कर्ज़े के कारण उनके पिता की आँखों में आसूं देखकर उन्होंने परिवार के बिज़नेस की जिम्मेदारी संभाली. अपनी नौकरी से बचाये हुए पैसे से क़र्ज़ चुकाया. रिटायरमेंट के बाद 65 साल की उम्र में नयी पारी की शुरुआत की. न केवल बिज़नेस संभाला बल्कि विश्व की सबसे बड़ी ट्रेक्टर निर्माता कंपनी की नींव भी रखी.

आज उनके ट्रेक्टर भारत ही नहीं अपितु विश्व के 90 से अधिक देशों के किसानों की पहली पसंद बने हुए है. LIC एजेंट से अपने करियर की शुरुआत करके 10,000 करोड़ रुपये का कारोबार बनाने वाले उद्यमी का नाम है लक्ष्मण दास मित्तल (Lachhman Das Mittal).

87 साल के लक्ष्मण दास मित्तल 10,000 करोड़ रुपए नेटवर्थ वाले सोनालिका ग्रुप (Sonalika Group) के चेयरमैन हैं। यह ग्रुप भारत में तीसरे नंबर का सबसे बड़ा ट्रैक्टर निर्माता है। एक एलआईसी एजेंट से कैरियर की शुरुआत करने वाले मित्तल ने फैमिली बिजनेस को डूबते हुए भी देखा है। उसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।

बचपन एवं शुरुआती संघर्ष

लक्ष्मण दास मित्तल का जन्म मोंगा जिला (पंजाब) के भिंडरकला गांव में 5 नवंबर, 1930 को हुआ। उनके पिता हुकुम चंद अग्रवाल मंडी में ग्रेन डीलर (अनाज के व्यापारी ) थे। मित्तल का परिवार आर्थिक रूप से सामान्य था। उनके पिता शिक्षा के महत्त्व को समझते थे, इसलिए बेटे को पढ़ाई के लिए प्रेरित करते थे।

परिवार की आर्थिक स्थिति कोई खास अच्छी नहीं थी। कारोबार के लिए कर्ज भी लिया गया था। बेटे लक्ष्मण दास मित्तल पढ़ने में अच्छे थे। बचपन में उनकी आंखें कमजोर थीं, उन्हें दूर की चीजें साफ नहीं दिखती थीं।

पिछले वित्त वर्ष (2017-18) में 1 लाख से ज्यादा ट्रेक्टर बेचे है सोनालिका ग्रुप ने

लेकिन चश्मा बनवाना परिवार पर एक अतिरिक्त बोझ की तरह होता, इसलिए मित्तल क्लास में ब्लैकबोर्ड के पास बैठते थे। कई बार वे ब्लैकबोर्ड के बहुत पास पहुंच जाते, तो टीचर उन्हें झिड़कते भी थे।

लक्ष्मण दास ने इंग्लिश और उर्दू में एमए किया। इंग्लिश में उन्हें गोल्ड मैडल मिला था। उर्दू में भी उनके अच्छे मार्क्स थे। अब 87 साल की उम्र में भी मित्तल का पढ़ाई-लिखाई से नाता नहीं टूटा है। वे उर्दू लिटरेचर पढ़ते हैं और शायरी भी करते हैं।

नाकामी से हार नहीं माननी चाहिए। इसके बजाय अपनी गलतियों से सबक लेकर आगे बढ़ते रहना चाहिए।   – लक्ष्मण दास मित्तल ( सोनालिका ग्रुप  के चेयरमैन )

LIC में नौकरी और पहले बिज़नेस में हाथ आजमाया

अंग्रेजी और उर्दू में अच्छे अंकों से एमए करने के बावजूद मित्तल को शुरुआत में अच्छी नौकरी नहीं मिली। फिर वे एलआईसी एजेंट बन गए।

अनुभव और इंग्लिश नॉलेज के कारण जल्द ही वे फील्ड ऑफिसर के पद पर प्रमोट हो गए। मित्तल ने कई राज्यों में सेवाएं दीं। उनके वेतन का बड़ा हिस्सा परिवार द्वारा लिए गए कर्ज को चुकाने में खर्च हो जाता था।

मित्तल को यह समझ में आ चुका था कि सिर्फ नौकरी से लाइफ में बड़ी तरक्की नहीं की जा सकती। इसलिए वे सैलरी से पैसे बचाने लगे, ताकि बिजनेस कर सकें।

