इस देश की विडम्बना है कि जहाँ महिलाओं को माँ दुर्गा और माँ लक्ष्मी के रूप में हर घर में पूजा जाता है. उसी देश में सरकार को ‘बेटी बचाओं‘ जैसा अभियान चलाना पड़ता है. बेटियों को कमतर आंकने की मानसिकता के कारण गर्भ में ही बेटियों को मार दिया जाता है लेकिन बेटियों की सफलता की समाज में कई कहानियां भरी पड़ी है. ऐसी ही एक कहानी है बिहार के भागलपुर की बेटी जुली कुमारी (Julie Kumari) की.

उनके पिता भागलपुर सिविल कोर्ट में चपरासी के रूप में कार्यरत है लेकिन बेटी ने कड़ी मेहनत से बिहार न्यायिक सेवा परीक्षा में सफलता पाई और अब वो सिविल जज बन गई है. जगदीश साह की बेटी जूली कुमारी जब 29वीं बिहार न्यायिक सेवा परीक्षा में सफलता पाकर सिविल जज बनी तो उनके मायके और ससुराल में खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

परिवार के मुखिया जगदीश साह को अपनी बेटी पर गर्व है क्योंकि जिस सिविल कोर्ट में चपरासी की नौकरी करते हुए उनकी जिंदगी बीत गई, जजों के रूबाब को देखते हुए उनकी उनकी आंखें बूढ़ी हो गईं, जजों को सलाम ठोकते हुए उनके हाथों में झुर्रियां पड़ गईं, अब उनकी बेटी भी ऐसी ही किसी कोर्ट में जज होगी और इंसाफ का फरमान सुनाएगी.

घर में आर्थिक संकट होने के बावजूद जुली ने अपनी पढ़ाई में कोई कोताही नहीं बरती. उन्होंने सरकारी स्कूल से 2004 में हाईस्कूल और 2006 में इंटर की परीक्षा पास की. उसके बाद उन्होंने टीएनबी लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई करके 2011 में डिग्री हासिल कीं. कानून की डिग्री लेने के तुरंत बाद वह बिहार न्यायिक सेवा की परीक्षा की तैयारी में जुट गईं.

इसी बीच 2009 में कजरैली के केलापुर गांव में सुबल कुमार से जूली की शादी हो गई. जूली के पति सुबल दिल्ली में प्राइवेट नौकरी करते हैं. साधारण परिवार में जन्मी जूली को पढ़ाई से बेहद लगाव था. यह लगाव शादी के बाद भी कम न हुआ. पति सुबल कुमार ने भी जूली की लगन देखते हुए उनका साथ दिया.

जुली कुमारी ने देश की लड़कियों के सामने एक राह प्रस्तुत की है जो शादी के बाद अपने सपने पुरे नहीं कर पाती है. अगर सच्ची लगन से कोई काम किया जाए तो सफल होना निश्चित है.

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