हमारे देश में भले ही स्कूलों में नए सिलेबस जोड़ने को लेकर सियासत गरमा जाती है। कभी किसी नेता का नाम शामिल करने की बात पर तो कभी किसी क्रांतिकारी का जिक्र हटाने को लेकर देश में बहस छिड़ी रहती है, लेकिन बावजूद इसके हमारे ही देश के किसी छोटे से गांव को विदेशी स्कूलों में जगह दी जाए, यह अपने आप में हैरान कर देने वाली है। लेकिन ये सच है। जहां राजस्थान के एक छोटे से गांव को डेनमार्क की सरकार ने अपने स्कूली सिलेबस में शामिल किया, जो कि किसी हैरानी से कम नहीं है।

हमारे देश के कई हिस्सों में आज भी लड़कियों के जन्म को लेकर परिवार के लोग उन्हें बोझ ही समझते हैं। लेकिन राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित पिपलांत्री गांव समाज की इस रुढ़ीवादी और छोटी से काफी आगे निकल चुका है। इस गांव में पैदा होने वाली लड़कियों को बोझ नहीं बल्कि उन्हें सौभाग्य के रुप में समझा जाता है, और यही कारण है कि डेनमार्क की सरकार ने इस गांव को अपने स्कूली सिलेबस में शामिल किया। जिसके कारण ना केवल इस गांव को पहचान मिली है, बल्कि राजस्थान के साथ-साथ देश का भी मान बढ़ाया है।

उदयपुर से तक़रीबन 70 किलोमीटर दूर राजसमंद ज़िले में एक ग्राम पंचायत है पिपलांत्री । 5,100 की आबादी वाली यह ग्राम पंचायत विकास के नित नए सोपान रच रही है।  अरावली की संगमरमर की पहाड़ियों पर बसे पिपलांत्री को देखकर गर्व होता है कि भारत गांवों का देश है और अब गांव भारत के लोकतंत्र को सही मायनों में परिभाषित कर रहे हैं।  यह यहां के लोगों द्वारा मिलजुल कर लिए गए फैसलों का ही नतीजा है कि पिछले कई सालों से सूखे की मार झेल रहे पिपलांत्री की पहाड़ियों से मीठे पानी के स्रोत फूट रहे हैं और पत्थरों पर फूल खिल रहे हैं।

देश की सरकारें भले ही बेटियों को उनका हक और उन्हें समाज में समाज दर्जा दिलाने के लिए आए दिन नई-नई घोषनाएं करती हैं, लेकिन पिपलांत्री जैसे छोटे से गांव में अगर किसी भी घर में बेटी का जन्म होता है, तो उसका जश्न पूरा गांव मनाता है। बेटियों के जन्म को लेकर गांव इतना उत्साहित और खुश होता है कि जिसके आंगन में बेटी का जन्म होता है, वहां के लोग इस खास मौके पर 111 पौधे लगाने का साथ-साथ उनकी देख-रेख का संकल्प भी लेते हैं। जो कि अपने आप आज के समाज को देखते हुए बड़ी बात है।

piplantri-1
पेड़ को राखी बांध कर उनकी रक्षा का वचन देती पिपलांत्री गांव की महिलाये

आपको बता दें कि डेनमार्क के स्कूली सिलेबस में इस गांव को शामिल किए जाने के बाद वहां के प्राइमरी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को अब इस गांव की कहानी पढ़ाई जाती है। साल 2014 में डेनमार्क से मास मीडिया यूनिवर्सिटी की दो छात्राएं यहां पढ़ने आई थी, तब उन्होंने बताया कि डेनमार्क सरकार ने तमाम देशों के 110 प्रोजेक्ट्स में से पिपलांत्री गांव को टॉप-10 में शामिल किया है। तो वहीं इस पिपलांत्री गांव में बेटियों के जन्म को उत्सव की तरह मनाने के पीछे भी एक खास वजह है।

यहां के पूर्व सरपंच श्यामसुंदर पालीवाल की बेटी के कम उम्र में मौत होने के बाद उन्हें इस बात का इनता दुख हुआ कि उन्होंने अपनी बेटी की याद में पूरे गांव के लिए यह अनिवार्य कर दिया कि जब भी कभी गांव के किसी भी घर में लड़की पैदा होगी तो पूरा गांव जश्न मनाने के साथ 111 पौधे भी लगाएगा। और इस तरह उसके बाद से इस गांव में यह सिलसिला चल पड़ा और आज भी जारी है।

