किसी की उम्मीद बनो, नाउम्मीद तो वो खुद ही होते हैं.  – Sarita Rai Bihar

यह पंक्तियाँ बिहार के हाजीपुर की रहने वाली समाज-सेविका पर सटीक बैठती हैं. गरीब एवं पिछड़े इलाकों के 2000 से ज्यादा लड़के एवं लड़कियों के लिए वो उम्मीद की किरण बन चुकी हैं. जिन बस्तियों में लोग जाने से कतराते हैं, उन्ही गलियों में वो ज्ञान की सरिता बहा रही हैं. वकालत करने के बाद शानदार करियर का विकल्प था लेकिन उन्होंने दबी-कुचली महिलाओं की आवाज़ बनने का काम किया. किताबी ज्ञान के साथ ही बच्चों को व्यावहारिक शिक्षा देने का फैसला किया. वकील से समाजसेवी बनी जुझारू महिला का नाम हैं सरिता राय (Sarita Rai).

सरिता राय ‘उड़ान‘ संस्था की संस्थापक हैं जिसके जरिये वो बिहार के हाजीपुर जिले की कच्ची बस्तियों के बच्चों को मुफ्त में शिक्षा देती हैं. इसके साथ ही बाल एवं महिला अधिकारों के मामलों कानूनी सहायता भी करती हैं. अपनी संस्था के जरिये वो बच्चों को छठवीं कक्षा तक मुफ्त में पढ़ाती हैं और बाद में उन्हें सरकारी या निजी शिक्षण संस्थान में प्रवेश दिलाती हैं. शिक्षा के अधिकार के अलावा बच्चों के लिए स्कालरशिप की व्यवस्था करवाती हैं.

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‘उड़ान’ संस्थान में पढ़ते गरीब बच्चें

2004 में घर में ट्यूशन से शुरू हुआ सफर आज एक संस्था का रूप ले चूका है. अब तक 2000 से ज्यादा बच्चों को वो पढ़ा चुकी है. इसके साथ ही आगे पढ़ने वाले बच्चों की आर्थिक मदद भी करती है. अपने क्षेत्र के पिछड़ेपन को हटाने के लिए दिन-रात प्रयासरत है.

बिहार की गिनती देश के पिछड़े राज्यों में होती है और शिक्षा के साथ ही बाल एवं महिला अधिकारों के मामले में हालत चिंताजनक है. खासकर लड़कियों को पढ़ने और घर से बाहर जाने की इज़ाज़त नहीं मिलती है लेकिन सरिता ने इसी समस्या को हल करने के लिए अपना सारा समय एवं कमाई खर्च कर दी है.

सरिता को जानने वालों के अलावा परिवार और रिश्तेदार भी शुरूआत में पागलपन से ज्यादा कुछ भी नहीं समझ पा रहे थे. लेकिन वैसे लोग भी इस काम में उसका थोड़ा बहुत हाथ बंटा रहे हैं लेकिन सरिता राय ने शादी के बाद एक साधारण घरेलू महिला का किरदार निभाने से बेहतर लोग और समाज के बीच रहने का फैसला लिया.

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बच्चों का मेडिकल चेक-अप करवाती हुई सरिता राय और उनकी टीम

बी पॉजिटिव इंडिया से खास बातचीत में सरिता राय ने बताया कि मैं मूलतः बिहार से हूं, पर पिता IFS अफसर रहे चुके है जिसके चलते उनकी वन विभाग में नौकरी के कारण मेरा बचपन देश के पूर्वोत्तर राज्यों में बीता है. 2003 में एक वकील से मेरी शादी हो गई और मैं बिहार में अपने ससुराल में एक सामान्य गृहिणी की तरह रहने लगी. बिहार आकर मैंने भी वकालत की तालीम हासिल की और इसी क्षेत्र में करियर बनाने के बारे में सोचने लगी. अभी मैं बिहार राज्य के बाल अधिकार एवं न्याय विभाग में काम कर रही हूं.

समाज सेवा की भावना मन में थी लेकिन पैसे की कमी आड़े आ रही थी. इस वजह से पहले संपन्न घर के बच्चों को अपने टॉपर स्टडी प्वाइंट (Topper Study Point) नामक संस्थान में इंग्लिश पढ़ाना शुरू किया. कुछ थोड़े बहुत पैसे जमा हुए तो वर्ष 2004 में पिछड़ी बस्तियों की बच्चियों को मुफ्त में पढ़ाना शुरू किया. लेकिन कारवां यही खत्म नहीं हुआ. चार साल तक बच्चियों को पढ़ाने के बाद उन्होंने बच्चों को भी पढ़ाने की सोची. 2008 में हमने बस्तियों के सभी बच्चों के लिए पढाई की व्यवस्था की.