Sonalika Group
विश्व का सबसे बड़ा इंटीग्रेटेड ट्रेक्टर प्लांट है सोनालिका ग्रुप के पास

1966 में मित्तल के परिवार ने खेती में काम आने वाले थ्रेशर बनाने का बिजनेस शुरू किया। इसके साथ मित्तल एलआईसी में अपनी नौकरी भी कर रहे थे। थ्रेशर मशीनें बनाने के लिए परिवार की सारी जमापूंजी लगा दी गई थी और कर्ज भी लिया गया था।

शुरुआत में 50 मशीनें बनाई गई थीं। लेकिन यह बिजनेस नाकाम रहा। मशीनें गेहूं की फसल के अनुसार डिजाइन की गई थीं, इसलिए धान के लिए वे कारगर नहीं रहीं। तीन साल में ही बिजनेस बैठ गया। सारा पैसा डूब गया था।

शुरुआती विफलता और पहली सफलता का स्वाद

एक रात लक्ष्मण दास मित्तल ने देखा कि उनके पिता की आंखों में आंसू थे। फिर आर्थिक स्थिति ठीक करने के लिए मित्तल ने मारुति उद्योग में डीलरशिप के लिए आवेदन किया। लेकिन उन्हें डीलरशिप नहीं मिली।

इसके बाद उन्होंने पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में कार्यरत अपने एक मित्र की मदद ली। मित्र ने थ्रेशर में खामी खोजी। फिर सुधार करके थ्रेशर बनाए गए। अबकी बार डिजाइन सही थी। मशीनें खूब लोकप्रिय हुईं। 10 साल के भीतर ही सोनालिका थ्रेशर की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बन चुकी थी।

थ्रेशर की कामयाबी के बाद ट्रेक्टर निर्माण में रखा कदम

थ्रेशर की कामयाबी के बाद लोगों का भरोसा बढ़ गया। किसान मित्तल से ट्रैक्टर बनाने को कहने लगे। उन्हें लगता था कि मित्तल ट्रैक्टर बनाएंगे, तो वे भी ऊंची गुणवत्ता के होंगे। मित्तल परिवार ने 1994 में शुरुआत की।

इसके पहले लक्ष्मण दास 1990 में एलआईसी से डिप्टी जोनल मैनेजर पद से रिटायर हो चुके थे। सोनालिका ग्रुप ने दो ट्रैक्टर असेंबल किए। प्रयोग सफल रहा।

Mittal family
लक्ष्मण दास मित्तल का परिवार : दीपक मित्तल, अमृत सागर मित्तल, रमन मित्तल ( बाएं से दांए )

लेकिन बड़े पैमाने पर ट्रैक्टर प्रॉडक्शन के लिए धन की कमी थी। तब डीलर्स आगे आए। उन्होंने बिना ब्याज के पैसे दिए। 1996 में 22 करोड़ रुपए की पूंजी से ट्रैक्टर बनाने का काम शुरू हुआ।

कामयाबी की ओर अग्रसर सोनालिका ग्रुप

अब ग्रुप की नेटवर्थ 10,000 करोड़ रुपए के बराबर है। सोनालिका ग्रुप 94 देशों में ट्रैक्टर एक्सपोर्ट करता है। पांच देशों में इसके प्लांट हैं। ग्रुप में 7 हजार कर्मचारी है।

यह ट्रैक्टर के साथ ही SUVs, खेती के उपकरण और डीजल जनरेटर भी बनाता है। मित्तल के बेटे और पोते भी ग्रुप में विभिन्न जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं।

परिवार के साथ मिलकर चला रहे है ग्रुप

मित्तल के तीन बेटे और दो बेटियां हैं। उनके बड़े बेटे अमृत सागर मित्तल सोनालिका ग्रुप के वाइस प्रेसिडेंट हैं और तीसरे नंबर के बेटे दीपक एमडी हैं। दूसरे बेटे न्यूयॉर्क में डॉक्टर हैं। मित्तल की बेटी उषा सांगवान एलआईसी की पहली वुमन मैनेजिंग डायरेक्टर हैं।

मित्तल खुद 87 वर्ष की उम्र में भी पूरी तरह सक्रिय हैं। वे सोनालिका ग्रुप के चेयरमैन हैं और नियमित रूप से कामकाज करते हैं। इसके साथ ही वे उर्दू में शायरियां भी करते हैं।

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