कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों ! Ramesh Sahu Mann ki Baat

दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियाँ झारखण्ड के रमेश साहू (Ramesh Sahu) पर सटीक बैठती है. रमेश गांव में लगने वाले मेलों में बैलून और ख‍िलौने बेचते हैं. पिता ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करते है लेकिन रमेश को पढ़ने का इतना जज्बा की, उन्‍होंने इंटर आर्ट्स की परीक्षा में पूरे जिले में टॉप किया है. रमेश के लिए पढ़ना कभी आसान नहीं था लेकिन कठ‍िन परिस्‍थ‍ितियों में पढ़ाई करके टॉप करना वाकई काबिले-तारीफ है.

झारखंड के गुमला स्‍थ‍ित घाघरा में रमेश साहू रहते है. इस सफलता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में रमेश साहू की खूब तारीफ की. पीएम ने कार्यक्रम में कहा कि रमेश साहू जैसे लोगों की सफलता, ऊर्जा भरने का काम करती है.

रमेश साहू को इंटर यानी बारहवीं की परीक्षा में 377 अंक मिले हैं. दिलचस्‍प बात यह रही कि रमेश को इस बात की जानकारी नहीं थी. ऐसे में वह जिस लॉर्ड बुद्धा कॉलेज में पढ़ते हैं, वहां के डायरेक्टर अनिरुद्ध चौबे ने गांव पहुंच रमेश को मोबाइल से पीएम के मन की बात सुनाई.

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मोबाइल के जरिये PM की मन की बात को सुनते हुए रमेश साहू

प्रधानमंत्री के मुंह से तारीफ सुनकर रमेश और उनके परिवार वालों की आंखों से खुशी के आंसू छलक उठे. रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी से तारीफ सुनना सपने जैसा है. रमेश ने कहा कि पीएम की तारीफ ने उनके जज्‍बे को और बढ़ाने का काम किया है. Ramesh Sahu Mann ki Baat

रमेश के पिता लक्ष्मण साहू मजदूर हैं. वह ईट भट्ठे में काम करते हैं. जिस समय इंटर आर्ट्स का रिजल्‍ट आया, उस समय पिता मजदूरी कर रहे थे और रमेश भी गांव में लगे मेले में बैलून बेच रहा था. घर की आर्थ‍िक हालत बहुत अच्‍छी नहीं है, लेकिन पढ़ाई करने की रमेश की लालसा लगातार संघर्ष कर रही है.

रमेश आगे की पढ़ाई जारी रखना चाहते हैं. लिहाजा खुद भी लगातार मेहनत कर पैसे जुटा रहे हैं. उन्‍होंने रांची में आगे की पढ़ाई के लिए एडमिशन करवाया है. लेकिन परिवार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बेटे को बाहर रखकर पढ़ाना और खर्च वहन करना है.

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एक लाख रुपये की मदद का चेक रमेश साहू को देते अधिकारी

प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के बाद राज्‍य के मुख्यमंत्री रघुबर दास ने रमेश को आगे की पढ़ाई में मदद के लिए एक लाख रुपये देने की घोषणा की है. पिता लक्ष्मण साहू बेटे को अफसर बनाना चाहते हैं. हालांकि, वह यह भी कहते हैं कि ईट भट्ठे पर मजदूरी से इतना पैसा नहीं आता कि वह रांची में रखकर बेटे को पढ़ा सके.

लक्ष्‍मण कहते हैं, ‘मैं कई बार खुद को कोसता हूं. बेटा मेले में गुब्बारे और खिलौने बेचता है ताकि वह पढ़ाई का खर्च खुद उठा सके. लेकिन अब जब रमेश रांची चला जाएगा तो उन्‍हें अकेले ही काम कर सबकुछ का खर्च उठाना पड़ेगा. रमेश की मां का 9 साल पहले ही निधन हो गया है.

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