ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की भ्रष्टाचार पर ताजा रैंकिंग में भारत दो स्थान नीचे फिसल गया है , इसका मतलब यह हुआ है कि भारत में भ्रष्टाचार बढ़ गया है । स्वच्छ प्रशासन एवं भ्रष्टाचार मुक्त होने का सपना पूरा करने के लिए अभी लम्बा सफर तय करना पड़ेगा क्योंकि हरियाणा के IAS अफसर जो कि 28 फरवरी 2018  रिटायर हो रहे है । उन्हें पिछले छह महीने से ऐसे विभाग में लगा रखा है जिसका 2008 से कोई वजूद ही नहीं है ।

अपने तबादले के दिन ही यह अधिकारी कार्यालय पहुंचता है तो उसे कर्मचारी एवं फाइल्स के नाम पर ठेंगा दिखाया जाता है । हद तो तब हो गयी जब उन्हें राज्य सरकार ने वेतन देने से भी इंकार कर दिया और उनके विभाग के बारे में कोई जानकारी मुहैया नहीं करवाई गयी। हम आज एक ऐसे तेज तर्रार अफसर की बात कर रहे है जिनकी 34 साल की नौकरी के दौरान 71 तबादले झेलने पड़े है । हरियाणा के इस IAS अधिकारी का नाम है प्रदीप कासनी (Pardeep Kasni)

प्रदीप कासनी को एक ईमानदार और तेज -तर्रार अफसर माना जाता है लेकिन राजनितिक फायदे के लिए वो लगातार सरकारों के निशाने पर रहे है । इसी लिए ईमानदारी और कर्त्वयनिष्ठा के इनाम के तौर पर हर वर्ष में दो बार तबादला कर दिया जाता है । कासगंज हिंसा में एक फेसबुक पोस्ट वायरल होने के बाद प्रदीप वापस सरकार एवं राजनैतिक दलों के निशाने पर आ गए है ।

हरियाणा के बेहद ईमानदार और तेज-तर्रार माने जाने वाले आईएएस अफसर प्रदीप कासनी 28 फरवरी को रिटायर हो रहे हैं। 34 साल की नौकरी में उनके 71 तबादले हुए। उन्हें छह महीने से सैलरी भी नहीं मिली है। ऐसा इसलिए, क्योंकि वे लैंड यूज बोर्ड के ओएसडी पद से रिटायर हो रहे हैं और सरकार के रिकार्ड में उस पद का कोई वजूद ही नहीं है। उन्होंने इसके खिलाफ सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में अपील की है, जिस पर 8 मार्च को फैसला आएगा।

कासनी ने लैंड यूज बोर्ड में तबादले के बाद जब बैठने के लिए दफ्तर और काम करने के लिए फाइलें और स्टाफ नहीं मिला तो उन्होंने बोर्ड के बारे में सरकार से पूछा। जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने आरटीआई लगाई। तब सरकार ने माना कि लैंड यूज बोर्ड 2008 से वजूद में ही नहीं है।

लैंड यूज बोर्ड 2007 में पर्यावरण विभाग फिर कृषि विभाग के अधीन किया गया। कृषि विभाग ने इसे बंद करने के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजा, जो मंजूर हो चुका था। इसके बावजूद हरियाणा सरकार ने कासनी को इस बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद पर तैनात कर दिया। कासनी अपने हक के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

1980 बैच के एचसीएस (हरियाणा सर्विस कमीशन) के अफसर कासनी 1997 में आईएएस बने थे। उन्होंने हरियाणा सरकार के साथ 1984 में अपनी सेवाएं शुरू की थीं। उनकी पत्नी नीलम प्रदीप कासनी हरियाणा के राज्यपाल की एडीसी रह चुकी हैं और पिछले साल ही रिटायर हुई हैं।

प्रदीप कासनी के सबसे ज्यादा ट्रांसफर भूपेंद्र सिंह हुड्डा (कांग्रेस) की सरकार में हुए। खट्टर सरकार के साढ़े 3 साल के कार्यकाल में सितम्बर 2016 में एक महीने के अंदर 3 बार कासनी का ट्रांसफर किया गया। अक्टूबर 2015 में खट्टर सरकार आने के बाद कासनी को अहम पदों पर तैनाती की उम्मीद थी, लेकिन गुड़गांव मंडल कमिश्नर की नियुक्ति के बाद यह उम्मीद धरी की धरी रह गई।

प्रदीप कासनी मूल रूप से चरखी दादरी के रहने वाले हैं। उनके पिता धर्म सिंह किसान-मजदूर आंदोलन के नेता थे। इमरजेंसी से पहले भिवानी में रिवासा कांड हुआ था। उस कांड से तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल के प्रति राज्य में गुस्सा था। धर्म सिंह उस आंदोलन की अगुआई कर रहे थे। वह अपने साप्ताहिक अखबार लोक हरियाणा में बंसीलाल और इंदिरा गांधी के खिलाफ खुलकर लिखते थे। किशोर प्रदीप भी अखबार निकालने में उनकी मदद करते थे और सामाजिक आंदोलन में सक्रिय थे। जनसभाओं की मुनादी का जिम्मा उनके पास था।

आईएएस अशोक खेमका और प्रदीप कासनी में कई समानताएं हैं। खेमका के भी 50 से ज्यादा बार ट्रांसफर हो चुके हैं। दोनों अधिकारियों को हरियाणा के ईमानदार और तेज-तर्रार अफसर का दर्जा हासिल है और दोनों को राज्य सरकार की उपेक्षा का सामना करना पड़ा।

Source: Dainik Bhaskar

Comments

comments