देश के सबसे बड़े राज्य और देश की सबसे ज्यादा प्रसिद्ध  लोकसभा सीट रायबरेली से आने वाले इस युवक ने देश के लेखकों के लिए एक ऐसा प्लेटफार्म तैयार किया है। इस प्लेटफार्म से नवोदित या जाने-माने लेखकों को न केवल अपने लेख और कविताओं को बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचाने में मदद मिलती है बल्कि पब्लिशर्स के चक्कर काटने से भी मुक्ति मिल जाती है । घर पर बैठकर इंटरनेट के माध्यम से आप अपनी रचना पोस्ट कर सकते है और उसे लाखों की संख्या में देश ही नहीं विदेश में भी पहुंचा सकते है । इस युवा उद्यमी ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर “प्रतिलिपि (Pratilipi) ” नाम से एक प्लेटफार्म बनायीं जो भारतीय भाषाओँ में अपना कंटेंट पब्लिश करने की मुफ्त में सुविधा देती है । इस उद्यमी का नाम है – रणजीत प्रताप सिंह ( Ranjeet Pratap Singh )।

आज प्रतिलिपि के पास पद्मश्री,ज्ञानपीठ , साहित्य अकादमी के विजेता लेखकों के साथ ही नवोदित लेखकों के रूप में 9000 से ज्यादा लेखक अपने प्लेटफार्म पर रजिस्टर है । हिंदी के साथ ही बांग्ला, तमिल, तेलुगु , कन्नड़ , उड़िया , मराठी एवं गुजराती भाषा में कई लेख एवं कहानियाँ उपलब्ध है । उनके प्लेटफार्म पर विद्यार्थियों से लेकर भाषा विज्ञानी भी नया एवं प्रसिद्ध कंटेंट लिखने या पढ़ने के लिए आते है । महीने में लाखों की संख्या में लोग उनकी वेबसाइट को विजिट करते है ।

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रणजीत ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर प्रतिलिपि की स्थापना सितम्बर 2014 में की और आज साढ़े तीन साल बाद प्रतिलिपि भारत का नंबर वन स्वयं-पब्लिशिंग प्लेटफार्म बन चूका है । आंकड़ों के हिसाब से दस से अधिक स्थानीय भाषाओँ में लगभग एक लाख से ज्यादा कहानियाँ, कविताए एवं लेख उनके प्लेटफार्म पर उपलब्ध है । प्रतिलिपि ने 2016 में भारतीय संस्कृति मंत्रालय के तत्वाधान में डिजिटल भाषा मेले में भी शिरकत की और उसमें अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवाई ।

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प्रतिलिपि की टीम के साथ रणजीत

रणजीत का जन्म उत्तर-प्रदेश के रायबरेली जिले के पास एक छोटे से गांव में हुआ । उनके पिता भारतीय सेना में नायक के पद पर कार्यरत थे और उनके ताऊ जो कि गांव में ही रहकर खेतीबाड़ी करते थे । रंजीत के ताऊ को लिखने का शौक था और वो अक्सर अपनी रचनाओं के प्रकाशन के लिए अपनी जेब से पैसे भरते थे । रंजीत के गांव में हिंदी के अलावा किसी को भी अन्य भाषा नहीं आती थी और इंग्लिश बोलना एक सम्मान का प्रतीक हुआ करता था ।

केंद्रीय विद्यालय से अपनी पढाई करने के बाद रणजीत ने KIIT यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएशन किया और बाद में दिल्ली के प्रतिष्ठित मैनेजमेंट कॉलेज FMS से मार्केटिंग के कोर्स में दाखिला लिया । पढाई करने के बाद रणजीत को वोडाफोन में बतौर सेल्स मैनेजर की नौकरी मिल गयी लेकिन दो साल नौकरी करने के बाद ही उन्होंने अपनी शानदार कॉर्पोरेट जॉब छोड़ दी और खुद से कुछ नया करने के लिए जाँच-पड़ताल शुरू कर दी ।

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अपने FMS के दोस्तों के साथ मिलकर उन्होंने एक पब्लिशिंग प्लेटफार्म बनाने का कार्य करना शुरू किया और भारत की स्थानीय भाषाओँ में लोगों को अपनी रचनाए प्रेषित करने के लिए प्रेरित करना उनका मुख्य उद्देश्य था । कुछ ही समय में उनका प्रोडक्ट बन कर तैयार हो गया और अपनी भाषा की स्वतंत्रता के कारण लोगों ने उनके प्लेटफार्म पर आना शुरू कर दिया । एक साल के भीतर उनके प्लेटफार्म पर दस लाख से ज्यादा विज़िटर्स आ चुके थे जो एक स्टार्ट-अप के लिए बड़ी बात होती है ।

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प्रतिलिपि अभी इन भाषाओँ को सपोर्ट करती है

रणजीत और उनके दोस्तों ने मिलकर अपने बचत के पैसों से यह कंपनी शुरू की और उनके कुछ कर्मचारियों ने भी इस कंपनी में अपना पैसा लगाया । रणजीत और उनकी टीम भारत में स्थानीय भाषाओ की बाध्यता को तोड़ने की कोशिश कर रही है और अंग्रेजी के समान ही सम्मान दिलवाने के लिए प्रतिबद्ध है । उनके यूजर में सुदूर राजस्थान के थार मरुस्थल में आने वाले जैसलमेर से लेकर मुंबई एवं दिल्ली जैसे महानगरों के लोग शामिल है जो अपनी पसंद की भाषा में कंटेंट पढ़ते/लिखते है ।

रणजीत और उनकी टीम को बेहतरीन कार्य के लिए फ़ोर्ब्स मैगज़ीन ने 2018 के Forbes 30 under 30 India सूची में शामिल किया है । इसके अलावा भी उनको कई अन्य उद्यमिता पुरुस्कारो से नवाजा जा चूका है । Be Positive, रणजीत और उनकी पूरी प्रतिलिपि टीम को शुभकामनाए देती है और उम्मीद करती है कि आपसे प्रेरणा लेकर हमारे पाठक जीवन में कुछ सकारात्मक करेंगे ।

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