अभी तक आपने लोगों को कई तरह के स्टार्टअप की शुरुआत करते देखा होगा या सुना होगा। पर आपको जानकर हैरानी होगी कि जिन खराब बर्तनों को आप बेचकर नए बर्तन खरीद लेते हो उन्हीं खराब पुराने बर्तनों से एक भाई-बहन ने मिलकर एक अनोखा स्टार्टअप शुरू किया गया है। घर के कबाड़े में पड़े पुराने बर्तनों के इस्तेमाल का आइडिया अब ‘न्यारो स्टार्टअप’ के रूप में बहुत जल्द ही लोगों को सामने आएगा। इसे मध्यप्रदेश के इंदौर के समीप देवास जिले के खातेगांव की शालिनी टाडा (Shalini Tada) और उनके छोटे भाई यशराज टाडा शुरू करने जा रहे हैं।

दोनों भाई मिलकर बहुत जल्द अपनी वेबसाइट भी शुरू करेंगे। 23 साल की शालिनी ने नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फैशन डिजाइनिंग दिल्ली से फैशन कम्युनिकेशन में बैचलर ऑफ़ डिज़ाइन का कोर्स किया है। वे बताती हैं कि कोर्स के दौरान छुट्टियों में जब घर आई तो अटाले में पड़े पुराने बर्तनों पर निगाह गई। इससे उन्हें इसके इस्तेमाल का आइडिया आया। जिस पर उन्होंने काम शुरू किया।

शालिनी दैनिक भास्कर के साथ बातचीत में बताती हैं कि कोर्स के दौरान छुट्टियों में जब घर आई तो अटाले में पड़े पुराने बर्तनों पर निगाह गई। इससे उन्हें इसके इस्तेमाल का आइडिया आया जिस पर उन्होंने स्टार्टअप पर काम करना शुरू किया।

इस दौरान उन्हें याद आया कि बचपन में दादी अक्सर तांबे-पीतल के बर्तन यूज करती थी। नाना-नानी भी इसी तरह के बर्तनों का उपयोग करते थे और इनकेे फायदे भी बताते थे। एक दिन मिनिस्ट्री ऑफ टेक्सटाइल की एक प्रतियोगिता का पता चला। शालिनी ने तांबे-पीतल के बर्तनों को नया स्वरूप दिया। आकर्षक बनाकर उन्हें उपयोग में लाने का आइडिया देते हुए भेज दिया।

मिनिस्ट्री ने शालिनी का आईडिया पसंद किया और इस प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए 2 लाख रुपए की स्पॉन्सरशिप भी दे दी। इसके बाद इस प्रोजेक्ट को साकार करने के लिए शालिनी अपने भाई यशराज के साथ जुट गई। इसमें उनके पिता राजकमल टाडा ने भी पूरा साथ दिया।

शालिनी टाडा
शालिनी एवं यशराज के द्वारा ताम्बे एवं पीतल के तैयार बर्तन | Image Source

दोनों भाई-बहन ने मिलकर पुरातन कलां एवं संस्कृति की जानकारी जुटाने के लिए राजस्थान के कई गांव और शहर घूमे। अलग-अलग कारीगरों से अपनी स्केच की हुई डिज़ाइन और साइज के मुताबिक के बर्तन बनवाए।

शालिनी और यशराज ने अपने बर्तनों को सुंदर और आकर्षक दिखाने के लिए राजस्थान की मशहूर पिचवई, फड़ और मिनीएचर डिजाइन का प्रयोग किया है। बर्तनों पर पृथ्वीराज चौहान की लड़ाई, संयोगिता के साथ उनके स्वयंवर, अंधे हो जाने के बाद भी मुहम्मद गोरी के साथ हुए संघर्ष के अलावा भारत की अलग-अलग गौरव गाथाएं भी चित्रांकित कराई हैं।

शालिनी आगे बताती हैं कि न्यारो शब्द राजस्थानी भाषा से लिया गया है जिसका मतलब अनूठा/सबसे अलग होता है। जब हम इस प्रोजेक्ट के लिए राजस्थान में जानकारी जुटा रहे थे तब देखा कि कई जगह पर कारीगर बेरोजगार हैं। उनके पास कला होने के बावजूद काम कि कमी है । घटते काम और बढ़ती लागत के कारण कारीगरों की अगली पीढ़ी इसे करना नहीं चाहती। क्योंकि उनके पास इतना काम नहीं कि इससे वे अपना घर चला सके।

लेकिन जब हमने प्रोजेक्ट के लिए बनाए बर्तनों को बड़े शहरों की कुछ एक्जीबिशन में प्रदर्शित किया तो लोगों का अच्छा रिस्पॉन्स मिला। तब इसे व्यापार की तरह शुरू करने की योजना बनाई। क्योंकि भारत में बनने वाली ऐसी वस्तुओं कि विदेशों में डिमांड है।

आज के समय में शालिनी जैसे युवाओं की जरूरत है, जो अपने भविष्य को चमकाने के साथ-साथ समाज को बेहतर बनाने के रास्ते भी तलाश रही हैं। Be Positive  उनके नए आईडिया और समाज में परिवर्तन लाने के जज्बे को सलाम करता है ।

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