आप गांव में घूमेंगे तो वैसा कतई नहीं लगेगा, जैसा राजस्थान के किसी दूरदराज के गांव का खयाल आने पर एक तस्वीर उभरती है । पूरे गांव में पक्की सड़कें, हर घर में पानी का कनेक्शन, दूधिया स्ट्रीट लाइटों से जगमगाती गलियां, प्राइमरी से लेकर इंटर तक अच्छे स्कूल-कॉलेज, महापुरुषों की प्रतिमाओं से सजे चौराहे और स्थानीय लोगों को सुकून देता यहां का वातानुकूलित पंचायत भवन । यानी वह हर सुख-सुविधा, जो किसी अच्छे शहर में भी मयस्सर नहीं होती ।

पिपलांत्री में विकास की जो इबारत लिखी जा रही है, उसकी कहानी ज़्यादा पुरानी नहीं है ।  तक़रीबन 6-7 साल पहले तक गांव वाले नहीं जानते थे कि पंचायत का मतलब क्या होता है अथवा पंचायत द्वारा गांव के विकास के लिए कोई काम कराए जा भी रहे हैं या नहीं । चूंकि यह गांव संगमरमर की पहाड़ियों पर बसा है और इसके चारों ओर बड़े पैमाने पर संगमरमर के खनन का काम होता है।

खनन के दौरान निकलने वाले मलबे को गांव में ही डाला जाता था, जिससे यहां न केवल पत्थरों के मलबे के पहाड़ बन रहे थे, बल्कि गांव की ज़मीन और आबोहवा भी ख़राब हो रही थी । गांव वालों ने तो इसे जैसे अपनी नियति ही मान लिया था । पंचायत की बागडोर पिछले 3 दशकों से एक ही परिवार के हाथों में थी । वर्ष 2005 में जब ग्राम पंचायत के चुनाव हुए तो पंचायत की बागडोर गांव के ही नौजवान श्याम सुंदर पालीवाल के हाथ में आ गई ।

piplantri-2
एलोवेरा ( ग्वार भाठा) के प्रोडक्ट बनती पिपलांत्री ग्राम पंचायत

श्याम सुंदर पालीवाल ने सरपंच बनते ही सबसे पहले पंचायत घर को दुरुस्त कराया । पालीवाल बताते हैं, चूंकि पंचायत घर में गांव के हर वर्ग के लोग आते हैं।  यहां बैठकर लोगों को सुकून मिले, इसलिए हमने इसकी इमारत को दुरुस्त कराया, एयर कंडीशनर लगवाया, आरामदायक कुर्सियों-सुंदर फर्नीचर एवं बिजली-पानी की व्यवस्था की । यानी हमने पंचायत को सभी सुविधाओं से लैस कराया. पिपलांत्री में राजस्थान का पहला वातानुकूलित पंचायत घर है।

पालीवाल बताते हैं, गांव में समस्याओं का अंबार लगा था ।  काम बहुत करने थे, लेकिन काम कहां से और कैसे शुरू करें, इसके लिए मैंने ग्रामसभा का सहारा लिया । शुरुआत हुई शिक्षा में सुधार से । पंचायत घर से शुरू हुई गांव के विकास की यात्रा स्कूल-कॉलेज, सड़क, पानी एवं स्ट्रीट लाइट से होती हुई आज तक बदस्तूर जारी है।

पिपलांत्री में खास बात यह है कि यहां के हर काम में गांव के लोग जुड़े हुए हैं । मसलन यहां स्ट्रीट लाइटें सड़क पर किसी खंभे पर न लगकर घरों के बाहर लगी हैं।  उनका कनेक्शन घर के मीटर से है। स्ट्रीट लाइट के बिजली ख़र्च से लेकर रखरखाव तक पूरी ज़िम्मेदारी संबंधित घर पर है।  जो परिवार स्ट्रीट लाइट का रखरखाव नहीं करता, उसके घर से वह लाइट उतरवा ली जाती है।

पत्थरों के इस गांव में लहलहाती हरियाली और झूमते पेड़ सरकार द्वारा चलाई जा रही पर्यावरण बचाने की मुहिम के लिए एक प्रेरक मिसाल हो सकते हैं ।  यहां पेड़ लगाना पर्यावरण के लिए महज़ खानापूर्ति नहीं है, बल्कि एक रिश्ता है, स्नेह है। गांव वाले अब तक एक लाख से भी ज़्यादा पेड़-पौधे लगा चुके हैं । इसमें गांव की महिलाओं की भागीदारी सबसे ज़्यादा है । गांव में हर किसी के  नाम से एक पेड़ लगा हुआ है ।  उसकी सिंचाई, काट-छांट और देखभाल की ज़िम्मेदारी उसी पर है ।  गांव में जब किसी की मृत्यु होती है तो उस परिवार के लोग उसकी याद में 11 पेड़ लगाते हैं और हमेशा के लिए उनकी देखभाल की ज़िम्मेदारी संभालते हैं।

