एक छोटे से गांव जहाँ पर पढ़ने के लिए कोई विद्यालय की व्यवस्था नहीं हो और रोज सुबह 2 किलोमीटर पैदल चलकर पढ़ने के लिए नजदीकी विद्यालय में जाना और शाम को सूरज ढलने से पहले खेत का काम निपटा कर पशुओं को घर लेकर आना दिनचर्या का हिस्सा हो तो आप उस शख्स के संघर्ष का अंदाज लगा सकते है ।

आज जब बच्चों को सभी भौतिक सुख-सुविधाए मिलती है लेकिन फिर भी वो पढाई न करने के बहाने बनाते है तो उनको जरूर इस शख्स की कहानी सुनानी चाहिए जो एक किसान परिवार में पैदा होकर के राजस्थान की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में बॉटनी जैसे विषय का प्रोफेसर बन जाता है.

फिर अपनी प्रतिभा के दम पर उसी यूनिवर्सिटी के कुलपति बन जाते है और रिटायरमेंट के कुछ ही समय बाद राजस्थान के सेकेंडरी शिक्षा बोर्ड (RBSE) के अध्यक्ष बन जाता है । उस अंतहीन संघर्ष और मेहनत का नाम है – प्रो.  बी एल चौधरी (Pro B L Chaudhary)

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प्रो चौधरी का जन्म राजसमंद के रेलमगरा तहसील में जीवा खेड़ा  गांव में हुआ , यह गांव तहसील से मात्र 2 किलोमीटर दूर है लेकिन उस समय सुख – सुविधाए शायद 2 दशक दूर थी । किसान परिवार में जन्म लेने वाले प्रो. चौधरी ने बचपन से ही संघर्ष और मेहनत को अपना मूलमंत्र बना दिया था क्योंकि उन्हें पढ़ने के लिए भी पैदल 2 किलोमीटर चल कर जाना पड़ता था । स्कूल से घर आते ही अपने पिता की मदद करने के लिए खेतों का रुख करना उनकी नियमित दिनचर्या का हिस्सा था ।

खेतों के थकावट भरे काम के बाद भी प्रो. चौधरी पढाई के लिए समय निकाल देते थे और लालटेन की कमजोर रोशनी में अपने भविष्य की मजबूत नीव बनाने के लिए जमकर मेहनत करते थे ।

अपनी स्कूली शिक्षा ख़त्म करने के बाद साइंस में स्नातक करने  के बाद उन्होंने MLS यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए । चौधरी ने 1975 में बॉटनी के असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में सुखाडिया विश्वविद्यालय में सेवा शुरू की।

अपने कॉलेज के शिक्षण के दौरान ही उन्होंने कई उपयोगी किताबों का सृजन किया जो आज भी बॉटनी विषय में कई छात्रों के लिए मुख्य पुस्तक रही है । कॉलेज में पढ़ाते – पढ़ाते वो प्रोफेसर के पद पर अपनी प्रतिभा के दम पर पदोन्नत हुए ।

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1997 में उन्होंने MLS यूनिवर्सिटी में बायोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट की स्थापना की और पोस्ट-ग्रेजुएट और ग्रेजुएट के कोर्स चालू करवाए । MLS Udaipur उन चंद यूनिवर्सिटीज में शामिल हो गया जिनमे विशेषकर बायोटेक्नोलॉजी के लिए  पढाई करवाई जाती थी ।

अपने शिक्षण के दम पर छात्रों के चहते बने प्रो. चौधरी ने 2004 में कुलपति के रूप में कार्यभार संभाला और अपने अनुभव के दम पर नवाचार और रिसर्च के लिए कई सराहनीय कार्य किये ।

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2007 में कुलपति के पद से रिटायरमेंट के बाद भी बॉटनी विभाग में सीनियर प्रोफेसर की तर्ज पर कार्य करते रहे और 2011 में अपने शिक्षण कार्य से रिटायरमेंट के बाद भी वो शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े रहे और कई निजी और सरकारी कॉलेज में गेस्ट लेक्चरर के रूप में कार्य किया ।

प्रो चौधरी के पास फिलहाल विज्ञान भारती व विद्या भारती के चित्तौड प्रांत के अध्यक्ष का दायित्व है। उन्हें राज्य लोकसेवा आयोग(आरपीएससी) चेयरमैन पद का भी दावेदार माना जा रहा था। गत विधानसभा चुनाव के समय ही प्रो. चौधरी ने औपचारिक रूप से भाजपा की सदस्यता ग्रहण की थी।

2014  में अपने रिटायरमेंट के 3 साल बाद वो राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के चैयरमेन 3 वर्ष के लिए  नियुक्त हुए है । अभी प्रो. चौधरी अपने प्रशासनिक अनुभव से राजस्थान बोर्ड को दुरुस्त करने में लगे हुए है और कुछ आमूलचूल परिवर्तन भी किये है जिससे अब समय पर परिणाम घोषित करने एवं परीक्षा में पारदर्शिता और नक़ल रोकने के लिए विशेष प्रावधान करना भी शामिल है ।

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अगर हौसलों की उड़ान हो तो इंसान कहा तक पहुंच जाता है , यह प्रो चौधरी ने अपनी क़ाबलियत से साबित कर दिया है और सुविधाओं का रोना रोने वाले के सामने एक उदहारण बन गए है ।

Disclaimer : ये कहानी इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार लिखी गयी है और किसी भी व्यक्ति, ग्रुप या समूह को दिए गए तथ्यों या जानकारी में कोई आपत्ति है तो आप अपने सुझाव हमें  srijanyoga2016@gmail.com  पर ईमेल कर सकते है ।

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