अगर आप एक पत्रकार बनना चाहते हो तो ये व्यक्ति आपके लिए आदर्श हो सकता है । देश के साथ ही विदेशी मामलों में अच्छी पकड़ रखने वाले इस पत्रकार ने अपने जीवन में अब तक 80 देशों की यात्राए की है और 2008 के मुंबई हमलों के मास्टर माइंड हाफिज सईद से लेकर कई पाकिस्तान के नेताओं से इनके अच्छे सम्बन्ध रहे है । उनका मानना है कि दोनों देश की जनता एक जैसी है लेकिन राजनीतक महत्वाकांक्षाओं ने पुरे दक्षिण एशिया में अशांति का माहौल बना रखा है । अपने जीवन में शुरू से ही क्रांतिकारी विचारों को पालने वाले इस शख्सियत का नाम है डॉ वेद प्रताप वैदिक (Dr Ved Pratap Vaidik)

इनकी शख्सियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश के प्रधानमंत्रियों से लेकर विदेश मंत्री न केवल इनके अच्छे मित्र रहे है बल्कि भारतीय विदेश नीति में उनके सुझावों को बड़ा महत्त्व दिया जाता है । एक कुशल वक़्ता और परिशुद्ध हिंदी प्रेमी जिन्हे हिंदी में अपना शोध पात्र लिखने पर यूनिवर्सिटी से निकल दिया गया था और वो ही उस समय का संसद में भी एक बड़ा मुद्दा बना । हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में इनका बहुत बड़ा योगदान रहा है और अभी भी उम्र के इस पड़ाव में पूरी शिद्दत से हिंदी की सेवा में लगे हुए है ।

डाॅ. वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है, जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी और डाॅ. राममनोहर लोहिया की महान परंपरा को आगे बढ़ाने वाले योद्धाओं में वैदिकजी का नाम अग्रणी है।

पत्रकारिता, राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष, विश्व इतिहास, प्रभावशाली वाकपटुता, संगठन-कौशल आदि अनेक क्षेत्रों में एक साथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले अद्वितीय व्यक्त्तिव के धनी डाॅ. वेदप्रताप वैदिक का जन्म 30 दिसंबर 1944 को पौष की पूर्णिमा पर इंदौर में हुआ। वे सदा प्रथम श्रेणी के छात्र रहे। वे रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत के भी जानकार हैं। उन्होंने अपनी पीएच.डी. के शोधकार्य के दौरान न्यूयार्क की कोलंबिया युनिवर्सिटी, मास्को के ‘इंस्तीतूते नरोदोव आजी’, लंदन के ‘स्कूल आॅफ ओरिंयटल एंड एफ्रीकन स्टडीज़’ और अफगानिस्तान के काबुल विश्वविद्यालय में अध्ययन और शोध किया।

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अपने ऑफिस में डॉ वेद प्रताप वैदिक

वैदिकजी नेे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के ‘स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज’ से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। वे भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अपना अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा। उनका विश्वविद्यालय से निष्कासन हुआ। वह राष्ट्रीय मुद्दा बना। 1965-67 में संसद हिल गई।

डाॅ. राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, आचार्य कृपालानी, इंदिरा गांधी, गुरू गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, हिरेन मुखर्जी, हेम बरूआ, भागवत झा आजाद, प्रकाशवीर शास्त्री, किशन पटनायक, डाॅ. जाकिर हुसैन, रामधारी सिंह दिनकर, डाॅ. धर्मवीर भारती, डाॅ. हरिवंशराय बच्चन, प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद जैसे लोगों ने वैदिकजी का डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से वैदिकजी ने विजय प्राप्त की, नया इतिहास रचा। पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले।

वैदिकजी ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ 13 वर्ष की आयु में की थी। हिंदी सत्याग्रही के तौर पर वे 1957 में पटियाला जेल में रहे। बाद में छात्र नेता और भाषाई आंदोलनकारी के तौर पर कई जेल यात्राएं।  भारत में चलने वाले अनेक प्रचंड जन-आंदोलनों के सूत्रधार बने ।

अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति और भारतीय विदेश नीति के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाई । कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार के अलावा लगभग 80 देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं की । 1999 में संयुक्तराष्ट्र संघ में उनको भारत का प्रतिनिधित्व करने का भी सौभाग्य मिला । इसी वर्ष विस्कोन्सिन युनिवर्सिटी द्वारा आयोजित दक्षिण एशियाई विश्व-सम्मेलन का उद्घाटन भी इन्ही के कर कमलों के द्वारा हुआ ।

पिछले 60 वर्षों में हजारों लेख और भाषण कई समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए । वे लगभग 10 वर्षों तक पीटीआई भाषा (हिन्दी समाचार समिति) के संस्थापक-संपादक और उसके पहले नवभारत टाइम्स के संपादक (विचारक) रहे हैं। फिलहाल दिल्ली के राष्ट्रीय समाचार पत्रों तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग 200 समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर डाॅ. वैदिक के लेख हर सप्ताह प्रकाशित होते हैं।

छात्र-काल से उनको अनेक पुरस्कार से नवाजा गया तथा  भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान। अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व। आकाशवाणी और विभिन्न टीवी चैनलों पर 1962 से अब तक अगणित कार्यक्रम।

उन्होंने अपने कलम की धाक जमाते हुए कई मुद्दों पर किताबे लिखी जो आज कई विद्यार्थियों के लिए रिफरेन्स बुक बन चुकी है। उनकी कुछ शानदार पुस्तकों की सूची निम्नानुसार है :

  1. अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा
  2. अंग्रेजी हटाओ: क्यों और कैसे?
  3. हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम
  4. भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत,
  5. एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका: इंडियाज आॅप्शन्स,
  6. हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो?,
  7. वर्तमान भारत,
  8. अफगानिस्तान: कल, आज और कल,
  9. महाशक्ति भारत,
  10. भाजपा, हिंदुत्व और मुसलमान,
  11. कुछ मित्र और कुछ महापुरुष,
  12. मेरे सपनों का हिंदी विश्वविद्यालय
  13. हिंदी कैसे बने विश्वभाषा
  14. स्वभाषा लाओ:अंग्रेजी हटाओ

अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित किया गया है।  जिनमें मुख्य रूप से  विश्व हिन्दी सम्मान (2003), महात्मा गांधी सम्मान (2008), दिनकर शिखर सम्मान, पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण-पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार, हिन्दी अकादमी सम्मान, लोहिया सम्मान, काबुल विश्वविद्यालय पुरस्कार, मीडिया इंडिया सम्मान, लाला लाजपतराय सम्मान आदि है।

Be Positive डॉ वेद प्रताप वैदिक की शख्सियत को सलाम करती है तथा उम्मीद करती है कि आप ऐसे ही भारत और हिंदी भाषा की सेवा करते रहेंगे ।

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