कोई मतलब नहीं कि लोग आपको क्या कहते हैं, अपनी राय बदल दें, अपने सिद्धांतों पर अमल रखें.

यह पंक्तियाँ उड़ीसा के एक डॉक्टर पर सटीक बैठती हैं. उड़ीसा के आदिवासी इलाकों में जहाँ पर कोई भी साधन नहीं पहुँचता हैं, उन जगहों पर यह डॉक्टर स्वास्थ्य शिविर का आयोजन करते हैं. मुफ्त इलाज के साथ ही स्वच्छ पानी और स्वास्थ्य के बारे में जागरूक करते हैं. अपनी मुहिम को आगे ले जाने के लिए हर हफ्ते नए गांव या जंगल में पहुँच जाते हैं. लोगो के इलाज के साथ ही स्थानीय युवाओं की एक समिति बनाते हैं जो लोगो के समय-समय पर जागरूक करते हैं और इमरजेंसी में लोगो को अस्पताल पहुंचाते हैं. अब तक हज़ारों लोगो को स्वास्थ्य सुविधाए मुहैया करवा चुके हैं. पैदल चलकर लोगो को स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करवा रहे हैं डॉ. चितरंजन जेना (Dr Chitranjan Jena).

उड़ीसा के कोरापुट जिले के दासमंतपुर ब्लॉक में आदिवासी लोगो का इलाज कर रहे हैं डॉ. चितरंजन जेना. इस क्षेत्र की उड़ीसा और देश के सबसे पिछड़े इलाकों में गिनती होती हैं. आदिवासी यहाँ पर बदत्तर जीवन जीने को मजबूर हैं. सड़क तो दूर यहाँ पर मोटर साइकिल से पहुँचाना भी नामुमकिन हैं जिसके चलते डॉ. चितरंजन जेना को जंगल के अंदरूनी इलाकों में पैदल चलकर पहुंचते हैं. वो लोगो के इलाज के साथ ही स्वास्थ्य जागरूकता, स्वच्छ पेयजल, शौचालय और प्राथमिक उपचार के बारे में बताते हैं.

बी पॉजिटिव इंडिया से बातचीत के दौरान डॉ. चितरंजन जेना बताते हैं कि उड़ीसा के कोरापुट, कालाहांडी जिले पिछड़े क्षेत्र में आते हैं. यहाँ पर बुनियादी जरूरतों का भी अभाव हैं. 2007 में क्षेत्र में हैजा की बीमारी के चलते कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. उस समय में मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा था. मेरा बचपन भी ग्रामीण इलाकों में बीता और पढाई में ठीक था और इसी तरह कटक के मेडिकल कॉलेज में पढाई के लिए मेरा चयन हो गया.

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आदिवासीयो के साथ डॉ. चितरंजन जेना

पढाई के दौरान ही इंटर्नशिप के चलते मुझे ग्रामीण इलाकों में काम करने का मौका मिला. मुझे गांव के हालात पहले से पता थे लेकिन आदिवासी इलाकों के हालत देखकर दिल पसीज गया. मैंने ग्रामीण इलाकों में काम करने का प्रण लिया. इसके बाद पढाई करने के बाद मेरे ज्यादातर साथी आगे की पढाई या शहर में अच्छे हॉस्पिटल में काम करने के लिए तैयार थे लेकिन मैंने अपना रास्ता अलग चुना था.

पढाई के बाद 2016 में चिकित्सा अधिकारी के रूप में कोरापुट जिले में मेरी पहली पोस्टिंग हुई. कोरापुट जिले की हरी भरी घाटियाँ में हजारों आदिवासी रहते हैं. जनजातीय आबादी वाले इस क्षेत्र के में विकास के नाम पर कुछ भी नहीं हैं. लोग अपने आजीविका के लिए भी संघर्ष करते हुए नजर आये ऐसे में स्वच्छता और स्वास्थ्य के बारे में लोगो से उम्मीद करना बेमानी हो जाता हैं.

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आदिवासी महिलाओं के साथ डॉ. चितरंजन जेना

प्रशासन के सहयोग और मेडिकल टीम के साथ हमने इस क्षेत्र के बदलाव की मुहिम शुरू की. हमने जंगल के अंदरूनी इलाकों में पहुँच कर लोगो के साथ काम करना शुरू किया. सड़क एवं बेसिक संसाधनों का अभाव था लेकिन टीम के उत्साह और सेवा भाव ने कई किलोमीटर लम्बे पैदल सफर को भी आसान बना दिया.

