जब भारत में स्वाधीनता संग्राम अपने चरम पर था तो दक्षिण गुजरात के वलसाड जिले के पारडी गांव का एक 12 वर्षीय लड़का रोजगार के लिए मुंबई आ जाता है । उस लडके का केवल एक ही सपना था कि वो कपडे सिलाई करने सींख जाये जिससे कि वो अपनी एक टेलरिंग की दुकान खोल दे । अपनी मेहनत और लगन की बदौलत वह 18 वर्ष की उम्र में दो सिलाई की दुकानों का मालिक बन जाता है ।

इसी बीच उसने सिलाई का कार्य अपने बच्चों को भी सिखाया क्योंकि वो मानते थे कि स्कूल में किताबों के जरिये व्यावहारिक ज्ञान नहीं सींखने को मिलता है । पांचों भाइयों ने अपना काम बाँट लिया और अपनी मेहनत से उनके बिज़नेस को धीरे-धीरे ऊंचाइयों पर ले जाने लगे । इसी बीच प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान एक बिस्कुट कंपनी ने अपनी फैक्ट्री को बेचने का निर्णय किया । जब यह बात चौहान भाइयों को पता चली तो उन्होंने बिस्कुट उद्योग में बिना कुछ अनुंभव के ही उस कंपनी को खरीद लिया

आज भारत में बोतलबंद पानी का नाम लिया जाता है तो सबसे पहले बिसलेरी का नाम आता है । बिस्कुट में पारले जी , मैंगो जूस में फ्रूटी और लिम्का एवं कई शीतल पदार्थ आज आम जन -जीवन की दिनचर्या का हिस्सा है । इन सारे प्रोडक्ट्स के बिना हमारी दिनचर्या अधूरी मानी जाती है । इसके साथ ही मैंगो बाईट, किश मी चॉकलेट्स हमारे बचपन का अभिन्न अंग रहे है । इन सब का निर्माण करता है पार्ले ग्रुप और इसके संस्थापक है मोहन लाल चौहान (Mohan Lal Chauhan।

पार्ले ग्रुप की शुरुआत टाटा ग्रुप के आसपास ही हुई थी और आज इस ग्रुप में पार्ले प्रोडक्ट्स (Parle Products), पार्ले एग्रो (Parle Agro) एवं पार्ले बिसलेरी (Parle Bisleri)  है । इस पुरे ग्रुप को चौहान परिवार के अलग-अलग सदस्य संभालते है लेकिन इसकी शुरुआत का श्रेय मोहन लाल चौहान को जाता है । मोहन लाल के पांच पुत्र थे जिनमे माणिकलाल , पीताम्बर, नरोत्तम , कान्तिलाल एवं जयंतीलाल शामिल है । इस पुरे परिवार ने पारले ग्रुप को आगे बढ़ाने के लिए साथ में काम किया है और आज पारले ग्रुप की वैल्यू बिलियन डॉलर्स है तथा देश में लाखों लोगों को रोज़गार देने का काम कर रहा है । बाद के वर्षों में बिज़नेस आगे बढ़ने के बाद पारले ग्रुप को तीन नयी कंपनियों में बाँट दिया गया जिसे तीन परिवार संभाल रहे है ।

Parle Chauhan Family
Chauhan Family | Image Source

उस वक्त तक कोई भी भारतीय कंपनी बिस्कुट का निर्माण नहीं करती थी । भारत में उपयोग होने वाले बिस्कुट या तो इंग्लैंड से आयात किये जाते थे या फिर अंग्रजो द्वारा भारत में ही बनाया जाता था । इस नए क्षेत्र में इन चौहान भाइयों ने अपना किस्मत आजमाने का फैसला किया । फैक्ट्री बिल्कुल जर्जर हालत में थी और उससे कुछ भी निर्माण करना लगभग असंभव था लेकिन चौहान भाइयों ने अपनी सूझबझ और कार्य कुशलता के चलते स्थानीय कारीगरों एवं मैकेनिक से मिलकर एक बार फिर बिस्कुट का प्रोडक्शन शुरू करवा दिया ।

अपने पुत्रों की कार्यकुशलता से मोहनलाल काफी प्रभावित हुए और उनको अपनी मर्जी से निर्णय लेने की छूट दी । यहाँ पर भी चौहान भाइयों ने अपनी योग्यता अनुसार काम बाँट लिया । नरोत्तम एवं जयंतीलाल ने टेक्निकल क्षेत्र में अपना योगदान दिया तो पीताम्बर ने फाइनेंस एवं अकाउंट का काम संभाला । माणिकलाल ने नयी योजनाओं के लिए पैसे जुटाने एवं पारले को स्थापित करने का काम हाथ में लिया तो कांतिलाल ने दैनिक प्रशासन का काम देखना शुरू किया ।

