जिस ने भी ज़िन्दगी में मुलभुत सुविधाओं के लिए संघर्ष किया है उसको उन छोटी-छोटी आवश्यकताओं की कीमत मालूम होती है और जब भी उसे समाज या देश के लिए कुछ करने का मौका मिलता है तो वो सबसे आगे होते है । समाज के वंचित किसान और मजदूर वर्ग की दुर्दशा आज किसी से छुपी हुए नहीं है और किसान आत्महत्या अब विकराल रूप ले चूका है , उन्ही पीड़ित परिवारों के लिए एक उम्मीद की किरण बन कर आये है अशोक देशमाने

अशोक महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाके जो कि अक्सर किसान आत्महत्या के लिए मीडिया में चर्चा में रहता है । उसी सूखाग्रस्त इलाके के परभणी जिले में एक गरीब किसान परिवार में पैदा हुए। उनके पिता के पास करीब 5 एकड़ ही खेती-योग्य जमीन थी और वो निम्न आय का ही श्रोत था । परिवार कि सामान्य जरूरतों में ही सारा पैसा खर्च हो जाया करता था और अगर अकाल और सूखे कि चपेट में आ गए तो दो जून कि रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल होता था ।

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परिवार की आर्थिक दिक्कतों की वजह से उन्होने 10वीं तक की पढ़ाई अपने गांव मंगरूर से अच्छे अंको से उत्तीर्ण कर ली और आगे की पढ़ाई के लिये वो परभणी शहर में आकर रहने का फैसला किया । यहां रहकर उन्होने कम्प्यूटर साइंस में मास्टर्स का कोर्स किया।

 

शहर के बेहताशा खर्चे एवं महंगाई के दौर में शहर में रहने के दौरान अशोक ने पूरी कोशिश की कि उनके पिता को पढ़ाई का कम से कम खर्चा उठाना पड़े। इसके लिए उन्होने पढ़ाई के साथ-साथ कई होटल और दुकानों में भी काम किया। मास्टर्स पूरा करने के बाद कई जगह इंटरव्यू देने के बाद उन्हें पुणे में स्थित एक MNC सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी लग गई।

बचपन से कविता लिखने के शौकिन अशोक मराठी में काफी अच्छी कविताएं लिखते थे। इन कविताओं के जरिये वो बचपन से ही किसानों की समस्याओं और उनकी तकलीफों को और खुद के दर्द को काफी संजीदगी से अपनी कविताओं में पिरोते थे।।

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कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनके कॉलेज में समाज सेवी बाबा आम्टे का एक कार्यक्रम हुआ। उस कार्यक्रम का अशोक की सोच पर काफी असर पड़ा। उन्होने तय किया कि वो अपनी पढ़ाई के साथ दूसरी गरीब बच्चों को पढ़ाने का काम करेंगे। इतना ही नहीं कई बार अपनी बचत का कुछ हिस्सा ऐसे बच्चों पर खर्च करने से भी नहीं हिचकते थे और ये सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक उनकी नौकरी नहीं लग गई।

नौकरी लगने के बाद अशको अपनी तनख्वाह का 10 प्रतिशत हिस्सा गरीब लोगों की मदद पर ही खर्च कर देते थे। आईटी कंपनी में काम करने के दौरान वो पुणे में हर शनिवार और रविवार को अनाथालय जाते और झुग्गियों में रहने वाले गरीब बच्चों को पढ़ाने के साथ साथ दूसरे सामाजिक काम करने लगे।

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जब साल 2014-15 में मराठवाड़ा इलाके में भयंकर सूखा पड़ा तो काफी किसान आत्महत्या के लिये मजबूर हो गये, तो कुछ गांव छोड़कर मेहनत मजदूरी करने के लिए शहरों में आ गये। इस वजह से किसानों के बच्चों की पढ़ाई भी छूट गई।

सूखे की चपेट में उनका गांव भी शामिल था और वहां भी हालात काफी खराब थे। तब उन्होने तय किया कि उनको ऐसे किसानों के लिए कुछ करना चाहिए। अशोक जानते थे कि कुछ सालों पर उनके पास गाड़ी, मकान और सुख सुविधाओं से जुड़ी दूसरी चीजें होंगी लेकिन जो किसान सूखे के कारण परेशान हैं उनका भविष्य अच्छा नहीं होगा।

