कोयले की खदानों के लिए मशहूर धनबाद की गरीब बस्तियों में “पाठशाला (Pathshala)” के जरिए शिक्षा की रोशनी फैला रहे हैं कोल इंडिया के अफसर देव कुमार वर्मा (Dev Kumar Verma).

देव कुमार वर्मा। उम्र सिर्फ 34 साल। बहुत ही मुश्किल से पढ़ाई पूरी की। कोल इंडिया में अफसर बने। अब पढ़ाई के जरिए ही सैकड़ों बच्चों की जिंदगी संवार रहे हैं। ये बच्चे सरकारी स्कूल भी न पहुंच पाते। लेकिन देव “पाठशाला” के जरिए इन बच्चों को पब्लिक स्कूलों की तरह इंग्लिश मीडियम से शिक्षा दिला रहे हैं।

यहां बच्चों की कोई फीस नहीं लगती। उन्हें स्कूल यूनिफॉर्म और कॉपी किताबें भी पाठशाला से निशुल्क मिलती हैं। दूर दराज की बस्तियों से रहने वाले छात्रों के लिए निशुल्क परिवहन सुविधा है।

कोयले की खदानों के लिए मशहूर झारखंड के धनबाद जिले में देव कुमार की तीन पाठशालाएं चलती हैं। ये पाठशालाएं कोयले की खदानों के पास बसी तीन मजदूर बस्तियों में हैं। इन स्कूलों में ज्यादातर बेहद गरीब मजदूरों के बच्चे पढ़ते हैं।

बचपन बीता संघर्ष में लेकिन हुनर से बनाई पहचान . .

देव कुमार का बचपन इन्हीं बच्चों की तरह बीता। पिता की पान की दुकान थी। चार साल की उम्र से ही देव कोयला खदान से कच्चा कोयला उठाकर लाते। ये कोयला घर में इस्तेमाल होता। पकाकर बेचा भी जाता। पढ़ाई बस्ती के ही सरकारी स्कूल में शुरू हुई। देव होनहार थे। 10वीं में उन्हें अच्छे अंक मिले।

कोल इंडिया के एक मैनजर ने आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया। प्रेरणा मिली तो ट्यूशन पढ़ाकर पढ़ाई का खर्च निकालने लगे। इस बीच पिता की नौकरी कोल इंडिया में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के तौर पर लगी तो पान की दुकान देव के हवाले हो गई।

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देव कुमार वर्मा द्वारा संचालित पाठशाला का दृश्य

पढ़ाई और स्कूल दोनों छूट गए। एक बार फिर से वहीं मैनेजर सामने आए। डांट-डपट और समझाकर आगे पढ़ने की नसीहत दी। देव एक बार फिर जुट गए। उसके बाद फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।

देव ने एनआईटी दुर्गापुर से एमबीए की डिग्री हासिल की। जिस कोल इंडिया में पिता चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे। उसी में 2010 में अफसर बन गए। पहली पोस्टिंग कोलकाता मिली। मन में कुछ करने की तमन्ना थी। लेकिन राह नहीं सूझ रही थी। रास्ता करीब पांच साल बाद मिला जब देव की पोस्टिंग अपने होम टाउन यानी धनबाद में हो गई।

खुद सक्षम होने के बाद अपनी मजदुर बस्ती के लिए कुछ करने की ठानी . .

देव की बस्ती में अब भी बहुत कुछ नहीं बदला था। बच्चे आज भी चलना शुरू करते ही कोयला बीनने के काम में लग जाते थे। उनकी जिंदगी कोयला खदानों के इर्द-गिर्द सिमटी थी। शिक्षा ने देव की किस्मत बदल दी थी। देव ने बस्ती में उसी शिक्षा के जरिए बच्चों की जिंदगी बदलने का फैसला लिया।

पत्नी प्रियंका आईआईटी से पीएचडी हैं। दोनों ने मिलकर बस्ती में बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। एक दो बच्चों से शुरुआत हुई। संख्या संख्या 20-25 हुई तो एक टीचर भी रख लिया। इस बीच लोगों ने स्कूल खोलने की गुजारिश की। देव का परिवार किराए के घर में आ गया और बस्ती वाले घर में पाठशाला खुल गई।

