आईआईटी, दिल्ली के इन्क्यूबेशन सेंटर से जुड़े ‘क्रिया लैब्स (Kriya Labs)’ स्टार्टअप के तीन छात्रों अंकुर कुमार, कनिका प्रजापत और प्रचीर दत्ता धान के पुआल से कप और प्लेट बना रहे हैं।

सर्दियों की शुरुआत के साथ ही दिल्ली और एनसीआर के रह वासियों के लिए स्मोग भी जीवन का हिस्सा बन चूका है. पंजाब और हरियाणा के साथ ही उत्तरप्रदेश के किसानों द्वारा जलाई गयी पराली ( खेती करने के बाद बचा कृषि अवशेष ) दिल्ली वासियों के लिए मजबूरी बन जाती है.

सुप्रीम कोर्ट के साथ NGT ने भी इस पर कड़ी आपत्ति जताई लेकिन अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाये गए. पिछले वर्ष इसको लेकर काफी हंगामा हुआ लेकिन स्तिथि जस की तस बन हुई है.

किसानो के पास अपनी समस्याए है और दिल्ली वालों की अपनी मजबूरिया. पराली जलने के बाद धुए के रूप में यह स्मोग का रूप धारण कर लेती है. जिसके चलते हवा की क्वालिटी बहुत ख़राब हो जाती है. स्मोग के चलते पिछले साल कुछ दिनों के लिए दिल्ली के स्कूल एवं कॉलेज भी बंद करने पड़े .

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इसी समस्या के हल के लिए आईआईटी दिल्ली के छात्रों ने मिलकर एक उपाय खोजा है. जिससे न केवल दिल्ली को स्मोग से निजात मिलेंगे बल्कि वेस्ट समझे जाने वाली पराली से किसानों को अतिरिक्त आय भी होगी.

रसायनों के उपयोग से पराली से लुगदी का निर्माण किया जा रहा है. जिससे न केवल पेपर और पेपर प्रोडक्ट्स बन सकते है बल्कि इसको गौंद के रूप में उद्योगों में भी काम में लिया जा सकता है. इस पायलेट प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक पेपर प्रोडक्ट्स बना चूका है. इसके लिए खास मशीन डिज़ाइन की गयी है जिसके पेटेंट के लिए अभी आवेदन किया जा चूका है. पराली से पेपर बनाने वाले स्टार्टअप का नाम है : क्रिया लैब्स (Kriya Labs).

kriya labs product
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आईआईटी दिल्ली से शुरू हुए इस स्टार्टअप ने पर्यावरण सरंक्षण के लिए खास भूमिका निभाने का काम किया है. अपनी पढाई के दौरान ही छात्र अंकुर कुमार, कनिका प्रजापत और प्रचीर दत्ता ने अपनी कॉलेज की प्रोफेसर डॉ. नीतू सिंह के मार्गदर्शन में चार साल पहले ग्रीष्मकालीन परियोजना के रूप में पराली (धान का पुआल) से कप और प्लेट बनाने का ‘क्रिया लैब्स’ स्टार्टअप शुरू किया था.

उस समय वे बी.टेक कर रहे थे। उनका विचार था कि फसल अपशिष्टों से जैविक रूप से अपघटित होने योग्य बर्तन बनाने की तकनीक विकसित हो जाए तो प्लास्टिक से बने प्लेट तथा कपों का इस्तेमाल कम किया जा सकता है.

‘क्रिया लैब्स’ के मुख्य संचालन अधिकारी अंकुर कुमार बताते हैं कि इस तकनीक की मदद से किसी भी कृषि अपशिष्ट या लिग्नोसेल्यूलोसिक द्रव्यमान को होलोसेल्यूलोस फाइबर या लुगदी और लिग्निन में परिवर्तित किया जा सकता है. लिग्निन को सीमेंट और सिरेमिक उद्योगों में बाइंडर के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

इस प्रकार सितंबर 2017 में ‘क्रिया लैब्स’ को स्थापित किया गया. अभी स्थापित की गई यूनिट में प्रतिदिन 10 से 15 किलोग्राम कृषि अपशिष्टों का प्रसंस्करण किया जा सकता है.

क्रिया लैब्स’ के संस्थापक-निर्माता छात्र धान के पुआल से बनी लुगदी से टेबलवेयर बना रहे हैं. उनका कहना है कि अब वे इससे जुड़ा पायलट प्लांट स्थापित करना चाहते हैं, जिसकी मदद से प्रतिदिन तीन टन फसल अवशेषों का प्रसंस्करण करके दो टन लुगदी बनायी जा सकेगी. इस तरह के प्लांट उन सभी क्षेत्रों में लगाए जा सकते हैं, जहां फसल अवशेष उपलब्ध हैं.

यह तरीका पूरी तरह से प्रकृति के लिए सुरक्षित है और इसके प्रयोग से हर साल दिल्ली और आस-पास के इलाकों में होने वाली प्रदूषण की समस्या से समाधान मिल सकता है.

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