मुसीबत का समय ही होता है जब इंसान के चरित्र की परीक्षा होती है, कुछ लोग होते है जो परिवार या स्वयं की ज़िन्दगी में आयी परेशानी के सामने घुटने तक देते है लेकिन कुछ लोग होते है जो मुसीबत के समय में अपनी मेहनत और धैर्य से जिंदगी संवार देते है। किसी ने ठीक ही कहा है कि अगर सपनों को हकीकत में बदलने की चाहत हो तो मेहनत के बलबूते कुछ भी हासिल किया जा सकता है। इस बात को सौ फीसदी प्रमाणित किया हैं राजस्थान के नागौर जिले की दो महिलाएं।

रिश्तों में सास और बहू ने मिलकर अपनी काबिलियत के दम पर घर पर पड़े मजबूरियों के घने बादलों को पस्त कर दिया। ये कहानी है 68 साल की लक्ष्मी और उनकी बहू अनुराधा की। दरअसल मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाली लक्ष्मी के घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, ऊपर से जवान बेटे के असमय देहांत के बाद मानों उन पर ग़मों का पहाड़ टूट पड़ा। इसी विपदा की घड़ी से उनकी सफलता की नींव पड़ी।

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घर के एकमात्र कमाऊ पारिवारिक सदस्य को खोने के बाद उन्होंने घर से मात्र सिर्फ 125 रुपयों से महिला स्वयं सहायता समूह के जरिए मसालों एवं पापड़ का कारोबार शुरू किया। शुरुआत दिखने में काफी छोटी थी, लेकिन इस शुरुआत के पीछे मकसद सिर्फ यही था कि उन्हें दो वक्त की रोटी ढंग से मिल सके और घर का गुजारा हो सके। यह सन 2000 का वक्त था, उस वक्त ग्राहकों के पास नजदीकी रिटेल दुकान के पास जाने के अलावा कोई विकल्प मौजूद नहीं था।

आज जहाँ फ्लिपकार्ट एवं अमेज़ॉन जैसे मार्केटप्लेस उपलब्ध नहीं थे और भारत में इ-कॉमर्स की नींव भी नहीं पड़ी थी । लक्ष्मी और अनुराधा अपने घर पर मसाले एवं पापड़ तैयार करके नजदीकी मार्केट में बेच देती थीं। शुरुआत में ग्राहकों को अपने प्रोडक्ट्स बेचने के लिए काफी मेहनत काफी करनी पड़ती थी लेकिन मेहनत के बदले उन्हें बहुत कम मुनाफा मिलता था ।

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लक्ष्मी और उनकी बहू अनुराधा ने हार इस मुसीबत के समय में हर नहीं मानी और अपने घर को सुचारु रूप से चलाने के प्रयास में लगी रहीं। उत्तम गुणवत्ता एवं वाजिब दाम के बलबूते उन्होंने अपना कारोबार धीरे-धीरे बढ़ाना शुरू किया । साँस -बहु की मेहनत रंग लायी और एक वक्त ऐसा भी आया कि राजस्थान के साथ ही पड़ोसी राज्यों में उनके मसालों की गुणवत्ता की तारीफ होने लगी।

उन्होंने शुरुआत में राजस्थान में लगने वाले कृषि और उत्पाद एवं हाट मेलों में अपने मसालों एवं पापड़ की प्रदर्शनी और बिक्री के लिए जाती थीं। इसके बाद जब लोगों के पास इंटरनेट की पहुँच बढ़ने लगी और सबके हाथों में स्मार्टफोन एवं इंटरनेट की पहुँच आसान होने लगी तो अनुराधा ने तकनीक एवं सोशल मीडिया की अहमियत को समझते हुए ,अपने कारोबार को इंटरनेट के जरिये फैलाना शुरू किया।

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आज सोशल मीडिया एवं इंटरनेट के प्रभाव से उनके मसाले एवं पापड़, भारत के विभिन्न शहरों के साथ ही अंतराष्ट्रीय शहरों जैसे दुबई में भी बिकने के लिए जाते हैं। अनुराधा ने व्हाट्सएप्प का बेहतरीन उपयोग करते हुए, अनु-कलेक्शन नाम से महिला एवं पुरुष के दो अलग – अलग ग्रुप बनाकर वॉट्सऐप के माध्यम से वे घरेलू खाद्य उत्पाद जैसे की मसाले एवं पापड़ के ऑर्डर लेकर डाक एवं अन्य पार्सल माध्यमों से ग्राहकों के घर पर अपने उत्पाद पहुंचा रही है।

अपनी जिंदगी में अथाह संघर्ष के बाद उम्र के इस पड़ाव पर आकर तमाम मुसीबतों एवं कठिनाइयों का सामना करने वाली लक्ष्मी कहती हैं कि “उनकी सफल का मूलमंत्र यही है कि मुसीबत के समय पर खुद पर विश्वास रखना बहुत जरूरी है और आत्मविश्वास के सामने कोई परेशानी बड़ी नहीं होती। अपनी मेहनत और संघर्ष के लिए भरोसे के साथ अपनी पूरी ताकत के साथ लग जाये, तो कोई भी आपदा या परिस्थिति आपको कमजोर नहीं कर सकती।

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इस उम्र में भी जुझारूपन का जीता-जागता उदाहरण बन चुकी लक्ष्मी ने अपने परिवार को टूटने नहीं दिया और आज उन तमाम युवा उद्यमियों के लिए मिसाल हैं जो अपने क्षेत्र में आयी मुसीबत के सामने किसी कारण से हार मान जाते हैं। साँस और बहु कि जोड़ी, लक्ष्मी एवं अनुराधा की कहानी उन सब के लिए एक नयी राह दिखलाती है जो जीवन में किसी ने किसी मुसीबत से घिरे हुए है या खुद का काम शुरू करना चाहते हैं।

Be Positive  लक्ष्मी और अनुराधा के साहस और कभी हार न मानने के ज़ज्बे को सलाम करता है ।

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