देश या समाज का विकास तभी संभव है, जब अंतिम छोर में खड़ा आदमी भी लाभान्वित हो.

इसी लक्ष्य को लेकर झारखण्ड के एक सामाजिक कार्यकर्त्ता ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया. नक्सल प्रभावित राज्य के बिरहोर समुदाय के लोगो को सामाजिक न्याय दिलाने के साथ ही उनके अच्छे एवं बुरे समय के साथी बने. आदिवासी इलाकों में सरकारी योजनाओं को आमजन तक पहुँचाया है. झारखंड के गरीब लोगों में यह सामाजिक कार्यकर्त्ता अमिट छाप छोड़ चुके है. व्यक्तिगत जीवन में कड़े संघर्ष के बाद शिक्षा पाई लेकिन लोगो के जीवन में उजाला किया है ओंकार विश्वकर्मा (Onkar Vishwkarma).

ओंकार विश्वकर्मा का जन्म झारखंड राज्य के कोडरमा जिला के डोमचांच गांव में हुआ. संग्राम (Sangram) नामक सामाजिक संगठन के जरिये ओंकार झारखण्ड के गरीब लोगो खासकर बिरहोर समुदाय में शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार के लिए प्रयत्नशील है. सरकारी योजनाओं के साथ ही लोगो के साथ मिलकर लोगो की बेहतरी के लिए काम कर रहे है.

बी पॉजिटिव इंडिया से बातचीत के दौरान ओंकार विश्वकर्मा बताते है कि बचपन गरीबी में बीता. कम उम्र में ही पिता ने दूसरी शादी कर ली तो उन्होंने मुझे और मेरी माँ को अकेला छोड़ दिया. माँ की बीमारी के बाद घर के हालत बिगड़ गए और पिता ने घर छोड़ दिया.

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बिरहोर समुदाय के बच्चों के नाख़ून काटते हुए ओंकार

इस हालात में घर में बूढी दादी और माँ की जिम्मेदारी मेरे कंधो पर आ गयी. आस-पड़ोस और ननिहाल की मदद से कुछ दिन निकले लेकिन घर चलाने के लिए गैराज पर मजदूरी करनी पड़ी. पढाई और काम में सामंजस्य बिठाने की भरपूर कोशिश की लेकिन आठवीं तक पढाई की.

लोगो के सहयोग से मैंने अपनी पढाई जारी रखी. गैराज के मिस्त्री ने आर्थिक मदद की तो दोस्त के शिक्षक दादाजी ने मुफ्त में हाईस्कूल में नामांकन करवाया. स्कूल दूर था इसलिए जाने में दिक्कत होती तो दादी और माँ ने तीन महीने मजदूरी की और बचे हुए पैसों से पुरानी साइकिल लेकर दी. आगे की पढाई के लिए दिक्कते हुए तो माँ ने हरिद्वार भेज दिया.

वहां पर मैंने कर्मकांड के साथ संगीत और पूजा पाठ का ज्ञान सीखा और जड़ी बूटी से होने वाले स्वास्थ्य सुधार पर अध्ययन किया लेकिन मन नहीं लगा तो तीन महीने में वापस घर लौट आया. घर लौटने के बाद फिर से गैराज में काम करना शुरू किया लेकिन दसवीं की परीक्षा में फ़ैल हो गया. इसके बाद स्टोन क्रेशर में मिस्त्री के रूप में काम किया लेकिन क्रेशर के मालिक ने मजदूरी नहीं दी तो वो काम भी छोड़ दिया.

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बच्चों की शिक्षा पर ख़ास काम किया है ओंकार ने

इसके बाद भी पढाई जारी रखी और निजी ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. इस तरह धीरे-धीरे शिक्षा से जुड़ाव बढ़ा. इसके बाद कल्याण फउंडेशन नाम के सामजिक संगठन से जुड़ा तो समाज की समस्याओं के बारे में समझ पैदा हुई.

इसके बाद खुद की पढाई के साथ ही गरीब बच्चों को निशुल्क पढाना शुरू किया. 2007 में स्नातक पास करने के बाद ओंकार ने 2008 में संग्राम नामक सामाजिक संगठन का गठन किया. इसके संगठन के जरिये समाज के कमजोर एवं पिछड़े बच्चों को शिक्षा के माध्यम से सशक्त बनाने का प्रयास किया.

