किसी भी बैडमिंटन खिलाड़ी के लिए बैडमिंटन खेलने के लिए रैकेट बहुत महत्वपूर्ण होता है लेकिन इस खिलाड़ी के लिए रैकेट के साथ ही इन्हेलर भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।  यह खिलाड़ी आगे जाकर 32 साल बाद बैडमिंटन खेल में कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास बना देता हैं।

साल 2012 में खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन के चलते अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया जाता हैं। यह खिलाड़ी अपनी शारीरिक कमजोरी को अपनी ताकत बना देता है । बैडमिंटन खेल में भारत का बेहतरीन खिलाड़ी बन जाता हैं। पुलेला गोपीचंद के शागिर्द और चैम्पियन खिलाड़ी का नाम हैं – पी. कश्यप ( P Kashyap )

आजकल पी कश्यप एक बार फिर चर्चा में हैं। भारतीय शटलर साइना नेहवाल और पी कश्यप दोनों जल्द ही शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं। दोनों पिछले दस सालों से एक दूसरे को जानते हैं और अपने परिवार की रजामंदी से परिणय सुत्र में बंधने वाले हैं।

पी कश्यप ने अपने प्रोफेशनल कैरियर में कई खिताब अपने नाम किए है। वो लगातार अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में भारतीय टीम का हिस्सा बने हुए हैं। 2012 के लंदन ओलंपिक में क्वार्टर फ़ाइनल में पहुंचने वाले पहले पुरुष भारतीय खिलाड़ी बने। 2010 के दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों में टीम स्पर्धा में रजत पदक और एकल स्पर्धा में ब्रॉन्ज मेडल जीता।

2014 के ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेलों में पी कश्यप ने स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसी के साथ 2016 में चीन और मलेशिया जैसी मजबूत टीम होने के बावजूद इन्होंने भारतीय बैडमिंटन टीम को ब्रॉन्ज मेडल जीताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसी के साथ BWF  सुपर सीरीज में लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। 2018 में ऑस्ट्रेलियन ओपन जीतकर अपनी फॉर्म साबित की है। अभी पी कश्यप 2020 टोक्यो ओलंपिक की तैयारी कर रहे हैं।

जितना पी कश्यप का कैरियर सुनहरा रहा है , इसके पीछे उनके अदम्य साहस और कड़ी मेहनत को श्रेय जाता हैं। आंध्रप्रदेश के गुंटूर में 8 सितम्बर 1986 को उदय शंकर और सुभद्रा के घर में हुआ। उनके पिता उदय शंकर एक सरकारी नौकरी करते थे और उनका लगातार ट्रांसफर होता रहता था।

जब पी कश्यप ग्यारह साल के थे तब उन्हें हैदराबाद के SM Arif के ट्रेनिंग कैंप में भर्ती करवाया। सोलह वर्ष की उम्र तक पी कश्यप ने अपने खेल से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना ली। उन्होंने नेशनल के फाइनल में चेतन आनंद को हराकर आंध्र प्रदेश को स्वर्ण पदक दिलाया था।

इसी बीच उनके पिता का ट्रांसफर बैंगलोर हो गया। पी कश्यप ने यहां पर भी खेलना जारी रखा लेकिन अस्थमा के कारण वो बीमार रहने लगे। लगभग तीन साल तक बैंगलोर में रहने के दौरान उन्हें स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं का सामना करना पड़ा।

2004 में उन्हें अस्थमा की बीमारी का पता चला। एक बार को तो लगा कि उनका कैरियर खत्म हो गया लेकिन इलाज के बाद मजबूत आत्म विश्वास के चलते पी कश्यप ने अस्थमा के खिलाफ जंग जितना शुरू कर दिया।

इसके बाद उनके पिता ने वापस हैदराबाद में रहने का फैसला किया।  हैदराबाद आने के बाद उन्होंने पुलेला गोपीचंद की एकेडमी ज्वाइन की। शरीर की समस्याओं और लिमिटेशन को दूर करते हुए उन्होंने अपने खेल को संवारना शुरू कर दिया।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आज भी पी कश्यप रोज अस्थमा के इलाज के लिए रोजाना दवाई का इस्तेमाल करते हैं। अपने मैच के दौरान भी उन्हें इन्हेलर का इस्तेमाल करते हुए देखा जाता है।

इन सभी समस्याओं के बावजूद पी कश्यप ने अपने खेल को इतना आगे लेकर गए हैं कि आज भारत का हर बच्चा उनको रोल मॉडल मानता हैं।

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