यह भी पढ़ेउधार के लिए पैसे से ट्रक खरीद कर 2000 करोड़ की ट्रांसपोर्ट कंपनी बनाने वाला उद्यमी

जब किसी घर में लड़की का जन्म होता है तो ग्राम पंचायत द्वारा उस लड़की के नाम 18 साल के लिए 10 हज़ार रुपये की धनराशि जमा की जाती है, मगर लड़की के मां-बाप द्वारा तब तक हर साल 10 पौधे रोपे जाते हैं । इस तरह लड़की के ब्याह लायक़ कुछ पैसे जमा हो जाते हैं और गांव को 180 पेड़ मिल जाते हैं ।  पेड़ों को बचाने के लिए गांव में एक अनोखी मुहिम चलाई गई है । रक्षाबंधन के दिन गांव की महिलाएं पेड़ों को अपना भाई मानकर उन्हें राखी बांधती हैं और उनकी सुरक्षा का वचन देती हैं।

श्याम सुंदर पालीवाल बताते हैं कि पेड़ लगाने व़क्त कुछ बातों का ख्याल रखा जाता है।  ज़्यादातर फलदार पौधे लगाए जाते हैं, ताकि जब ये पेड़ बनकर फल दें तो गांव की ग़रीब महिलाएं उन फलों को बेचकर कुछ पैसे कमा सकें।  गांव में बड़े पैमाने पर एलोवेरा यानी ग्वारपाठा लगाया जा रहा है। गांव की हर पहाड़ी और हर रास्ते में एलोवेरा लगा है । पंचायत की योजना है कि यहां एलोवेरा जूस का प्लांट लगाकर ख़ुद ही उसकी बिक्री की जाए ।

वैसे तो पंचायत के हर काम में गांव के हर आदमी की भागीदारी है, मगर फिर भी सभी जानकारियों को गांव की वेबसाइट पिपलांत्री डॉट कॉम पर समय-समय पर डाला जाता है ।  श्याम सुंदर पालीवाल अब पूर्व सरपंच बन चुके हैं, मगर वह आज भी हर काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।  साफ-सफाई की बदौलत पिपलांत्री को निर्मल ग्राम पंचायत का खिताब मिल चुका है ।  पिपलांत्री ग्राम पंचायत से 7 और गांव जुड़े हैं । पिपलांत्री की तरह उन सभी गांवों में भी पक्की सड़कें, सामुदायिक शौचालय और पेयजल कनेक्शन हैं ।

piplantri-village-product
गांव में बने प्रोडक्ट्स को पिपलांत्री ब्रांड से बेचा जा रहा है

गांव के लोग पर्यावरण को लेकर कितने जागरूक हैं, इस बात का अंदाज़ा यहां मौजूद सोलर स्ट्रीट लाइट, सोलर वाटरपंप और झूला पंपों को देखकर लगाया जा सकता है ।  यहां स्कूलों में ज़मीन से पानी निकालने और उसे टंकी में इकट्ठा करने के लिए झूलों की मदद ली जाती है ।  एक स्कूल में चकरी वाला झूला लगा है । बच्चे उसे घूमाते हैं और उस पर झूलते हैं। झूलों से खींचे गए पानी को स्कूल में पीने और साफ-सफाई आदि के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

गांव में संगमरमर के पहाड़ हैं । यहां कई बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा खनन का काम हो रहा है ।  वे सारा मलबा गांव की ज़मीन पर डालती आ रही थीं ।  श्याम सुंदर पालीवाल ने गांव वालों को साथ लेकर कंपनियों का विरोध किया । चूंकि कंपनियों के पास ग्राम पंचायत और प्रशासन की एनओसी थी, इसलिए पालीवाल को पूर्व सरपंच और स्थानीय प्रशासन से भी टकराना पड़ा । आख़िरकार जीत गांव वालों की हुई । आज इन खदानों से ग्राम पंचायत को आमदनी भी होने लगी है ।

ये लेख इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार लिखा गया है, अगर आपको इस लेख में दिए गए तथ्यों या जानकारी से आपत्ति है तो हमें कमेंट बॉक्स में जरूर सुझाव दे ।)

यह भी पढ़ेदोस्तों से उधार लेकर भारत की कोल्ड ड्रिंक इंडस्ट्री को बदल देने वाला उद्यमी

यह भी पढ़ेहर तीसरा भारतीय इनका प्रोडक्ट इस्तेमाल करता है लेकिन आप इन्हे नहीं जानते है

यह भी पढ़े : किसान के बेटे से अरबों रुपये का बिज़नेस साम्राज्य खड़ा करने वाला उद्यमी

यह भी पढ़ेलाखों के कर्जे के बाद देश की बड़ी डिजिटल मीडिया कंपनी बनाने वाले शख़्स का सफर

 

Comments

comments