2010 में ओंकार नेहरू युवा केन्द्र से जुड़े और राष्ट्रीय युवा कोर के पद पर काम करते हुए डोमचांच के युवाओं की समस्या को समझने और गांव की समस्याओं से युवाओ को जोड़ने का काम किया. ओंकार अपने प्रखंड में सक्रिय रूप से काम करते रहे और 20 युवा समूह बना कर गांव की समस्या के समाधान के लिए लगातार प्रयास करते रहे. जिसका परिणाम यह रहा कि कोडरमा जिले में पहली बार बेस्ट यूथ क्लब अवार्ड से संग्राम संस्था को नवाजा गया.

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महिलाओं के ग्रुप बनाकर मुलभुत समस्याओं पर काम किया है ओंकार ने

सन 2011 में मानवाधिकार जन निगरानी समिति वाराणसी से जुड़ कर मानवाधिकार के लिए संघर्ष करते हुए ओंकार ने समाज के सबसे अंतिम व वंचित बिरहोर समुदाय जो कि झारखंड में आने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है. उनके बीच संपर्क स्थापित कर उनके अधिकार व समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए काम करने लगे.

अपने काम के दौरान उन्होंने बिरहोर समुदाय के एक छोटे से गांव जियोरायडीह में समुदाय के कई मूलभूत समस्या से जूझते हुए देखा. गाँवो के हालात इतने बहुत बुरे थे कि बिरहोर परिवार को कई दिन भूखे रहकर निकालने पड़ते थे. इसके अलावा इस समुदाय को सरकार की किसी भी योजना का लाभ नही मिल रहा था.

वहां की समस्याओं को समझने के बाद ओंकार ने बिरहोर समुदाय और सरकार के बीच पूल का काम किया. बिरहोर समुदाय के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के साथ ही जरूरतमंद परिवारों को स्वास्थ्य सुविधाओं का भी लाभ दिलवाया. गाँवो के मुखिया से मिलकर सरकारी योजनाओं का फायदा बिरहोर समुदाय तक पहुँचाया. जिनमें जनधन खाता, आधार कार्ड, पेंशन योजना, सड़क एवं बिजली की व्यवस्था, मछली पालन, खेती-बाड़ी और स्वास्थ्य सुविधाए शामिल है.

villagers meeting
ग्रामीणों के साथ मिलकर कर योजनाओं पर काम किया है ओंकार ने

इस तरह जिले में जनजाति समुदाय के उत्थान के लिये एक मजबूत पहल की गई. 2014 में जाति धर्म और मजहब से ऊपर उठ कर नाव दलित आंदोलन के समर्थन में 14 फरवरी को ‘हिंसा रोको प्यार बाटो‘ युवा मार्च का आयोजन किया किया गया.

ओंकार ने पूरे झारखंड में मानवाधिकार हनन के घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए लगातार उन मामलों पर पहल करते रहे. लोगो को न्याय के साथ ही सरकार द्वारा मुआवजा भी दिलवाया. इसके साथ ही समाज के अंतिम तबके के लोगो की मूलभूत जरूरत को लेकर लगातार सरकार को उनकी समस्या से अवगत कराते रहे.

बाल विवाह और झारखण्ड के विभिन्न मानवाधिकार मामले पर 6 लाख रुपये तक मुआवजा भुगतान करवाया है जो एक बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है. इसके अलावा घरेलू हिंसा के मामलों में काउंसिलिंग कर 8 परिवारों को टूटने से बचाने का पुनीत कार्य किया.

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एक अवार्ड समारोह में सम्मान ग्रहण करते हुए ओंकार विश्वकर्मा

लम्बे समय से जनजातीय क्षेत्र में काम करने के कारण ओंकार विश्वकर्मा ने बिरहोर समुदाय के लोगो के दिल में खास जगह बनायीं हैं. इसके अलावा उन्हें कई मंचो से सम्मानित किया गया जिनमें झारखंड फाउंडेशन द्वारा झारखंड नागरिक अवार्ड-2016, नेशनल फाउंडेशन दिल्ली द्वारा भारत रत्न चिदंबरम सुब्रमण्यम अवार्ड-2017 शामिल है. नेहरू युवा केंद्र के साथ ही मानवाधिकार जन निगरानी समिति का झारखण्ड राज्य संयोजक मनोनीत किया.

अगर आप ओंकार विश्वकर्मा या संग्राम संगठन से संपर्क करना चाहते है तो यहाँ क्लिक करे !

बी पॉजिटिव इंडिया, ओंकार विश्वकर्मा और उनके संगठन के कार्यों की सराहना करता है और उम्मीद करता है कि आप से प्रेरणा लेकर लोगो के जीवन में सकारात्मक बदलाव आएंगे.

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