राहों में कांटे हज़ार होंगे लेकिन आगे बढ़ने के लिए हौसले ही हमसफ़र होंगे !

यह पंक्तियाँ बिहार के एक पत्रकार पर सटीक बैठती हैं. आँखों में UPSC का सपना लिए बचपन बीता लेकिन आर्थिक परिस्थितियों ने उसे केवल सपना ही बना दिया. किताबों के लिए हमेशा प्यार रहा लेकिन कभी भी किताबे खरीदने के पैसे नहीं रहे. ज़िन्दगी आगे बढ़ी और कार्यक्षेत्र दिल्ली बना. पत्रकारिता के क्षेत्र में काम किया लेकिन किताबों से प्यार बना रहा. गांव में बच्चों को ढंग की किताबे उपलब्ध करवाने के लिए नौकरी छोड़ कर गांव का रुख किया. सोशल मीडिया पर अभियान चलाया तो साल भर में 25,000 किताबे इकठ्ठा हो गयी. अपने फाउंडेशन के जरिये गांव वालों से जमीन लेकर सामुदायिक पुस्तकालय खोला. ग्रामीण बच्चों के सपनों को नयी ज़िन्दगी दे रहे हैं जय प्रकाश मिश्र (Jai Prakash Mishra).

जय प्रकाश मिश्र अपने संस्थान ‘ज़िन्दगी फाउंडेशन‘ के जरिये कबाड़ बन चुकी किताबों को नया रूप देकर जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचा रहे हैं. खुद ने मुफलिसी में बचपन बिताया और किताबों की तंगी हमेशा से रही तो भावी पीढ़ी को मुफ्त में किताबे उपलब्ध करवाना शुरू किया. कबाड़ से किताबों को निकालकर पुस्तकालय तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं जय प्रकाश मिश्र. जिंदगी फाउंडेशन के जरिये ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालय निर्माण के कार्य किए जा रहे हैं. जहाँ ग्रामीण क्षेत्र के उन प्रतिभाओं को किताबों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है जिन्हें सचमुच किताबों की बहुत जरूरत है.

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सामुदायिक पुस्तकालय में किताबों का आनंद उठाते युवा

बी पॉजिटिव इंडिया से बातचीत में जय प्रकाश मिश्र बताते हैं कि बिहार के गोपालगंज जिले के लुहसी गांव में बचपन बीता. प्रारम्भिक शिक्षा गांव के ही सरकारी विद्यालय में हुई. पिताजी अखबार बांटने का काम करते थे और जिस दिन अखबार बच जाते थे, उन्हें पढ़ने वाले बच्चों को मुफ्त में दे देते. उनकी आय से घर का गुजरा मुश्किल से हो पाता था लेकिन उनके मुफ्त में युवाओं को अख़बार बांटने के काम ने हमेशा प्रेरित किया.

जीवनचक्र आगे बढ़ा और मुफलिसी में ग्रेजुएशन किया और नालन्दा यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन किया. इसके बाद नौकरी की तलाश में 2007 में दिल्ली का रुख किया. शुरुआती संघर्ष के बाद मीडिया जगत की कई कम्पनीज के साथ काम करने का मौका मिला. पहचान और पैसा तो मिल रहा था लेकिन गांव में दिलचस्पी बढ़ती जा रही थी.

जय प्रकाश मिश्र आगे बताते हैं कि जब भी मैं किताबों को रद्दी के भाव बिकते या घरों के बाहर पड़ी देखता तो बैचेन हो जाता. मेरा पूरा बचपन किताबों के लिए तरसता रहा और यहाँ लोग महँगी और शानदार किताबों को कचरे वाले को पकड़ा देते हैं. इसी कशमकश में बिहार के गांवों के हालात बदलने के लिए नौकरी छोड़ दी. गांव में पुस्तकालय खोलने के लिए किताबे इकठ्ठा करने का अभियान शुरू किया.