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देव कुमार वर्मा द्वारा संचालित पाठशाला का दृश्य

कतरास बाजार की आमताड़ बस्ती में मार्च 2015 में देव की पहली पाठशाला लगी। 60 बच्चों के साथ प्लेस्कूल से पांचवीं तक की कक्षा लगने लगी। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। पाठशाला की चर्चा भी होने लगी तो देव ने इस रोशनी को दूसरी बस्तियों में भी फैलाने का फैसला लिया।

दूसरी पाठशाला भागा बस्ती में खुली। तीन तरफ की कोयला खदान से घिरी इस बस्ती में कोयला उठाने वाले रहते हैं। तीसरी पाठशाला प्रेम नगर में खुली। यहां भी ज्यादातर मजदूर और कोयला उठाने वाले रहते हैं। इन तीनों स्कूलों में बच्चों की संख्या करीब 500 पहुंच चुकी है।

शिक्षा ऐसी की बड़े-बड़े स्कूल भी पीछे नजर आते है ..

देव की पाठशाला में शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से दी जाती है। यहां प्ले स्कूल से लेकर पांचवीं तक की पढ़ाई होती है। बच्चों को डिजिटल तरीके से पढ़ाया जाता है। जिन घरों में टीवी भी नहीं हैं, उन घरों से आने वाले बच्चे पाठशाला में कंप्यूटर, लैपटॉप, प्रोजेक्टर के जरिए शिक्षा हासिल कर रहे हैं।

इनका बायोमेट्रिक अटेंडेंस होता है। स्कूल में सीसीटीवी लगे हैं। यहां से पढ़े बच्चे इलाके के नामी अंग्रेजी स्कूलों के बच्चों से किसी तरह से कमतर नहीं हैं।

मिल रहा है दोस्तों का साथ , मुख्यमंत्री भी कर चुके है तारीफ ..

देव कुमार से इस काम में परिवार, कई दोस्तों, सहकर्मियों से मदद मिली।  शुरुआत में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी सुकृति माधव, भारतीय रेलवे सेवा की अफसर अविनाश कौर और भारतीय विदेश सेवा की अफसर श्रुति पाण्डेय समेत कई दोस्तों ने देव का उत्साह बढ़ाया और भरसक मदद की।

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देव कुमार वर्मा द्वारा संचालित पाठशाला का दृश्य

फिलहाल स्कूल का खर्च देव और उनके परिवार के वेतन और लोगों की मदद से चलता है। देव का वेतन करीब सवा लाख रूपये है। उनकी पूरी सैलरी स्कूल में कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों की तनख्वाह देने में खर्च हो जाती है। इसके अलावा व्यक्तिगत स्तर पर दोस्तों और जानने वाले से मदद लेते हैं।

स्वयं सेवी संस्था ‘प्रथम’ और रेलवे सर्विसेज के एक अफसर साथी ने दो स्कूलों में लाइब्रेरी खोलने में मदद की। अब देव ने पाठशाला में “सुपर 50” शुरू किया है। पाठशाला के ही मेधावी बच्चों की सरकारी सहायता प्राप्त टॉप के स्कूलों जैसे नेतरहाट, तिलैया सैनिका स्कूल में एडमिशन की तैयारी कराते हैं।

देव कुमार के इस प्रयास की सराहना राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास भी कर चुके हैं। अभी देव की पाठशाला में सिर्फ पांचवीं तक की पढ़ाई होती है। कोयलांचल की गरीब बस्तियों में हीरे तराशने में जुटे देव का सपना इसे बहुत आगे लेकर जाने का है।

बी पॉजिटिव, देव कुमार वर्मा के संघर्ष और गरीबों के प्रति उनके नेक कार्य की सरहाना करता है। उम्मीद करता है कि देश के युवां उनसे प्रेरणा लेकर देश के बच्चों के भविष्य का निर्माण करेंगे ।

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