जो मंजिलों को पाने की चाहत रखते है वो मरुस्थल में भी पानी ला देते है.

यह पंक्तिया राजस्थान के सीकर जिले की एक महिला प्रगतिशील किसान पर सटीक बैठती है. खेती-बाड़ी को घाटे का सौदा माना जाता है. सयुंक्त परिवार से अलग होकर जब एकल परिवार में यह महिला आयी तो खेती करने के नाम पर केवल 1.25 एकड़ जमीन थी. परम्परागत खेती के चलते घर का खर्चा चलाना भी मुश्किल हो रहा था और ऊपर से परिवार के अन्य लोगो से भी ताने सुनने को मिलता था.

लेकिन इन मुसीबतो से घबराये बिना इस महिला किसान ने नयी तकनीक के साथ खेती करनी शुरू की. आज वो अपनी जमीन से न केवल साल के 25 लाख रुपये कमा रही है बल्कि मरुस्थल में अनार और सेब की खेती कर रही है. इस प्रगतिशील किसान का नाम है : संतोष देवी खेदड़ (Santosh Devi Khedar).

राजस्थान के सीकर जिले की अधिकांश जमीन थार मरुस्थल का हिस्सा है. जिसे लोग बंजर मानकर चलते है. साल में मानसून सीजन में ज्वार या बाजरा की खेती ही की जाती है लेकिन संतोष देवी के सामने चुनौती बड़ी थी. उन्हें न केवल अपने परिवार का खर्चा चलाना था बल्कि खुद को अपने परिवार वालों के सामने साबित भी करना था.

santosh devi at farm house
अपने खेत पर संतोष देवी | तस्वीर साभार : द बेटर इंडिया

राजस्‍थान की मिट्टी और मौसम के लिहाज सेब और अनार की खेती करने का असंभव सा कार्य अपने हाथ में लिया. आर्गेनिक खेती के तौर -तरीकों के साथ ही आधुनिक तकनीक के प्रयोग से संतोष देवी को आशातीत सफलता मिली.

संतोष देवी सीकर के बेरी गांव में 1.25 एकड़ जमीन में शेखावाटी फार्म चलाती हैं. सेब और अनार की खेती करती हैं और हर साल 25 लाख रुपये तक मुनाफा कमाती हैं. संतोष देवी खेदड़ और उनके पति राम करण खेदड़ की मेहनत और लगन के कारण बंजर समझी जाने वाली खेत की मिट्टी आज लोगों का पेट पाल रही है. संतोष देवी की कहानी जिद और आत्‍मसम्‍मान की भी दास्‍तान है, क्‍योंकि लोग उन्‍हें ताना देते थे कि उनके देवर की कमाई से ही उनका और बच्‍चों का पोषण हो रहा है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, झुंझुनू जिले में जन्मी संतोष देवी के पिता दिल्ली पुलिस में थे. संतोष ने 5वीं तक की पढ़ाई दिल्‍ली में रहकर की, लेकिन फिर गांव लौट गईं. गांव में उन्‍होंने खेती के तरीकों को समझने और सीखने की शुरुआत की. 12 साल की उम्र तक वह अच्‍छे से किसानी करना सीख गई थीं. 15 साल की छोटी उम्र में ही उनकी शादी राम करण से हो गई. पढ़ने-लिखने का शौक कभी नहीं था. लेकिन आज संतोष देवी को कृषि वैज्ञानिक की उपाधि से भी सम्मानित किया जा चुका है.

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किसान और स्थानीय नेता आते है संतोष देवी के फार्म पर | तस्वीर साभार : द बेटर इंडिया

राम करण के छोटे भाई से ही संतोष की छोटी बहन की भी शादी हुई. संयुक्‍त खेति‍हर परिवार में शादी के कारण संतोष भी खेती करने लगीं. वह बताती हैं कि रसायन के बार-बार इस्तेमाल से खेत की मिट्टी खराब हो चुकी थी. खेत में ना तो ट्यूबवेल था और ना ही कोई कुआं. 2005 में राम करण को होम गार्ड की नौकरी मिली. पगार के रूप में 3000 रुपये मिलते थे. लेकिन जब 2008 में परिवार में बंटवारा हुआ तो खर्च का बोझ बढ़ गया. संतोष और राम करण के हिस्‍से में 1.25 एकड़ जमीन रह गई.

राम करण जहां होम गार्ड की नौकरी करते थे, वहीं किसी ने उन्‍हें अनार की खेती का सुझाव दिया. पैसों की कमी के कारण संतोष ने खुद जैविक खाद बनाए. एकलौती भैंस को बेचकर खेत में ट्यूबवेल लगवाया और बाकी पैसों ने 220 अनार के पौधे खरीदकर बो दिए. ड्रिप टेक्‍नोलॉजी से अनार के पौधों की सिंचाई शुरू की. तब गांव में बिजली नहीं थी, इसलिए जनरेटर का ही सहारा था.

संतोष देवी बताती हैं कि उनके मायके में जैविक खेती होती थी. उन्होंने वहां जो भी सीखा था, सभी का इस्तेमाल करने लगीं. राम करण भी ड्यूटी खत्‍म करने के बाद खेत में हाट बंटाते थे. 3 साल की मेहनत के बाद 2011 में संतोष देवी को 3 लाख रुपये का मुनाफा हुआ.

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कृषि मंत्रालय से अवार्ड लेती संतोष देवी | तस्वीर साभार : द बेटर इंडिया

साल 2016 में संतोष देवी को खेती में नवीन तकनीक अपनाने के लिए ‘कृषि मंत्र पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया. इस सम्मान के साथ उन्हें एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि भी मिली. संतोष अपने क्षेत्र में दूसरे लोगों को भी खेती के लिए प्रेरित करती हैं और हर संभव मदद करती हैं. हर दिन 15-20 किसान उनसे खेती सीखने आते हैं. उन्‍होंने फार्म पर आने वाले लोगों के लिए रेस्‍ट हाउस भी बनाया है.

संतोष देवी खेती के अलावा घर की भी पूरी जिम्‍मेदारी उठाती हैं. घर पर कोई नौकर नहीं है. वह घर आए मेहमानों को खुद खाना बनाकर ख‍िलाती हैं. हर दिन उनके घर 15 से 20 लोगों का खाना बनता है. इस साल उन्होंने करीब 15000 पौध बेचे हैं, जिससे उन्हें 10-15 लाख की अतिरिक्त आय हुई है.

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