ऐसे में वो ये भी नहीं जानते थे कि कितने किसान इस सूखे से लड़ सकते हैं। इस तरह अशोक एक ओर सूखे से परेशान किसानों की मदद करना चाहते थे तो दूसरी ओर वो ये नहीं जानते थे कि ये मदद किस तरह की जा सकती है।

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इसके बाद अशोक ने नवम्बर 2015 से पुणे में ‘स्नेहवन’ नाम से एक नॉन-प्रॉफिट संगठन बनाया। इस काम के लिए उनके एक दोस्त आनंद कोठे ने अपना घर दिया। इस घर को बच्चों के रहने लायक बनाने के लिए उन्होने यहां पर रेनोवेशन का काम कराया। इस काम को उन्होने अपने दोस्त सच्चिदानंद कुलकर्णी, आशा थिप्से की मदद से पूरा किया।

शुरूआत में फंडिंग के कमी के कारण उन्होने 8 महीने तक नाइट शिफ्ट में काम किया। इस तरह रात में वो नौकरी करते और दिन में बच्चों के बीच रहते। इस दौरान उनको मुश्किल से दो घंटे ही सोने का मौका मिलता था। धीरे-धीरे उनकी ये मेहनत रंग लाने लगी और दूसरे लोग उनकी ओर मदद का हाथ बढ़ाने लगे। जिसके बाद अशोक ने अगस्त 2016 में नौकरी छोड़ अपना पूरा वक्त ‘स्नेहवन’ को देने का फैसला किया।

इस समय ‘स्नेहवन’ में 6 जिलों के 25 बच्चे रहते हैं। जिनके रहने, खाने और पढ़ाई का पूरा खर्च अशोक ही उठाते हैं। ये बच्चे 8 साल से लेकर 15 साल की उम्र के बीच में हैं। ये सभी बच्चे दूसरी से नवीं तक की क्लास में पढ़ते हैं। खास बात ये है कि सभी बच्चे पुणे के प्राइवेट स्कूल ‘समता प्राथमिक माध्यमिक विद्यालय’ में पढ़ते हैं। इन बच्चों की नौकरी लगने तक की पूरी जिम्मेदारी अशोक ने अपने कंधों पर ली है।

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किसानों के बच्चों को अपने साथ रखने से पहले अशोक इनके माता पिता से मिलते हैं और उनसे इस बात का भरोसा लेते हैं कि वो किसी भी सूरत में बच्चों को उनकी पढ़ाई पूरी होने तक अपने पास नहीं बुलायेंगे। इन बच्चों को अशोक स्कूली पढ़ाई के अलावा कम्प्यूटर की शिक्षा भी देते हैं।

इसके अलावा बच्चों को तबला, हारमोनियम, शास्त्रीय संगीत, पेंटिंग के साथ योग की भी ट्रेनिंग दी जाती है। इसके लिए उनके पास 8 अलग-अलग वालंटियर और टीचर हैं। बच्चे बेहतर तरीके से पढ़ाई कर सकें इसके लिये ‘स्नेहवन’ में 1 हजार किताबों की एक लाइब्रेरी भी बनाई गई है जहां पर हिन्दी, अंग्रेजी और मराठी की किताबें हैं। इस लाइब्रेरी का मकसद बच्चों को स्मार्टफोन और कम्प्यूटर की बजाय किताबों से जोड़ना है।

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अशोक ने जब गरीब किसानों के बच्चों का भविष्य सवांरने का फैसला किया था तो शुरूआत में उनके माता-पिता ने इसका विरोध किया लेकिन जब उनको भरोसा हुआ कि उनके बेटे का फैसला सही है तो वो भी अपना घर और खेती छोड़कर पुणे में इन बच्चों की देखभाल के लिए आ गये।

यदि आप भी अशोक देशमाने या उनके ‘स्नेहवन’ के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं या किसी भी तरह से उनकी मदद करना चाहते हैं तो आप उनके फेसबुक पेज या वेबसाइट पर जाकर और अधिक जानकारी जुटा या संपर्क भी कर सकते हैं।

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