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सामुदायिक पुस्तकालय के लिए साथियों से चर्चा करते जय प्रकाश मिश्र

सोशल मीडिया के प्रभाव और लोगो के सहयोग से जल्द ही पच्चीस हज़ार से ज्यादा किताबे इकठ्ठा हो गयी. अपनी योजना को मूर्त रूप देने के लिए 2014 में ही ज़िन्दगी फाउंडेशन नाम से संस्था रजिस्टर करवाई. मेरा उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा लोगो तक अपने मिशन और काम को पहुंचाना था. रद्दी में किताबे बेचने पर लोगो को पैसा मिलता था जबकि मैं उनसे मदद की अपील कर रहा था.

कई जगह पर निराशा हाथ लगी लेकिन साथ देने वाले लोगो की संख्या हमेशा से ज्यादा रही. किताब दान देने वाले लोगो से व्यक्तिगत मुलाकात की और किताबों का संग्रह करने में सफलता मिली. अधिकांश किताबें दिल्ली से प्राप्त हुईं हैं. चूंकि शहरों में लोगों के पास किताबें हैं. गांव में लोगों के लिए किताबें अभी जीवन का अहम हिस्सा नहीं बन पाई हैं.

किताबे इकठ्ठा होने के बाद अगली समस्या पुस्तकालय खोलने की थी. गांवों में किताबों को लेकर ज्यादा उत्सुकता कभी नहीं रही. ऐसे में पुस्तकालय के लिए जमीन की व्यवस्था करना मुश्किल रहा. कई गांवों में कई स्तर पर बातचीत के बाद गोपालगंज के सदर प्रखंड के जादोपुर दुखहरन गांव में हमें पुस्तकालय खोलने के लिए जगह मिली. पुरे समुदाय के प्रयासों से जून 2017 में पहले सामुदायिक पुस्तकालय की स्थापना हुई.

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सामुदायिक पुस्तकालय के साथ ही कई सामाजिक मुद्दों पर काम कर रहा है ज़िन्दगी फाउंडेशन

इस पुस्तकालय में भारतीय संविधान, ग्रन्थ, प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबे, नामचीन लेखकों की कविता एवं कहानी संग्रह, बाल साहित्य और स्कूल पाठ्यक्रम की किताबे शामिल हैं. इस अकेले पुस्तकालय से आसपास के गाँवो के लगभग 35,000 लोग लाभान्वित हो रहे हैं.

जय प्रकाश मिश्र बताते हैं कि जादोपुर के आसपास के गांवों में यह पहल एक आंदोलन बन चुकी हैं. लोग फोन करके किताबे दान करने के लिए बुलाते हैं. जहाँ पहले लोग ताश खेलते थे ,अब वह जिंदगी पुस्तकालय में चल रही है. यह पुस्तकालय दलित बहुल बस्ती के सामुदायिक भवन में चल रही है और ग्रामीण बच्चों द्वारा पुस्तकालय का भरपूर उपयोग किया जा रहा है.

जब इन पुस्तकालयों में बच्चों को किताबों से जुडते हुए देखता हूँ तो मन को शुकुन मिलता है और अधिक से अधिक पुस्तकालय खोलने की प्रेरणा मिलती है. लोगो के जीवन में बदलाव लाने के लिए ताकत मिलती हैं.

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सामुदायिक पुस्तकालय से लाभान्वित छात्र के साथ जय प्रकाश मिश्र

आप भी अपने गांव या शहर में सामुदायिक पुस्तकालय खोलने में मदद करे. किताबे ही जो हमें अपने वर्तमान और भूतकाल को जोड़ने का काम करती हैं और सुनहरे भविष्य की नींव रखती हैं. कबाड़ में किताबे बेचने से पहले जरूरतमंद बच्चों को किताबे दे.

अगर आप भी जय प्रकाश मिश्र या ज़िन्दगी फाउंडेशन से जुड़ना चाहते हैं तो यहाँ क्लिक करे !

बी पॉजिटिव इंडिया, जय प्रकाश मिश्र और ‘ज़िन्दगी फाउंडेशन‘ की पूरी टीम के कार्यों की सराहना करता हैं और भविष्य के लिए शुभकामनाए देता हैं.

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