एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 30 सबसे प्रदूषित शहरों में भारत के 22 शहर शामिल है. अब इसके पीछे हज़ार कारण हो सकते है लेकिन फ़िलहाल प्रदुषण घटाने के लिए कोई ठोस रणनीति नहीं दिख रही है. उम्मीद की एक किरण स्वच्छ भारत अभियान और भारत के कुछ नागरिकों से है जिन्होंने अपना पूरा जीवन पर्यावण की रक्षा में लगा दिया है. उन्ही में से एक है कर्नाटक की पर्यावरणविद सालूमरादा थिमक्का (Saalumarada Thimmakka).

106 साल की यह महिला भारत और दुनिया के पर्यावरण सरंक्षण अभियान के लिए उदाहरण बन सकती है. पिछले 80 सालों से सालूमरादा थिमक्का पेड़ लगा रही है और पेड़ो को अपने बेटे की तरह पालती है. अब तक वे 8 हजार से ज्यादा पौधे लगा चुकी हैं.

सालूमरादा थिमक्का के काम और उसके प्रभाव को देखना है तो कर्नाटक राज्य के रामनगर जिले में हुलुकल और कुडूर के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाना पड़ेगा.

सालूमरादा थिमक्का ने राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनों तरफ करीब 4 किलोमीटर की दूरी तक अब तक 384 बरगद के पेड़ लगा दिए है वो भी बिना कोई सरकारी या सामाजिक मदद के. बरगद के पेड़ लम्बे समय तक और ऑक्सीजन का भरपूर उत्पादन करते है. इसके बाद उनके गांव और राष्ट्रीय राजमार्ग के आसपास प्राकृतिक वातावरण बन गया है जिनमे आज की मेट्रो पीढ़ी सुकून की साँस लेना चाहती है.

एक सम्मान समारोह में सालूमरादा थिमक्का | तस्वीर साभार : Thimmakka Foundation

एक सामान्य ग्रामीण परिवार में जन्मी सालूमरादा थिमक्का की शादी पास के ही गांव के नौजवान से हो गयी थी. शादी के कुछ समय बाद मेडिकल कारणों के कारण सालूमरादा थिमक्का माँ न बन सकी तो घर-परिवार और समाज से ताने मिलना शुरू हो गए. इस स्थिति में उनके पति ने उनका भरपूर साथ दिया और गांव छोड़कर प्रकृति की गोद में जाने का फैसला किया.

इसके बाद पेड़ लगाने की एक मुहीम शुरू हुई है जो अब तक 80 वर्षों से अनवरत जारी है. पेड़ ही उनके बेटे और जंगल उनका परिवार बन चूका है. पति की मृत्यु के बाद भी उनका यह काम जारी रहा और पेड़ को पानी सींचने से लेकर खाद देने का काम वो खुद अकेली करती रही.

सालूमरादा के अनुसार,अच्छा ही है कि उनका कोई बच्चा नहीं हुआ. इसके चलते घर की जिम्मेदारी और अगली पीढ़ी के लिए संचय करने की जरूरत नहीं पड़ी. इस कारण खाली समय में उन्होने पौधे लगाना शुरु किया.

प्रकृति के प्रति थिमक्का के असीम प्रेम को देखते हुए उनका नाम ‘सालूमरादा’ दिया गया. कन्नड़ भाषा में ‘सालूमरादा’ का मतलब वृक्षों की पंक्ति होता है. सिर्फ नाम ही नहीं, उन्हें अबतक कई सम्मान और पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है.

वर्ष 1995 में उन्हें नेशनल सिटीजन्स अवार्ड दिया गया था जबकि वर्ष 1997 में उन्हें इन्दिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र अवार्ड और वीरचक्र प्रशस्ति अवार्ड से सम्मानित किया गया था. प्रकृति की सेवा के लिए थिमक्का को वर्ष 2006 में कल्पवल्ली अवार्ड और वर्ष 2010 में गॉडफ्रे फिलिप्स ब्रेवरी अवार्ड से सम्मानित किया गया था. साथ ही 2019 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पदमश्री से भी सम्मानित किया गया.

पेड़ो के बीच सालूमरादा थिमक्का | तस्वीर साभार : Internet

2016 में ‘बीबीसी की 100 सबसे प्रभावशाली महिला‘ की लिस्ट में शामिल किया गया है. वे इस लिस्ट में शामिल होने वाली सबसे बुजुर्ग महिला हैं.

इस लिस्ट में दुनिया भर की व्यवसायी महिलाओं, इंजीनियर्स, खिलाड़ी, बिजनेस वूमन, फैशन आइकंस और कलाकारों को शामिल किया गया है लेकिन सालूमरादा इन सबसे एक अलग पहचान कायम करती हैं.

बी पॉजिटिव, सालूमरादा थिमक्का के प्रकृति के प्रति समर्पण और प्यार को सलाम करता है और उम्मीद करता है कि इनसे प्रेरणा लेकर हमारे पाठक सामाजिक और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक होंगे.

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