ज्यादातर आईटी क्षेत्र की कंपनियों में वही लोग काम करते है जिनका बैकग्राउंड कम्प्यूटर्स में रहता है या उनकी रूचि स्कूल के दिनों से ही कम्प्यूटर्स में होती है । हमारे पास ऐसे कई उदाहरण है जिन्होंने बचपन से ही कम्प्यूटर्स पर काम करते हुए नामचीन कम्पनिया बना ली और आज आईटी क्षेत्र में अपना मुकाम बना के खड़े है , ऐसे लोगों में चाहे वो बिल गेट्स हो या फेसबुक के मार्क जुकेरबर्ग , इन सब में एक कॉमन बात है कि इन्होने कंप्यूटर पर काम करना बहुत जल्द शुरू कर दिया लेकिन ऐसे भी कई लोग है जिनका दूर-दूर तक शुरुआत में कम्प्यूटर्स से कोई नाता नहीं था लेकिन अपनी मेहनत और कम्प्यूटर्स में रूचि के चलते कई स्थापित कम्पनिया बना ली ।

आज हम एक ऐसे ही शख्स की बात कर रहे है जो वास्तव में डॉक्टर या एरोनॉटिकल इंजीनियर बनना चाहते थे लेकिन IIT की काउन्सलिंग के दौरान एक प्रोफेसर की राय ने उनकी ज़िन्दगी बदल दी और आज वो एक ऐसी स्टार्ट-अप चला रहे है जो दुनिया की बड़ी-बड़ी कम्पनीज के साथ ही सरकारों को अपनी आईटी सेवाए प्रदान करती है । बिहार के औरंगाबाद में जन्मे इस युवा उद्यमी का नाम है – विवेक प्रकाश ।

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विवेक को ऐसे कॉलेज स्टूडेंट या गीक( एक तरह का प्रचलित शब्द जो अपने क्षेत्र ने चैंपियन होने के लिए रखा जाता है ) के रूप में जानते है जो कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के सबसे बड़े कम्पटीशन गूगल समर ऑफ़ कोड ( GSOC ) में 2 बार अपनी प्रतिभा का लौहा मनवाया और IIT रूरकी के प्रतिष्ठित इनफार्मेशन मैनेजमेंट ग्रुप (IMG ) के सदस्य रह चुके है ।

स्कूल के दिनों से ही बहुत ही प्रतिभाशाली विद्यार्थी रहे विवेक ने कंप्यूटर पर गेम खेलने के अलावा कोई काम नहीं किया था । उनको शुरू से ही एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में दिलचस्पी थी और उन्होंने बारहवीं में गणित के साथ बायोलॉजी की भी पढाई की । विवेक ने इंजीनियरिंग एवं मेडिकल, दोनों की प्रवेश परीक्षाओं में बहुत अच्छे अंक अर्जित किये थे। अगर वो चाहते तो भारत के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में भी अपने अंको के दम पर दाखिला ले सके ।

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IIT की काउन्सलिंग के दौरान उनकी IIT के प्रोफेसर से बातचीत हुई और उनकी प्रतिभा एवं तेज दिमाग को देखते हुए उन्हें कंप्यूटर साइंस में दाखिला लेने की सलाह दी क्योंकि IIT की प्रवेश परीक्षा के सारे टॉपर्स कंप्यूटर साइंस में ही दाखिला लेते है । इस तरह विवेक की एंट्री IIT रूरकी के कंप्यूटर साइंस की क्लास में हुई ।

कॉलेज के शुरुआती दिनों में विवेक को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा क्योंकि कॉलेज से पहले कंप्यूटर के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे । इन्ही दिनों में उनके कंप्यूटर प्रोग्रामिंग टेस्ट में काफी कम या फ़ैल तक हो जाया करते थे लेकिन इन परिस्थितियों से विवेक कहाँ घबराने वाले थे और उन्होंने इसे एक चैलेंज के रूप में स्वीकार किया । उन्होंने कम्प्यूटर्स में अपनी रूचि बढ़ाना शुरू किया और कंप्यूटर पर काम करते-करते उन्हें लगा कि कंप्यूटर हमेशा लॉजिकल थिंकिंग पर चलते है और पहले साल के अंत तक विवेक ने कंप्यूटर प्रोग्रामिंग को अपनी ज़िन्दगी का अहम् हिस्सा बना दिया ।

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अपनी कोडिंग स्किल सुधारने के बाद विवेक को कॉलेज के प्रतिष्ठित इनफार्मेशन मैनेजमेंट ग्रुप (IMG ) में काम करने का मौका मिला । यहाँ पर उन्हें अपने साथी विद्यार्थियों से कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की बारीकियां एवं अपनी लॉजिकल थिंकिंग को सुधारने का अवसर मिला । IMG ग्रुप कॉलेज के लिए विभिन्न प्रकार के सॉफ्टवेयर प्रोडक्ट्स बनाता था जो कॉलेज की कार्य पद्धति एवं परफॉरमेंस सुधारने में सहायक होते थे ।

कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के साथ ही विवेक की कंप्यूटर में दिलचस्पी बढ़ने लगी और कंप्यूटर के ऑपरेटिंग सिस्टम और kernel level की प्रोग्रामिंग करने का फैसला किया । अपने प्रोफेसर्स के निर्देशन और अपनी कड़ी मेहनत से विवेक ने कंप्यूटर के सबसे पेचीदा एवं अहम् प्रोग्राम के बारे में काम करना शुरू कर दिया जिससे उन्हें कंप्यूटर की कार्यविधि एवं मुख्य घटकों के बारे में सीखने को मिला ।

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इसके बाद उन्होंने गूगल के प्रोग्रामिंग प्रतियोगिता में भाग लेने का फैसला किया और MINIX नाम के ऑपरेटिंग सिस्टम पर काम किया । यह ऑपरेटिंग सिस्टम प्रोग्रामर्स में बहुत ही प्रसिद्ध है क्योंकि इसी के ऊपर Linux नाम के ऑपरेटिंग सिस्टम का निर्माण हुआ । इस प्रोजेक्ट में उन्हें MINIX के रचियता Andrew Tenenbaum की टीम में काम करने का मौका मिला यद्यपि वो प्रतियोगिता के अंत तक अपना प्रोजेक्ट पूरा नहीं कर पाए लेकिन इससे उन्हें बहुत लोगों के साथ काम करने एवं नयी चीज़े सीखने का मौका मिला ।

इसी बीच उनकी मुलाकात सचिन गुप्ता जो कि उसी कॉलेज में पढ़ते थे, से हुई । उन दिनों सचिन एक आईडिया पर काम कर रहे थे । शुरु में विवेक , सचिन को ज्यादा नहीं जानते थे लेकिन उनसे आईडिया के बारे में हुई मुलाकातों के बाद उनके साथ काम करने के लिए राजी हो गए ।

सचिन और विवेक एक ऐसा सॉफ्टवेयर उत्पाद बनाना चाहते थे जो सभी प्रोग्रामर्स को प्रोग्रामिंग कांटेस्ट के साथ ही प्रोग्रामिंग सिखने के लिए प्रेरित करे । शुरुआत में उन्होंने अपनी कंपनी के लिए एक फोरम बनाया जिस पर कोई भी इंटरनेट यूजर आकर प्रोग्रामिंग के बारे में डिसकस कर सके और साथ ही उन्हें कंप्यूटर प्रोग्रामिंग सीखने का भी मौका मिले । दोनों ने मिलकर 1 जनवरी 2012 को अपना प्रोडक्ट बनाना शुरू किया और लगभग 45 दिन के बाद 15 फरवरी 2012 को अपना प्रोडक्ट लांच कर दिया । इस प्रोडक्ट को हैकर रैंक और अन्य विभिन्न वेबसाइट पर acchi जगह मिली जिससे वो जल्द ही कंप्यूटर प्रोग्रामर्स के बीच प्रसिद्ध हो गया ।

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शुरुआत में उनका पोर्टल केवल C और C ++ नाम की प्रोग्रामिंग लैंग्वेज को सपोर्ट करता था और उन्होंने एक ऐसा प्रोडक्ट बनाने के बारे में विचार किया जिससे देश के अन्य प्राइवेट एवं सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज के स्टूडेंट्स को भी उन प्रोडक्ट या सर्विस बेस्ड कम्पनीज में काम करने का मौका मिले जो उनके कॉलेज में प्लेसमेंट के लिए नहीं आती । इसी आईडिया ने HackerEarth की नींव रखी।

उन्होंने एक ऐसा प्लेटफार्म बनाया जो कंप्यूटर प्रोग्रामिंग सीखने में मदद करने के साथ ही , कोडिंग प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए प्रेरित करता है और प्रतियोगिता से मिले नंबर के अनुसार उनका प्रोफाइल क्रिएट करता है जो विभिन्न कम्पनिया अपने रिक्रूटमेंट के लिए इस्तेमाल कर सके । इससे कम्पनीज को अच्छा टैलेंट ढूढने में आसानी होने लगी तो स्टूडेंट्स या आईटी प्रोफेशनल को अपनी मनचाही कंपनी में काम करने का अवसर मिलता है ।

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विभिन्न निवेशकों ने विवेक की कंपनी में रूचि दिखाई और उन्हें अपने विस्तार के लिए फंडिंग मुहैया करवाई । एक सफल आईटी कंपनी बनाने के बाद भी विवेक आज अपनी कॉलेज लाइफ जी रहे है क्योंकि उन्होंने अपनी कंपनी का माहौल ही ऐसा बना रखा है जिसमे सारे कर्मचारी अपनी क्षमता के अनुसार अपना कार्य कर सकते है ।

बिहार से निकलकर IIT रूरकी का यह विद्यार्थी आज अपने जैसे कई प्रोग्रामर्स की मदद कर रहे है और उन्हें उनकी प्रतिभा के अनुसार प्लेटफार्म दिला रहे है । आज Hackerearth भारत की आईटी इंडस्ट्री में जाना-पहचाना नाम है जिसने विभिन्न फार्च्यून 500 कम्पनीज के साथ ही सरकारी विभागों के साथ भी काम कर रही है । hackerearth आज भारत में हैकथॉन का दूसरा पर्याय बन चूका है ।

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