गांव में पहुँच कर लोगो के स्वास्थ्य की जाँच की जाती हैं. जो लोग ज्यादा बीमार पाए जाते हैं, उन्हें नजदीकी अस्पताल में भर्ती करवाया जाता हैं. इसके साथ ही मुफ्त दवा और प्राथमिक उपचार की ट्रेनिंग भी दी जाती हैं.

डॉ. चितरंजन जेना आगे बताते हैं कि हमने ‘गाँवकू चला समिति’ बनाई जिसका अर्थ है कि ‘गांवों की तरफ चलते है’, हमारे साथ-साथ हमारे पेशे में समान विचारधारा वाले लोगों को शामिल किया गया है ताकि वह सभी भी आदिवासी क्षेत्र में गरीब लोगों को अपनी सेवाएं प्रदान कर सकें. मेरे अनुसार जरूरतमंद लोगों को दी गई सेवा, भगवान के लिये की गई सेवा के बराबर है.

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बच्चों के इलाज के दौरान डॉ. चितरंजन जेना

शुरुआत में भाषा को लेकर कुछ समस्याए रही लेकिन अनुवादक की मदद से आदिवासियों की समस्या जानने की कोशिश की. ‘गाँवकू चला समिति’ के तहत, हम स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण मुद्दों जैसे हाथ धोने, मासिक धर्म, पीने के साफ पानी के बारे में जागरूकता बढ़ाने का लक्ष्य रखते हैं, ताकि वह स्वस्थ जीवन जी सकें.

हम मलेरिया और डेंगू की रोकथाम में मच्छरदानी के उपयोग, मच्छर प्रजनन को रोकने के लिए पानी की सफाई, सफाई और रोकथाम के लिए विभिन्न गतिविधियाँ, पहले छह महीनों के लिए विशेष स्तनपान के महत्व पर स्तनपान कराने वाली माताओं की परामर्श और समुदाय की नियमित स्वास्थ्य जांच, ख़राब पस्थितियों को बदलने के लिए शिविर आयोजित कर रहे हैं.

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स्वास्थ्य जागरूकता के दौरान डॉ. चितरंजन जेना

डॉ जेना आगे बताते हैं कि अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण जैसी अन्य समस्याओं के साथ इस जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है, लेकिन आदिवासी गांवों के चेहरे को पूरी तरह से बदलने के लिए और वह एक सकारात्मक बदलाव लाने में अपना योगदान दे रहा हूँ. हर गांव में युवाओं की एक टीम तैयार कर रहे हैं जो ग्रामीणों की आपातकाल में सहायता कर सके.

सड़क, बिजली एवं पानी के लिए प्रशासन से निरंतर संवाद किया जा रहा हैं जिसके चलते कुछ गाँवों में इन मुलभुत सुविधाओं ने दस्तक दी हैं. चिकित्सा विभाग और प्रशासन के समन्वय से इन लोगो के जीवन को बदला जा सकता हैं. हम एक ऐसा समूह बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो इस बदलाव को ज्यादा लोगो तक पहुंचा सके.

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आदिवासी महिला के इलाज के दौरान डॉ. चितरंजन जेना

डॉ. चितरंजन जेना के प्रयासों से ग्रामीणों में कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं. उन्होंने स्वास्थ सहायिका बहिनी (SSB) नाम से एक और पहल शुरू की है. जो ग्रामीणों और स्वास्थ्य विभाग के बीच एक ब्रिज के रूप में कार्य कर रही हैं. स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के त्वरित निस्तारण के लिए यह समूह गजब का काम कर रहा है. इससे आदिवासी लोगों को समय पर बेहतर चिकित्सा सेवाओं से लाभान्वित कर रही हैं जो कभी उनके लिए एक सपना था.

बी पॉजिटिव इंडिया, डॉ. चितरंजन जेना के जमीनी स्तर पर किये जा रहे वास्तविक प्रयासों की सराहना करता हैं. उड़ीसा के पिछड़े क्षेत्र में स्वास्थ्य परिदृश्य की स्थिति को बदलने के प्रति आशान्वित हैं. आप से प्रेरणा लेकर देश के अन्य युवा भी देश-निर्माण में अपना सहयोग करेंगे.

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