पढाई के लिए गुजरात के महुआ से मुंबई आये लेकिन वहां पर अपना खर्चा निकालने के लिए क्लर्क का काम किया. जिस फर्म में वो पियोन का काम कर रहे थे वो कंपनी टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए गौंद सप्लाई करती थी. पुराने गौंद में चिपचिपाहट के साथ ही क्वालिटी बहुत ख़राब होती थी लेकिन मार्केट में कोई और विकल्प उपलब्ध नहीं था.

इसी मौके का फायदा उठाकर इस क्लर्क ने इंडस्ट्री में काम आने वाले गौंद के निर्माण के बारे में रिसर्च किया और इस रिसर्च के बाद फेविकोल का जन्म हुआ जो आज गौंद का दूसरा नाम बन चूका है. फेविकोल को हर घर में पहुंचाने का श्रेय जाता है पीडीलाइट इंडस्ट्री (Pidilite Industries) के संस्थापक बलवंत पारेख (Balvant Parekh) को.

आज पीडीलाइट इंडस्ट्री देश के adhesives बिज़नेस का सत्तर प्रतिशत से ज्यादा शेयर रखती है . पीडीलाइट इंडस्ट्री का सालाना रेवेन्यू लगभग 800 मिलियन डॉलर से ज्यादा का होता है . आज उनके प्रोडक्ट्स भारत के साथ ही दुनिया के पचास से अधिक देशों में निर्यात होते है.

उनकी कंपनी की भारत के अलावा अमेरिका, बांग्लादेश, थाईलैंड , दुबई और मिस्र में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स है. उनका कारोबार टेक्सटाइल इंडस्ट्री से लेकर फर्नीचर एवं अन्य उद्योगों में गौंद के प्रोडक्ट्स उपलब्ध करवाना है.

पीडीलाइट इंडस्ट्रीज फेविकोल के साथ ही M-Seal और फेवीक्विक भी बनती है जो अपने-अपने मार्केट में मार्केट लीडर है. इस ग्रुप को एक किराये के शेल्टर में शुरू करने वाले बलवंत पारेख 2012 में भारत के 45वे सबसे अमीर व्यक्ति बन चुके है. आज भले ही पीडीलाइट और फेविकोल ब्रांड लगातार ऊंचाइयों को छु रहा है लेकिन पारेख बंधुओं ने इसके लिए कड़ा संघर्ष किया.

बलवंत पारेख ने ऐसा ब्रांड बनाया जिसकी लकड़ी और फर्नीचर के कामगार कसम खाते है लेकिन शुरुआत उनकी बहुत ही साधारण रही थी . गुजरात के महुआ में जन्मे बलवंत पारेख पढाई में होशियार थे. उनके दादा मजिस्ट्रेट थे अतः उन्होंने भी कानून की पढाई करने का निश्चय किया . इसके चलते उन्होंने मुंबई का रूख किया और मुंबई यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री प्राप्त की.

कानून की डिग्री प्राप्त करने के बाद उन्होंने कानून की प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया. इसी दौरान उनकी शादी कान्ताबेन से हो गयी. कानून की प्रैक्टिस के दौरान बलवंत अच्छा महसूस नहीं कर रहे थे.अतः उन्होंने वकालत छोड़कर खुद का व्यवसाय करने का निश्चय किया लेकिन उसके लिए उन्होंने एक प्रेस में काम किया.

इसके बाद उन्होंने फर्नीचर कंपनी में क्लर्क के रूप में काम करना शुरू कर दिया. इस दौरान वो अपनी पत्नी के साथ फर्म के गोदाम में ही रहते थे.

बिज़नेस में पकड़ होने के कारण उन्हें जल्द ही निवेशक मिल गए और वो साइकिल, सुपारी और अन्य सामानों का इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का कामकरने लग गए. इसके बाद उन्होंने एक जर्मन कंपनी के साथ काम करने का निश्चय किया और बाकायदा 1954 में जर्मनी में ट्रेनिंग के लिए भी गए

इसके बाद जर्मन कंपनी के सीईओ की मृत्यु के बाद भारत के व्यापार का सारा काम बलवंत पारेख के पास आ गया. उन्होंने अपने भाई सुनील और छोटे भाई नरेंद्र ने मिलकर साथ काम करना शुरू किया. उन्होंने एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट व्यवसाय की जगह इंडस्ट्रीज में काम आने वाले गौंद का निर्माण शुरू किया.

इसी के साथ उन्होंने फेविकोल का निर्माण शुरू किया. उत्तम गुणवत्ता और आक्रामक मार्केटिंग के चलते फेविकोल जल्द ही गौंद का दूसरा नाम बन गया. इसके बाद उन्होंने M-Seal, फेवीक्विक (Feviquick), डॉ फिक्सइट (Dr Fixit) के साथ ही अन्य गौंद आधारित प्रोडक्ट की पूरी श्रृंखला खड़ी कर दी . उनका व्यापार भारत में तेजी से बढ़ने लगा जिसके चलते उन्हें देश के बाहर भी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने का फैसला लेना पड़ा.

बलवंत पारेख ने अगली पीढ़ी को व्यापार की कमान बहुत जल्द ही सौप दी और खुद समाज सेवा के कार्य में लग गए. उन्होंने महुआ में आर्ट्स कॉलेज के साथ ही हॉस्पिटल और अन्य समाजसेवी संस्थाओं में अपना योगदान दिया. पीडीलाइट इंडस्ट्रीज को नयी पीढ़ी संभाल रही है लेकिन पुरानी पीढ़ी भी अपने अनुभव से व्यापार को बढ़ाने में तेजी से लगे हुए है.

यद्यपि बलवंत पारेख अब हमारे बीच नहीं है लेकिन उनके मार्गदर्शन और संघर्ष से आज हर भारतीय सींख ले सकता है. फेविकोल मैन बलवंत पारेख का 25 जनवरी 2013 को निधन हो गया. उन्होंने अपने जज्बे और नए क्षेत्र में असीम सम्भावनाएं देखने के गुण के चलते देश का नामी बिज़नेस साम्राज्य खड़ा कर दिया.

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