नयी कंपनी में निवेश के कारण शुरुआत में उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ा जिनमे पारले ग्रुप पर बढ़ते कर्ज से लेकर उत्पादन एवं क्वालिटी में गिरावट के साथ ही सेल्स में कमी दर्ज की गयी । एक बार तो उन्होंने अपनी फैक्ट्री को बेचने का निर्णय भी ले लिया लेकिन माणिकलाल की फाइनेंसियल सूझबूझ और धैर्य ने इस कंपनी को बचा लिया । इसी बीच उनकी कठोर मेहनत ने रंग दिखाना शुरू किया और उनको कुछ ही समय में 3000 रुपये का शुद्ध मुनाफा हो गया । इसके बाद से इन्होने पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज पारले ग्रुप कई हज़ार करोड़ रुपये का ग्रुप बन गया है ।

1939 में पारले ने अपनी फैक्ट्री से पहला ग्लूकोस बिस्कुट लांच किया लेकिन उस वक्त के नियमानुसार वो यह बिस्कुट केवल सैनिकों को ही बेच सकते थे । उस समय घरेलु एवं विदेशी मार्किट में बिस्कुट बेचने के अनुमति किसी को नहीं थी लेकिन फिर भी पारले ग्रुप ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवाने में कोई कसार नहीं छोड़ी ।

Parle-G Factory
पारले जी फैक्ट्री में काम करते कर्मचारी  | Image Source

जब अंग्रेजों ने 1947 में भारत छोड़ा तो भारत के साथ ही चौहान ब्रदर्स की भी किस्मत पलट गयी । उनके पास पूरा भारत एक बाजार के रूप में मिला और इस मौके को वो किसी भी हालत में नहीं छोड़ना चाहते थे । उन्होंने एक जबरदस्त विज्ञापन कैंपेन के जरिये पारले जी को देश के हर घर-घर में पहुंचा दिया । और इसके चलते बिस्कुट का दूसरा नाम पारले जी हो गया ।

अपने काम को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने 1959 में शीतल पेय पदार्थ बनाने के लिए बड़ौदा बॉटलिंग कंपनी की नींव रखी जो आगे जाके पारले एग्रो कंपनी के रूप में तब्दील हो गयी । इस कंपनी के माध्यम से उन्होंने कई शीतलपेय पदार्थ बनाये जो कि घर-घर की पहचान बन गए ।

1969 में उन्होंने बिसलेरी का भी अधिग्रहण कर लिया और आज देश के बोतलबंद बाजार में बिसलेरी की 35 प्रतिशत हिस्सेदारी है । आज पारले ग्रुप तीन अलग-अलग कंपनियों में बंट गया है लेकिन तीनों कम्पनिया अभी मार्किट लीडर बनी हुई है । पारले ग्रुप के कई ब्रांड्स है जिनमे Parle-G, KrackJack, Monaco, Golden Arcs, Parle Marie, Parle Hide & Seek Bourbon, Melody, Mango Bite, Poppins, 2 in 1 Eclairs, Kismi Toffee Bar, Parle’s Wafers, Fulltoss, Parle Namkeen , Citra, Frooti, Appy, Appy Fizz, Saint Juice, LMN, Grappo Fizz, Cafe Cuba, Bailey, Bailey Soda, Mintrox mints, Buttercup candies, Buttercup Softease, Softease Mithai, Hippo, Frio, & Dhishoom , Bisleri Water, Bisleri Soda, Vedica, Urzza शामिल है । अब तीनों कम्पनिया नयी पीढ़ी संभाल रही है तथा अलग-अलग स्वामित्व वाली कम्पनिया है ।

मोहनलाल चौहान की एक छोटी सी शुरुआत आज लाखो-करोड़ो रुपये के ब्रांड में बदल चुकी है । आज हर ब्रांड या प्रोडक्ट ग्राहकों में सिरमौर बना हुआ है । आपको जानकर आश्चर्य होगा कि पारले जी बिस्कुट का सालाना टर्नओवर 6000 करोड़ रुपये से ज्यादा है । आज पारले ग्रुप ने केवल भारत बल्कि विदेशों में भी अपने प्रोडक्ट्स बेचता है और हज़ारों लोगों को रोज़गार देने का काम भी कर रहा है

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