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बच्चों के माता-पिता से बात करती हुई सरिता राय

शुरुआत में यह दिक्कत थी कि जिन बच्चों को मैं पढ़ाना चाह रही थीं उनके माता -पिता उनसे काम करवाना चाह रहे थे. किसी तरह समझा बुझा कर मैंने 5 बच्चों के माता पिता को तैयार किया. उन बच्चों को पढता देख काफी समय बाद धीरे धीरे अब लगभग 100 बच्चे यहां पढ़ने के लिए आने लगे.

शुरूआती पढाई में सरिता बच्चों को जरूरी शिक्षा देती है. उसमें मैथेमैटिक्स, हिंदी, साइंस प्रमुख होते हैं. जैसे जैसे बच्चे यहां बैठना और पढ़ना सीख लेते हैं तब उन्हें अंग्रेजी भाषा भी पढ़ाया जाता है. यहां के कई ऐसे बच्चे हैं जिन्हें कल तक अंग्रेजी की एबीसीडी नहीं आती थी अब वे अंग्रेजी बोल भी लेते हैं.

इस काम को आगे बढ़ने के लिए ‘उड़ान‘ नाम से संस्था शुरू की. इसके जरिये हमने चार वालंटियर के साथ गरीब बच्चों के माता-पिता की काउन्सलिंग करना शुरू किया. हमने अपने ही पढ़ाए छात्र-छाआओं के समूह बनाकर उन्हें झुग्गियों में रहने वाले गरीब बच्चों के परिवारवालों को समझाने के लिए भेजना शुरू किया. हमारे प्रयासों को सफलता मिली और देखते ही देखते हमने सैकड़ों बच्चों को शिक्षा से जोड़ दिया.

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गरीब बच्चों के साथ उत्सव मनाती है सरिता राय और उनकी टीम

चूंकि मेरे पास कानूनी जानकारी भी है, इसलिए मैं समाज के गरीब जरूरतमंदों की विधिक मदद भी करती रहती हूं. महिला एवं बाल अधिकारों पर मैं लड़कियों को जागरूक करती हूँ और उन्हें आत्म निर्भर बनाने का प्रयास करती हूँ.

सरिता कहती है कि इस पहल से कई ज़िंदगियाँ संवर गयी है. पुष्पा नाम की अपनी छात्रा को मैं कैसे भूल सकती हूं, जो एक बेहद गरीब परिवार से आती थी. मेरी मदद की बदौलत उसने बैंक की नौकरी हासिल की और अपने परिवार का सहारा बनी. इसी तरह रचना ने अपने अधिकारों को समझते हुए घरेलु हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठाई. कुछ वक्त पहले मैं एक नाबालिग बलात्कार पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए समाज और पूरी व्यवस्था से सफलतापूर्वक लड़ चुकी हूं.

सरिता कहती है कि मैंने कोई बड़ा काम नहीं किया है. मैं तो बस अपने छोटे-छोटे कदमों से समाज में बदलाव लाने की कोशिश करती रहती हूं. हमारा काम केवल किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि व्यावहारिक ज्ञान देना है जिसके जरिये बच्चों का सम्पूर्ण विकास हो सके.

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सरिता राय और ‘उड़ान’ टीम को मिल चुके है कई सम्मान

सरिता राय और ‘उड़ान‘ टीम को कई मंचों पर सम्मानित किया जा चूका है. प्रभात खबर दैनिक के ‘अपराजिता सम्मान‘ के साथ ही ‘गुरु‘ सम्मान भी मिल चूका है. कई मंचों पर उन्हें मुख्य वक़्ता के रूप में बोलने का मौका मिला है.

अगर आप भी सरिता राय या ‘उड़ान‘ संस्था से संपर्क करना चाहते है तो यहाँ क्लिक करे !

बी पॉजिटिव इंडिया, सरिता राय और ‘उड़ान‘ संस्था की पूरी टीम के कार्यों की प्रशंसा करता है और भविष्य के लिए शुभकामनाऍ देता है.

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