पैर नहीं तो क्या ? सपने तो पाल रखे है।
दिव्यांग हु तो क्या ? आसमान छूने के इरादे रखे है।

यह पंक्तियाँ एक दिव्यांग विद्यार्थी पर सटीक बैठती हैं। शारारिक कमजोरी या कमी की अपना हथियार बनाते हुए इस विद्यार्थी ने देश की कठिन परीक्षाओं में से एक नीट परीक्षा में सफलता हासिल की हैं। मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के साथ ही डॉक्टर बनने की तैयारी शुरू हो गयी हैं। लेकिन मेडिकल कॉलेज तक का सफर आसान नहीं था।

शारीरिक कमजोरी के साथ आर्थिक स्थिति ने भी राह में रोड़े डाले। पिता ने खेती की जमीन गिरवी रखकर कोचिंग संस्थान में दाखिला दिलाया तो कोचिंग संस्थान ने भी मदद के लिए आगे आया। कड़ी मेहनत और मार्गदर्शन के बाद उन्हें नीट में सफलता मिली हैं और असंभव को संभव करने वाले विद्यार्थी और भावी डॉक्टर का नाम हैं साजन कुमार।

साजन कुमार ने अपनी शारीरिक दुर्बलता को पीछे छोड़ते हुए कड़ी मेहनत से खुद को साबित किया और मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट में सफलता पायी। दोनों पैरों से चलने में अक्षम साजन कुमार के लिए बैसाखी बने उनके माता-पिता और कोचिंग संस्थान।

कोचिंग संस्थान के द्वारा न केवल साजन को पढ़ाई में मदद की गई, वरन उसे घर से लाने व ले जाने के लिए भी वाहन की व्यवस्था की गई। पढ़ाई के दौरान भी उसे क्लास तक पहुंचाने व हर कदम पर सहारा दिया गया। नीट में सफलता के बाद साजन कुमार को राजकीय मेडिकल कॉलेज बेतिया (बिहार) में एडमिशन मिला।

डॉक्टर बनने के बाद साजन दिव्यांगों का इलाज व मदद करने की चाह रखता है। साजन का मानना है कि दिव्यांगता एक अभिशाप नहीं, बल्कि चुनौती है। दृढ़ संकल्प एवं मजबूतआत्मविश्वास से इसका सामना करना चाहिए। मेरे स्थिति देखकर कई लोगों ने पापा को कोटा न भेजने की सलाह दी लेकिन उन्होंने मुझमें विश्वास रखा और मैंने उनके और अपने शिक्षकों के विश्वास पर खरा उतरने के लिए हर कोशिश की।

जन्म से ही दोनों पैरों से अक्षम साजन के परिवार की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर है। पिता लाल बहादुर रॉय जेरोक्स की दुकान चलाते हैं। मां पुनीता देवी गृहिणी है। साजन ने बताया कि थोड़ी बहुत जमा पूंजी थी, वो पापा ने मेरे इलाज में लगा दी। बैसाखी की मदद से चल पाता हूं। 10वीं तक की पढ़ाई पापा ने जैसे तैसे प्राइवेट स्कूल में कराई।

10वीं कक्षा 83 एवं 12वीं में 63 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। मात्र एक बीघा जमीन थी, जिससे घर में चार-पांच महीने जितना अनाज पैदा हो जाता था। मुझे पढ़ाई करने के लिए कोटा आना था। जिसका खर्चा वहन करना पापा के लिए काफी मुश्किल था लेकिन, मेरी लगन को देखते हुए उन्होने जमीन गिरवी रख पैसा उधार लिया और मुझे पढ़ने के लिए कोटा भेजा।

साजन का कहना है कि शारीरिक रूप से अक्षम होने के कारण कई तरह की दिक्कतों का सामना तो करना पड़ता है लेकिन यदि मजबूत इरादें हो तो मंजिल दूर नहीं होती। एमबीबीएस के बाद न्यूरोलॉजी में पीजी करना चाहता हूं।

बी पॉजिटिव इंडिया, साजन कुमार को नीट में सफलता पर बधाई देता हैं और उज्जवल भविष्य की कामना करता हैं।

( मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित )

Comments

comments