ब्रांड बनाने के लिए जी जान से जुट गये।

इसके चलते उन्होंने अपने ग्रुप के अन्य सारे बिज़नेस विभिन्न कंपनियों को बेचने का कठिन निर्णय लिया और ट्रक एवं रॉयल एनफील्ड पर फोकस करने का काम किया क्योंकि उन्हें लगता था कि ट्रक और रॉयल एनफील्ड के निर्माण में आयशर मोटर्स नंबर वन बन सकता है। सिद्धार्थ का मानना हैं कि 10 बिज़नेस में हाथ मारने के बाद सामान्य वृद्धि करने के बजाय किसी भी एक या दो क्षेत्रों में मार्केट लीडर बनना ज्यादा सही हैं।

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मार्केट रिसर्च एवं व्यापारिक रणनीति के तहत सिद्धार्थ ने ट्रक और मोटरसाइकिल बिज़नेस में जी जान से जुट गए और आज लगभग एक दशक के बाद आयशर मोटर्स ने 9000 करोड़ का टर्नओवर इकट्ठा किया और 1000 करोड़ का शुद्ध मुनाफा कमा रही है। उसमें से लगभग अस्सी फीसदी हिस्सा रॉयल एनफील्ड की बिक्री से आता हैं।

2005 में कंपनी पूरे साल में केवल 25000 बाइक बेच रही थी । सबसे पहले उन्होंने मार्केट रिसर्च किया और अपने चेन्नई स्थित मैन्युफैक्चरिंग प्लांट की क्षमता एवं तकनीकी रूप से सक्षम बनाया जिससे आज लगभग छह लाख बाइक्स प्रतिवर्ष बन रही हैं।

सिद्धार्थ ने एक बाइक कल्चर का ताना बाना बुना जो रॉयल एनफील्ड को मध्य में रख कर बनाया गया और लोगों को उनकी बाइक की ख़ासियत एवं अलग अनुभव दिलाने में काफी मदद की। सिद्धार्थ ने स्वयं कई हज़ार किलोमीटर रॉयल एनफील्ड चलाकर व्यक्तिगत अनुभव प्राप्त किया जिससे उन्हें ग्राहकों की दिक्कतें समझने में आसानी हुई।

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सिद्धार्थ लाल के नेतृत्व में रॉयल एनफील्ड की बिक्री को नयी उचाईयां दी है, आज क्लासिक, हिमालयन एवं थंडरबर्ड वैरिएंट के बाइक की बिक्री छह लाख से ज्यादा है और उनके ग्राहक औसतन चार से छह महीने अपनी गाड़ी मिलने का इंतजार करते हैं।

आक्रामक मार्केटिंग रणनीति एवं उच्च गुणवत्ता के साथ ही ग्राहकों से प्रोफ़ेशनल संबंधों ने आज रॉयल एनफील्ड ब्रांड को नई ऊंचाई प्रदान की है।

सिद्धार्थ लाल ने अपनी टीम में अपने क्षेत्र के टॉप अधिकारियों को रखा और उच्च वर्क एथिक्स को सर्वोपरि रखा। साथ ही वो मार्केट पर पैनी नजर रखते है तथा ग्लोबल ब्रांड्स से भी नया सीखने और उनके समकक्ष खड़ा होने की कोशिश करते है।

एक मोटरसाइकिल ब्रांड को एक बाइक कल्चर बनाने के लिए सिद्धार्थ ने कड़ी मेहनत की और अपने लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ते रहे। उसके लिए उन्होंने अपनी कंपनी के कई बिज़नेस को बेचने का रिस्क भी उठाया और कंपनी के प्रोडक्ट्स को खुद इस्तेमाल करके अपने प्रोडक्ट को यूनिक बनाने में कोई कसर नही छोड़ी।

Be Positive  सिद्धार्थ लाल के संघर्षो को सलाम करता है और उम्मीद करता है कि पाठकों को सिद्धार्थ लाल की ज़िन्दगी से प्रेरणा मिलेगी ।

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