देश में पर्यावरण के क्या हालत हैं, वो किसी से छुपे हुए नहीं हैं. बढ़ती जनसँख्या और प्रदुषण के कारण चेन्नई शहर के जलाशय सुख चुके हैं और पूरा शहर पानी के लिए त्राहिमाम कर रहा हैं. इसके साथ ही शिक्षा के घटते स्तर और व्यवसायीकरण के चलते बच्चों को एक दौड़ में लगा रखा हैं. समाज की इन्ही समस्याओं को ख़त्म करने के लिए एक आर्किटेक्ट और ‘द ग्रीन आर्मी‘ की सेनापति भुवनेश्वर के हालत बदलने में जुटी हुई हैं. पर्यावरण, शिक्षा और कला एवं संस्कृति को सहजने का काम कर रही हैं श्वेता अग्रवाल ( Shweta Agarwal).

श्वेता अग्रवाल अपने संस्थान ‘उन्मुक्त फाउंडेशन‘ के जरिये पर्यावरण, शिक्षा एवं भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को बचाने का काम कर रही हैं. इनके संस्थान में उड़ीसा में आये ‘फणी चक्रवात‘ के दौरान बेहतरीन काम किया. केवल पंद्रह दिनों में 100 से ज्यादा स्वयंसेवियों की मदद से 2000 से अधिक पेड़ों को बचाने का काम किया हैं. इसके साथ ही चक्रवात प्रभावित क्षेत्रों में यथा-संभव मदद भी की.

tree plantation
बच्चों के साथ पौधरोपण करती उन्मुक्त संस्थान की टीम

बी पॉजिटिव इंडिया से बातचीत के दौरान श्वेता अग्रवाल बताती हैं कि मैं पिछले 10 वर्षों से भुवनेश्वर में रह रही हूँ. उन्मुक्त की शुरुआत, समाज के जीवन के लिए तीन सबसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु – पर्यावरण, सर्वसमावेशी शिक्षा और उस समाज के मौलिक मूल्य की स्थापना करने के लिए की हैं. वर्तमान नगरीय जीवनशैली और पैसे की अन्धी होड़ ने ये तीनों हमसे छीन लिए हैं.

इस बात का इतना सामान्यीकरण कर दिया है कि अब हमें अनुभव भी नहीं होता कि हो क्या रहा है और किस कीमत पर हो रहा है. कभी इमारतों के लिए तो कभी सड़क के लिए हम पेड़ काटे जा रहे हैं. पेड़ बचाने और लगाने की तरफ़ हमारा ध्यान होना चाहिए लेकिन हम सब नज़रअंदाज कर रहे हैं. देश के किसी भी शहर में पिछले एक दशक में आये पर्यावरण परिवर्तन को देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता हैं.

kids learning
बच्चों को नए तरीके से पढ़ा रही हैं उन्मुक्त फाउंडेशन टीम

समाज का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं – बच्चों की शिक्षा. स्पर्धा के चलते शिक्षा जिसे मुफ्त होना चाहिए लेकिन उसे हमने महंगा बना दिया हैं. सुख-सुविधाओं के नाम पर सालाना लाखों रुपये फीस ऐंठी जाती हैं. अंतहीन स्पर्धा और मार्कशीट में नंबर के लिए बच्चों को शिक्षा दी जा रही हैं, जो उनमें आगे बढ़ने की भावना की जगह कुण्ठा और हीनभावना भरती है. आज़ादी से पहले से जारी शिक्षा पद्धति को ही अपनाया और समय के साथ आगे बढ़ने की बजाय शिक्षा-व्यवस्था का ही अवमूल्यन कर दिया हैं.

समाज का तीसरा महत्वपूर्ण हिस्सा हैं – मौलिक और सांस्कृतिक मूल्य. भारत विविधता भरा देश है लेकिन हमने दशकों से सबको एक ही छड़ी से हाँकने वाली व्यवस्था को अपनाना शुरू कर दिया है. इससे अपनी जड़ों से सम्बन्ध कच्चा होता है और टूट जाता है. हमारे दैनिक जीवन और पारस्परिक सम्बन्धों में बढ़ने वाली कटुताओं के पीछे यह बहुत बड़ा कारण है. हमारी भाषाओं और सांस्कृतिक वैविध्य में ही हमेशा से हमारा बल रहा है.

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आत्म-रक्षा की क्लासेस ले रहा हैं उन्मुक्त फाउंडेशन

अब ये सब देखकर या तो हम केवल शिकायतें कर सकते हैं, या फिर अपनी क्षमता के अनुसार और सबके सहयोग से समस्या के हल के लिए कदम बढ़ा सकते हैं. समस्याएँ हमारी हैं. हम ठीक नहीं करेंगे तो कौन करेगा? उन्मुक्त फाउंडेशन इसी भावना से उठाया गया एक कदम है.

उन्मुक्त फाउंडेशन की औपचारिक रूप से 2017 में शुरुआत हुई थी. यह संस्था अपने अच्छे और नियत कामों से धीरे-धीरे लोगों तक पहुँच रही है. शिक्षा व्यवस्था सुधारने के लिए हमने खुद का सेण्टर शुरू किया हैं जिसमें अभी 35 बच्चे पढ़ रहे हैं.

