कहते है “सच परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं ” और  भ्रष्टाचार के युग में किसी से ईमानदारी की अपेक्षा करना बेमानी है और  कोई ईमानदार अफसर अगर अपना फ़र्ज़ निभाने की कोशिश करे तो उसके रास्तों में मुसीबतों के पहाड़ खड़े कर दिए जाते है लेकिन कुछ लोगों में सिस्टम को बदलने की सनक होती है और वो सिस्टम को बदलने के लिए कोई भी कीमत चुकाने के लिए तैयार होते है ।

अपने 26 साल के कैरियर में 51 बार तबादला झेलने वाले इस अफसर की ज़िंदादिली और ईमानदारी के सब कायल है । सरकारी या निजी नौकरी में तबादले के कारण कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है लेकिन इस अफसर को तो जैसे तबादले की आदत हो गयी है । अब यह अपने काम से ज्यादा तबादले के कारण मीडिया में चर्चा में रहते है । इस ईमानदार और कर्त्वयनिष्ठ अफसर का नाम है अशोक खेमका ।

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अशोक खेमका का जन्म भारत के पूर्वोत्तर राज्य पश्चिमी बंगाल की राजधानी कोलकाता में 30 अप्रैल 1965  को हुआ था। उन्होंने 1988 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT)खड़गपुर से कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएशन किया और इसके बाद उन्होंने मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च से कंप्यूटर साइंस में पीएचडी की। उन्होंने एमबीए की डिग्री भी ली है और उसके साथ ही इंदिरा गाँधी ओपन यूनिवर्सिटी (IGNOU) से इकोनॉमिक्स में M. A. किया ।

अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर भारत के सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा IAS को क्लियर किया और उन्हें हरियाणा काडर मिला । 1991 बैच के आईएएस खेमका सभी सरकारों के कार्यकाल में चर्चित रहे हैं। अशोक खेमका की पहली पोस्टिंग 1993 में हुई थी तथा उनके पूरे कार्यकाल में उनकी अधिकतर पोस्टिंग कुछ महीने ही चलीं क्योंकि उन्हें जल्द ही तबादले के आदेश थमा दिए जाते है ।

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इस दौरान उन्होंने अलग-अलग विभागों में 8 पोस्ट ऐसी संभालीं, जोकि महीने भर या उससे भी कम समय के लिए थीं। खेमका की 51 में से 12 पोस्टिंग ऐसे डिपार्टमेंट में हुई, जहां उन्हें जमीनी कामकाज में डील करना था। जहां भूमि के अधिग्रहण से लेकर उसके रिकॉर्ड, रेवेन्यू और विकास तक की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं पर थी। मिनिस्ट्री ऑफ पर्सनल की एग्जेक्युटिव रिकॉर्ड शीट (ईआरएस) में दर्ज जानकारी के मुताबिक, खेमका ने केवल दो ही ऐसी पोस्टिंग संभाली हैं जो एक साल से ज्यादा समय तक रही हों।

2005-06 में उनका पहला कार्यकाल था, जब उन्होंने शहरी विकास विभाग में बतौर मुख्य प्रबंधक डेढ़ साल के लिए काम किया। खेमका ने उद्योग विभाग में 2008 से 2010 के बीच, यानी एक साल 10 महीने तक प्रबंध निदेशक के तौर पर काम किया।

सबसे पहली बार हरियाणा के चौटाला सरकार के कार्यकाल के समय सीएमओ द्वारा जारी किए गए एक कथित नोट को लेकर चर्चा में आए थे। इसके बाद तत्कालीन सरकार ने अशोक खेमका से कार वापस ली तो खेमका पैदल या साइकिल  चलाकर सचिवालय जाने लगे थे। उस समय यह मामला काफी टाइम तक मीडिया की सुर्खियों में रहा।

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12 अक्टूबर 2012 को अशोक खेमका उस समय सबसे ज्यादा सुर्खियों में छाए जब उन्होंने कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के बीच जमीन को लेकर हुई डील की म्यूटेशन रद्द कर दी थी। उस समय खेमका चकबंदी महानिदेशक के पोस्ट पर कार्यरत थे। हरियाणा में कांग्रेस की सरकार ने इस मामले के बाद खेमका का ट्रांसफर हरियाणा बीज विकास निगम के महानिदेशक पद पर कर दिया था।

भले ही उनके काम के बदले उन्हें अब तक तबादले ही मिले हो लेकिन कई जगह उन्हें पुरुस्कृत भी किया गया, ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध’ के लिए – ‘2011 S R  जिंदल पुरस्कार‘ से सम्मानित किया। उच्च पदों पर भ्रष्टाचार को उजागर करने में उनकी निडर प्रयासों के लिए श्री संजीव चतुर्वेदी के साथ 10 लाख रुपये का नकद पुरस्कार मिला।

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2004 में जब सरकार ने कई टीचर्स का सत्र के बीच में ही ट्रांसफर किया गया, तो उन्होंने तत्कालीन सीएम ओमप्रकाश चौटाला तक का आदेश मानने से इनकार कर दिया था। रॉबर्ट वाड्रा विवाद के दौरान एक इंटरव्यू में उन्होंने बार-बार ट्रांसफर पर अफसोस जताया था। उन्होंने कहा था, ‘सरकार किसी भी पार्टी की रही हो, मुझे हर बार अपनी ईमानदारी की सजा भुगतनी पड़ी क्योंकि मैं लगातार घपलों और घोटालों का पर्दाफाश करता रहा हूं।

Be Positive  अशोक खेमका जैसे ईमानदार अफसर के जज्बे और साहस को सलाम करता है और उम्मीद करते है कि वो नयी पीढ़ी के लिए प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे ।

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