किसी भी बड़े लक्ष्य को पाने की शुरुआत छोटे से प्रयास से ही होती है.

सरकारी स्कूल का जिक्र आते ही है. पुराने कमरे, दरी एवं आँगन पर बैठे छात्र, बदहाल पानी एवं बिजली की व्यवस्था और स्कूल परिसर में भ्रमण करते आवारा पशु लेकिन अगर आपको कोई कहे कि एक सरकारी स्कूल है जिसमे एडमिशन के लिए बच्चे प्राइवेट स्कूल छोड़कर आते है. कमरों एवं विद्यालय भवन की दीवारे शानदार पेंटिंग्स से सुसज्जित है. पीने के लिए साफ़ पानी और विकलांगों के लिए व्हीलचेयर समेत रैंप जैसी विशेष व्यवस्थाए हो तो एक बार विश्वास करना मुश्किल होता है लेकिन ऐसा ही कुछ हो रहा है उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के रजपुरा गांव में.

यह संभवतया पहला सरकारी प्राइमरी स्कूल है जहाँ पर प्राइवेट स्कूल को छोड़कर एडमिशन के लिए होड़ लगी रहती है. लेकिन 2013 से पहले ये भी सामान्य सरकारी स्कूल ही था लेकिन 2013 में पुष्पा यादव (Pushpa Yadav) यहाँ हेड टीचर बनकर आयी तो इस स्कूल का कायाकल्प हो गया.

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इस स्कूल में एडमिशन के लिए होड़ लगती है | Photo Credits : India.com

ग्रामीण इलाकों में भी लोग अपना पेट काटकर अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेजते है लेकिन पुष्पा यादव ने राजपुरा इलाके के लोगो की धारणा को बदल दिया. ‘सरकारी है’, लेकिन इस स्कूल ने इलाके के प्राइवेट स्कूलों को मात दे दी है. आज यह स्कूल पुरे देश के लिए मॉडल बन गया है.

बच्चे जमीन पर नहीं बैठते. फर्नीचर है. टाइल्स लगे हैं. दीवारों पर पेंटिंग है. दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष व्यवस्था है. समर कैंप होता है. यहां तक कि बच्चों के लिए लाइब्रेरी है. हेल्थ कैंप होता है. रोजगार परक ट्रेनिंग भी दी जाती है. ये उत्तर प्रदेश का संभवतः पहला ऐसा स्कूल है, जहां एलईडी के जरिए स्मार्ट क्लासेस होती हैं. असर ये है कि इलाके के लोग अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल से निकाल इस स्कूल में भेज रहे हैं.

मेरठ के प्राइमरी विद्यालय, रजपुरा का हाल दूसरी जगहों की तरह ही था, लेकिन अब तस्वीर बदल गई है. इसकी वजह बनी हैं यहां की हेड टीचर पुष्पा यादव. वह बताती हैं कि 2013 में जब विद्यालय में हेड टीचर बनकर आईं तब हाल बुरा था. स्कूल के अंदर जानवर बंधे रहते थे.

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स्कूल के कई काम खुद हेड टीचर पुष्पा यादव ने करवाए है | Photo Credits : India.com

India.com से बात करते हुए पुष्पा बताती हैं कि स्कूल में चार दीवारी तक नहीं थी. दूर से देखने पर झाड़ी से ढका जर्जर भवन दिखाई देता था. उन्होंने इस स्कूल को बदलने का ठान लिया. विभाग से अनुरोध कर सबसे पहले चारदीवारी बनवाई. इसके बाद की कोशिशें खुद ही कीं.

पुष्पा बताती हैं कि उन्होंने जेब से रुपए खर्च कर बड़ा गेट लगवाया. स्कूल की दीवारों पर पेंटिंग अपनी भाभी के साथ मिलकर खुद की. साफ़-सफाई कराई. स्थानीय जनप्रतिनिधियों व सामाजिक संगठनों से संपर्क किया. किसी ने फर्नीचर उपलब्ध कराया तो किसी ने स्मार्ट क्लास के लिए एलईडी सहित दूसरा सामान. लाइब्रेरी में बच्चों को पढ़ने के लिए अलग टाइम दिया जाता है. लाइब्रेरी की किताबें उन्होंने खुद जुटाई हैं. खेल के लिए सामान, बच्चों को रोजगार परक शिक्षा/प्रशिक्षण, लड़कियों को सिलाई-कढ़ाई, आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है.

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दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष सुविधाए दी गयी है | Photo credits : India.com

पुष्पा बताती हैं कि गांव में कई दिव्यांग बच्चे थे जो स्कूल नहीं जा पाते थे. उन्होंने व्हील चेयर की व्यवस्था कराई. दिव्यांग बच्चों को फिजियोथेरेपी के जरिए ठीक करने का प्रयास किया जा रहा है. स्कूल में 155 एडमिशन हैं. उपस्थिति शत-प्रतिशत रहती है.

पुष्पा यादव अब मिसाल बनी चुकी हैं. उन्हें 2017 में यूपी की बीजेपी सरकार द्वारा सम्मानित किया जा चुका है. जिला प्रशासन द्वारा सम्मान बेस्ट टीचर अवार्ड, समाज कल्याण ट्रस्ट द्वारा बेसिक शिक्षा रत्न अवार्ड सहित कई अवार्ड दिए जा चुके हैं.

बी पॉजिटिव इंडिया, पुष्पा यादव के प्रयासों की सराहना करता है और उम्मीद करता है कि ऐसी कोशिशें हर जगह हों तो समाज एवं देश की दिशा ही बदल जाएगी.

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