किसानों की हालत को देखते हुए किसान की संतान भी खेती-बाड़ी से दूर भाग रही है और शिक्षा के अभाव में शहरों में मजदूरी करके जीवन यापन करना पड़ रहा है । जहां आज के युवा पढ़ाई पूरी करने के बाद किसी अच्छे पद और सैलरी पर नौकरी करना पसंद करते हैं वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो नौकरी के साथ अपनी ज़मीन से भी जुड़ाव रखते हैं। बैंगलोर शहर में रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर महेश कवलगा (Mahesh Kawlaga) की कहानी भी कुछ ऐसी ही है जो खेती करने के लिए सप्ताह के आखिरी दो दिन 700 किलोमीटर की यात्रा करके शहर से अपने गाँव जाते हैं।

पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर महेश बंगलुरू में एक नामी बहुराष्ट्रीय आईटी कंपनी कॉग्निजेंट (Cognizant) में काम करते है । नौकरी के दौरान उन्होंने जैविक खेती के बारे में बहुत रिसर्च किया । उन्होंने पाया कि कम लागत एवं रसायनों एवं कीटनाशकों के उपयोग के बिना भी खेती की जा सकती है । इसके लिए उन्होंने पहले बैंगलोर के आसपास खेतीबाड़ी करने का विचार किया लेकिन शहर के आसपास पानी की कमी और जमीन की आसमान छूती कीमतों ने महेश का प्लान बिगाड़ दिया ।

इसके बाद महेश ने अपने गांव से जैविक खेती करने की योजना बनाई लेकिन उनके बीच एक समस्या आन पड़ी । बैंगलोर और उनके गांव के बीच 700 किलोमीटर की दुरी है और वहां जाने के लिए कम से कम 10 घंटे की यात्रा करनी पड़ती है । इस समस्या के निराकरण के लिए महेश ने बैंगलोर से कर्नाटक के गुलबर्ग जिले के अपने गाँव कव्लगा हर शुक्रवार की रात में खेती करने के लिए जाने का निश्चय किया । शुरुआत में सफर थोड़ा अटपटा एवं थकाऊ रहता था लेकिन महेश की जैविक खेती करने की जिद ने उन्हें पार्ट टाइम किसान बना दिया । अब महेश हर शनिवार और रविवार को खेती करने के बाद वापस नौकरी पर लौट जाते हैं।

एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले महेश का बचपन खेत खलिहानों में खेलते-कूदते बीता और वो शहर में आकर भी गांव की यादें अपने जहन से नहीं मिटा सके । एक इंटरव्यू में महेश ने बताया कि मेरा मन बचपन से ही खेती में लगता था। मेरे दादा और पिता दोनों किसान हैं तो मैं उन्हें देखकर खेती करना चाहता था, लेकिन पिताजी को ये पसंद नहीं था। वे चाहते थे कि मैं पढ़-लिखकर किसी अच्छे पद पर नौकरी करूं।

दरअसल मेरे पिताजी ने 1970 में स्नातक किया था, लेकिन उनके पिताजी ने उन्हें नौकरी न करवाकर खेती में हाथ बंटाने को कहा इसलिए मेरे पिता चाहते थे कि मैं नौकरी करके उनका सपना पूरा करू। मैं पढ़ाई करने के बाद आईटी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर पद पर तैनात हो गया, लेकिन जैसे मुझे लगा कि अब मैं खेती कर सकता हूं तो सप्ताहांत में गाँव आने लगा।

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अपने खेत पर महेश कवलगा | Image Source

महेश आगे बताते हैं कि 2 साल पहले जब मैंने खेती करने का फैसला लिया तो मेरे पड़ोसियों के लोगों ने मुझे पागल कहना शुरू कर दिया था। उन्हें लगता था कि खेती करने के लिए हर सप्ताह 700 किलोमीटर की यात्रा करके गाँव जाता है और 700 किलोमीटर यात्रा का वापस आता है। लोगों ने जो बोला उस पर मैंने ध्यान नहीं दिया। खेती करने का फैसला मेरा था तो इस पर कोई और क्या सोचता है इस पर मैं क्यों ध्यान दूं। मैं अपनी 40 एकड़ जमीन पर दलहन, तिलहन सहित कई प्रकार की फसल का उत्पादन करता हूं।

जैविक खेती करने पर महेश कहते हैं, ‘हमारे आसपास दिन प्रतिदिन अस्पताल खुल रहे हैं। दवाखाने खुल रहे हैं। क्या यह विकास है? सुविधाएं बढ़ रही हैं तो बीमारियां कम होनी चाहिए, लेकिन बीमारियां भी दिन-प्रतिदिन बढ़ रही हैं। इसके पीछे एक ही कारण है अच्छा और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन न करना। हम जो अनाज या सब्जी खा रहे हैं, उसका उत्पादन रासायनिक खाद के कारण हुआ है। खाद के ज्यादा इस्तेमाल से उत्पादन तो ज्यादा हो जाता है, लेकिन खेत की मिट्टी खराब हो जाती है। रसायन से उत्पादित हुआ अनाज और फसल नुकसानदायक होती है इसीलिए मैं जैविक खेती करता हूं।

महेश का मानना है कि खेती से भी मुनाफा कमाया जा सकता है। वह कहते हैं कि मैं खेती से बहुत ज्यादा मुनाफा तो अभी नहीं कमा पाया क्योंकि जैविक खेती में आपको एक से दो साल खेत को उस लायक तैयार करने में लग जाता है, लेकिन मुझे नुकसान भी नहीं हुआ है। मैंने अपनी लागत निकाल लिया है। खेती से मुनाफा कमाने के लिए रासायनिक खादों और बाहर से बीज लाकर बोना बंद करना पड़ेगा।

किसान का सबसे ज्यादा खर्च बीज और खाद पर ही होता है। बीज हम खुद भी तैयार कर सकते हैं। खाद के लिए ज़रूरी है कि हर किसान एक गाय पालें। एक गाय के एक साल तक मिलने वाले गोबर से 30 एकड़ खेतों में खाद दी जा सकती है। गाय के गोबर से तैयार खाद अगर हम खेत में डालेंगे तो हमारी मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहेगी और जो अनाज या सब्जी तैयार होगी वो नुकसानदेह नहीं होगी।

आखिर में महेश कहते हैं कि हमारे आसपास के युवा खेती नहीं करना चाहते हैं। शहर में जाकर भले ही वो लोगों की बगीचे की रखवाली या शौचालय की सफाई कर सकते हैं, लेकिन अपने घर पर खेती नहीं कर सकते हैं। युवा खेती नहीं करना चाहता है। इसके पीछे जो वजह है, वह यह है कि उन्हें लगता है कि खेती से पैसा नहीं कमाया जा सकता है।

महेश ने समाज और खासकर के किसान वर्ग के तथाकथित नियमों को तोड़कर नवाचार का काम किया है । उन्होंने बेहतर समय प्रबंधन और तकनीक के माध्यम से खेतीबाड़ी को मुनाफे का सौदा बना दिया है । वो अपने नवकृ और किसानी के बीच में बेहतर सामंजस्य बिठाने में सफल रहे है । आपको भी अगर महेश के प्रोडक्ट्स खरीदने हो या जैविक खेती के बारे में जानकरी लेनी हो तो उनसे मोबाइल पर इस नंबर +91 97392 91508 (9-10 pm only) पर संपर्क कर सकते है ।

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