सफलता उन्हीं को मिलती है जो नए अवसरों को बाक़ी लोगो से कई गुना जल्दी भुनाते है और विफ़लतों से सबक लेकर नयी उम्मीद के साथ मेहनत और लगन के साथ जुड़ जाते है ।

अपने शुरुआती दो बिज़नेस में विफल होने के बावजूद एक ऐसे फील्ड में कदम रखना जिसके बारे में कुछ भी नहीं पता है तो उस शख्स को अशोक पाटनी (Ashok Patni) कहा जाता है जिसने अपने परिवार के पुश्तैनी व्यापार की जगह मार्बल का व्यापार करके आज भारत के ” वाइट टाइगर” बन चुके है ।

जब अशोक पटनी राजस्थान के किशनगढ़ में अपने R K संगमरमर परिसर में सुशोभित ढंग से रखी कॉर्पोरेट शैली वाली गोल्फ गाड़ी चलाते हैं, तो वह अपनी शुरुआती दिनों के संघर्ष को भी नहीं भूलते है ।

1988 में संगमरमर बेचने के लिए बनाई गयी छोटी सी केबिन जहाँ आज एक इलेक्ट्रिसिटी मीटर बना हुआ है , को अशोक हमेशा याद रखते है और जब भी ऑफिस आते है तो यकायक एक बार नजर वहां चली जाती है ।

लगभग 29 वर्ष पहले जब उनका परिवार खाद्यान्नों के होलसेल व्यापार में लगा हुआ था तो विमल ( अशोक पाटनी के भाई ) कुछ अलग करना चाहते थे , इसी कड़ी में उन्होंने राजसमंद से मार्बल लिया और उसे किशनगढ़ में लाकर बेचना प्रारम्भ किया क्योंकि तब तक किशनगढ़ में मार्बल उद्योग में बहुत ही कम प्रतिस्पर्धा थी ।

इस व्यापार के छ: महीने बाद ही विमल के साथ हुई एक दुर्घटना के कारण अशोक को भी इस क्षेत्र में आना पड़ा । शुरुआती चरण में सीड कैपिटल के साथ ही 1 लाख रुपये का विमल को शुद्ध मुनाफा हुआ था , विमल की मदद करने के लिए अशोक भी मार्बल के क्षेत्र में कूद पड़े ।

जिस दिन अशोक , विमल के साथ व्यापार में शामिल हुए, उसी दिन उन्होंने अपने व्यापार के लिए जमीन किशनगढ़ में खरीद ली , पहले ही दिन इतना बड़ा निवेश उनकी व्यापारिक कुशलता और आक्रामक निति को दर्शाता है ।

नई फैक्ट्री ने जून 1989 में अपना कार्य शुरू किया और शुरुआती 2 महीनों में ही 3 लाख का व्यापार किया जो उनके पुरे परिवार के खाद्यान के लेनदेन से अर्जित धन जितना था ।

अशोक जो कॉमर्स ग्रेजुएट थे और उनके शुरुआती दो बिज़नेस फ्लॉप हो गए थे जिनमे माचिस और साबुन बनाने के काम थे । उन्होंने मार्बल उद्योग में अपना भविष्य नजर आया और ये उनके पिछले व्यापारिक अनुभवों से भी कई अच्छा बिज़नेस मॉडल हो सकता था ।

मार्बल उद्योग, उनके पारिवारिक खाद्यान व्यापर से कई गुना अच्छा था जैसे कि तब तक कोई खास नियम या लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं थी और न ही सरकार में कोई गारंटी देनी पड़ती थी । कोई फ़ूड इंस्पेक्टर का डर नहीं था और न ही मार्बल कि टुकड़े को कोई चुरा सकता था और न ही भण्डारण कि लिए अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ती है ।

लेकिन असंगठित क्षेत्र होने के कारण कुछ मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा जैसे कि समय पर खदान मालिकों के द्वारा कच्चा माल नहीं पंहुचा पाना और न ही ज्यादा क्वालिटी के मानक उपलब्ध थे ।

इन समस्याओं से निपटने के लिए पाटनी ने खुद से खदाने लीज पर लेने का फैसला किया और 1990  तक लगभग 15  खदाने राजस्थान के छह जिलों में लीज पर ले ली । पाटनी के हाथों खदाने आने के साथ ही उन्होंने नयी तकनीक और उपकरणो का इस्तेमाल पर जोर दिया और अपने प्रोडक्शन को कई गुना बढ़ा दिया ।

उसका सबसे अच्छा उदाहरण राजसमंद जिले कि मोरवड़ माइंस पर देख सकते है जिसकी क्षमता 1993 में 100 टन प्रति महीने से 12000 टन प्रतिदिन की हो गयी ।

पाटनी अभी लगभग 50000 लोगो को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार दे रहे है , आज उनका ग्रुप न केवल मार्बल बल्कि सीमेंट में ( वंडर सीमेंट) , केमिकल और रियल एस्टेट के क्षेत्र में भी काम कर रहा है और 2017 में उनके ग्रुप की नेटवर्थ लगभग 700 करोड़ रुपये है ।

मार्बल उद्योग से नहीं होने और नए आइडियाज को आजमाने के कारण पाटनी के नेतृत्व में R K ग्रुप आज फल -फूल रहा है । एक पुरानी कहावत है कि ” महापुरुष हमेशा से पत्थरो से बने होते है तो पाटनी जी उनमे से एक है

ये लेख इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार लिखा गया है, अगर आपको इस लेख में दिए गए तथ्यों या जानकारी से आपत्ति है तो हमें कमेंट बॉक्स में जरूर सुझाव दे ।)

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