एक इक्कीस वर्ष का लड़का जिसकी ज़िन्दगी में सब कुछ सही चल रहा था। दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन, प्यारा सा रिश्ता, एक अच्छी सी नौकरी और दिल्ली में सेल्फ डिपेंडेंट ज़िन्दगी, सभी से हंसी खुशी बात करने वाला। किसी को ज़िन्दगी में और क्या चाहिए। सब अपने मुताबिक चल रहा था उस लड़के के लिए।

ज़िन्दगी इतनी आसान कहा होती हैं दोस्त, अगर उलझने न हो तो फिर जीने का क्या मतलब !

इस नौजवान को एक दिन पता चलता है कि वो एक प्रकार के कैंसर से ग्रसित है। उसके दाएं पैर के टखने में दुर्लभ कैंसर और वो भी लास्ट स्टेज में। इस खबर से उसकी ज़िन्दगी पूरी तरह से बदल जाती हैं।

अपने माता पिता को यह खबर देने के लिए उसे दो दिन का समय लगा। जब उनके परिवार को पता चला तो इस नौजवान ने अपने माता पिता की आंखों में अपने लिए आंसू मिले। परिवार के अदभुत सहयोग एवं अपने आत्मविश्वास से इस नौजवान ने कैंसर से लड़ाई लड़ी लेकिन इस लड़ाई में इसने अपना बायां पैर घुटने के नीचे से खो दिया।

एक स्वस्थ शरीर से दिव्यांग बनने के बाद भी इस नौजवान ने अपना विश्वास नहीं खोया। कठिन दौर एवं डिप्रेशन के बाद भी  नौजवान खड़ा रहा। आज यह नौजवान न केवल मैराथन में दौड़ता है बल्कि कार से लेकर बाइक तक चलाता है। वो न केवल अपने सारे काम खुद से करता है बल्कि जिम जाकर अपनी फिटनेस का भी पूरा ख्याल रखता हैं।

24 वर्षीय योद्धा, आत्मविश्वासी , मैराथन धावक और मोटिवेशनल स्पीकर का नाम है हनी कपूर (Hunny Kapoor) ।

पानीपत से आने वाले इस नौजवान ने समाज के सामने एक मिसाल पेश की है। कैंसर और इसके जैसी ही गंभीर बीमारियों से लडने वालों के लिए रोल मॉडल बन चुके हैं।

हनी कपूर का जन्म हरियाणा के पानीपत शहर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ हैं। एक आम युवा की तरह वो भी पढ़ाई के लिए दिल्ली अा जाते हैं। अपनी पढ़ाई के साथ ही वो  प्राइवेट नौकरी भी कर रहे थे और अपना खर्चा स्वयं निकाल रहे थे। इसी के साथ उनकी ज़िंदगी उनके अनुसार चल रही थी।

24 मार्च 2015 को हनी कपूर को पता चलता है कि उन्हें कैंसर हैं। एक बार के लिए उनको धक्का लगा कि मुझे कैसे कैंसर कैसे हो सकता है जबकि मै न तो स्मोकिंग करते है और न हीं शराब पीते हैं। अपने परिवार को समझाने के बाद उनका सफर शुरू होता है कैंसर से जंग जीतने के लिए।

अगले एक महीने में हनी कपूर पंजाब, हरियाणा और एनसीआर के सभी अस्पतालों में चक्कर लगा रहे थे। अमेरिकन कैंसर सोसाइटी और सिंगापुर के हॉस्पिटल्स से विचार विमर्श करने के बाद उन्हें पता चला कि या तो उनकी ज़िंदगी बचाई जा सकती हैं या फिर उनका पैर।

पैर खोने के बाद भी कोई गारंटी नहीं थी कि वो पूरी तरह से ठीक हो पाएंगे। एक महीने पहले दिल्ली की गलियों में स्वच्छंद घूमने वाले हनी कपूर अब एक चार दिवारी में सिमट गए। कई बार उन्हें आत्महत्या का भी खयाल आया लेकिन उनके माता पिता के आंसुओं ने उन्हें रोक लिया।

सर्जरी के एक से डेढ़ साल तक हनी कपूर अपने बिस्तर पर पड़े रहे लेकिन उन्होंने कैंसर से हार मानने से इंकार कर दिया था। रिकवरी के बाद उन्हें व्हील चेयर पर बैठने की सलाह दी गई लेकिन हनी कपूर ने मना कर दिया।

उसके बाद उन्होंने कृत्रिम पैर के सहारे चलना शुरू किया। उनके पिता एक बार फिर उनको अंगुली पकड़कर उन्हें चलना सीखा रहे थे। अपने आत्मविश्वास और परिवार के सहयोग से धीरे-धीरे कृत्रिम पैर से अपना सारा काम करना शुरू कर चुके हैं।

पिछले तीन सालों में हनी कपूर ने यही सींखा कि अगर आप चल नहीं सकते हैं तो रेंगना शुरू कीजिए। अगर रेंग नहीं सकते हैं तो किसी के सहारे चलिए लेकिन रुकिए मत।

आज हनी कपूर वो सब कुछ कर रहे हैं जो 24 वर्ष का एक नौजवान करता हैं। मैराथन दौड़ से लेकर जिम, बाइक राइडिंग से लेकर कार तक चलाते हैं। इसी के साथ वो कई संस्थाओं से जुड़कर लोगों को कैंसर जैसी बीमारियों के प्रति जागरूक कर रहे हैं।

बी पॉजिटिव, हनी कपूर के साहस और जज्बे को सलाम करते हैं और उम्मीद करते हैं आप से प्रेरणा लेकर बाकी कैंसर वॉरियर्स भी कैंसर से जंग जीतने में सफल होंगे।

Comments

comments