शुरूआती दिनों में बच्चों के माता – पिता को समझने में कठिनाईआती थी. वो नहीं समझते की हम क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं ? उन्हें लगता है किताब से क्यों नहीं पढ़ाते ? ये नाच, गाने, ड्रामा से क्या होगा. लेकिन हमारी कोशिश रहती है कि हम बच्चों को व्यावहारिक तरीके से ज्यादा सिखाएं और उन्हें ये स्पर्धा के जाल से बहार निकालें.

the green army project
उड़ीसा में आये चक्रवात के बाद पौधों को बचा रही हैं ‘द ग्रीन आर्मी’

उन्मुक्त बच्चों के लिए आत्मरक्षा की कक्षा, कम्प्यूटेशनल थिंकिंग एक ऐसी ही कक्षा है जिसमें बच्चे प्रश्न करते हैं, अपनी रुचि के अनुसार खुद प्रयोग करके सीखते हैं. साथ ही, गणित, भाषाओं, और नृत्य की कक्षाएँ भी होती हैं. इसी सब को हम अंग्रेज़ी में होलिस्टिक एजुकेशन कहते हैं. ये कक्षाएँ बिना किसी भेदभाव के समाज के हर तबके के लिए हैं.

उन्मुक्त संस्थान को आगे बढ़ाने में साबरमती दी, प्रोफेसर राधामोहन, पूजा भारती, विजय अग्रवाल लगातार सलाह देते हैं. आत्मरक्षा क्लासेज-अविनाश सिंह, कम्प्यूटेशनल थिंकिंग- संबित दास, डांस – डॉ सुप्रवा मंडल, आर्ट एंड क्राफ्ट- अबिनास साहू लेते है जबकि सौरव फुल टाइम काम कर रहे है. मोनाली, अरिजीत , स्वरुप , अनिशा, निवेदिता, सुभाश्री, शगुफ्ता, नवनीत और देबाशीष स्वयंसेवी के रूप में काम कर रहे है.

श्वेता अग्रवाल आगे बताती हैं कि संस्थान में पढ़ने वाले बच्चों में कई सकारात्मक परिवर्तन आए हैं. किताबी ज्ञान के साथ ही व्यावहारिक ज्ञान भी सींख रहे हैं. बच्चे घर के छोटे-मोटे काम भी करते हैं जो उन्हें अपने परिवार के ओर करीब ले जाते हैं.

श्वेता अग्रवाल ने सौरव और सूर्य के साथ मिलकर उड़ीसा में आये ‘फणी चक्रवात‘ के कारण नष्ट हर पेड़ों को बचाने के लिए उन्मुक्त फाउंडेशन के तत्वाधान में ‘द ग्रीन आर्मी‘ के नाम से प्रोजेक्ट चलाया. वन विभाग के साथ शुरू हुए इस प्रोजेक्ट से केवल 15 दिन में 120 लोग जुड़ गए. सबने साथ मिलकर लगभग 2000 टूटे-गिरे पेड़ों को संरक्षित करने का काम किया जिसकी बहुत सराहना भी हुई. छोटे-छोटे लक्ष्य निर्धारित कर काम करने वाली यह टीम वृक्षारोपण और उसके बाद उनकी देखभाल करती है.

school reconstruction
उड़ीसा में आये चक्रवात के बाद तबाह हुए स्कूल को वापस बना रही हैं उन्मुक्त फाउंडेशन

इसके साथ ही एक स्कूल पूरा तबाह हो गया था जिसे क्राउड-फंडिंग के जरिये सही करवाया जा रहा है. इसकी कुल लागत लगभग आठ लाख रुपये आएगी. स्कूल का निर्माण कार्य चल रहा है. इनफ़ोसिस ने भी छत निर्माण में सहयोग दिया हैं. स्कूल के डिज़ाइन को चेंज करके इसे री-डिज़ाइन किया गया हैं. नए स्कूल में हवा और रोशनी की समुचित व्यवस्था का ख़याल रखा जा रहा हैं.

इसके साथ ही उन्मुक्त फाउंडेशन एक क्रिएटिविटी सेण्टर भी चलाती है जिसमें अलग-अलग कलाओं से सम्बद्ध लोगों के सत्र समय-समय पर आयोजित होते रहते हैं. अपनी भाषाओं, प्राकृतिक रंग से चित्रकला और संगीत से जुड़े कार्यक्रम भी होते हैं. एक-दूसरे से सींखने का यह दौर अनवरत जारी हैं. सेण्टर इस विचारधारा के साथ आगे बढ़ रहा है कि हर कोई सब कुछ सीख सकता है.

भविष्य की योजनाओं के बारे में श्वेता अग्रवाल बताती हैं कि अभी भले ही मेरे आर्किटेक्चर बिज़नेस से हुई आय से काम चल रहा हैं लेकिन अधिक बच्चों तक पहुँचने ने के लिए संस्था को मजबूत बनाना होगा. इसके साथ ही 15 अगस्त तक 1000 फलदार पेड़ लगाने का लक्ष्य है. यह कार्य मुख्यतः स्कूल के परिसर में किया जाएगा जिससे बच्चे शुरू से ही पेड़ों के साथ जुड़ें और प्रकृति को समझें.

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बच्चों को आर्ट एंड क्राफ्ट के साथ ही कई एक्टिविटीज़ के साथ पढ़ाती हैं उन्मुक्त फाउंडेशन

श्वेता अग्रवाल कहती हैं कि आने वाला समय और कठिन होने वाला है, आदतें बदलें, प्लास्टिक का इस्तेमाल न करें, रसोई के कचरे से खाद बनाएं, पेड़ लगाएं. अपने लिए नहीं पर अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए ही कर लें, वर्ना वह जब पूछेंगे कि ” इस प्रदूषित धरती पर हमें क्यों पैदा क्या? और आपने कुछ किया क्यों नहीं इसे बचाने के लिए?” उनके इन प्रश्नों का आप सामना भी नहीं कर पाएंगे.

श्वेता अग्रवाल या उन्मुक्त फाउंडेशन से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करे !

बी पॉजिटिव इंडिया, श्वेता अग्रवाल ओर उन्मुक्त फाउंडेशन की पूरी टीम के कार्यों की सराहना करता हैं ओर भविष्य के लिए शुभकामनाए देता हैं.

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