अगर मन में सफल होने का पक्का इरादा हो तो कोई भी मुसीबत आपको रोक नहीं सकती । बचपन से ही पढ़ने में तेज अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए उसके पिता ने रेलवे स्टेशन पर कूली का काम तक किया । रेलवे स्टेशन पर बच्चों को कोचिंग के लिए जाता देखकर अपने बेटे को भी मेडिकल प्रवेश परीक्षा की कोचिंग के लिए भेज दिया ।

कॉचिंग की फीस के लिए ओवरटाइम शुरू कर दिया और पिता की मेहनत को बेटे ने भी जाया नहीं किया और आज वो न केवल डॉक्टरी की पढाई कर रहे है बल्कि समाज में कई गरीब एवं वंचित बच्चों के लिए प्रेरणाश्रोत बन चुके है ।

संघर्षों एवं पसीने की बूंदों से सींचीं गयी है इस भावी डॉक्टर की कहानी । जोधपुर के रहने वाले खेराजराम चौधरी (Kheraj Ram Chaudhary) ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास करके अपने कुली पिता की मेहनत को सफल बना दिया ।

मैं ज़िन्दगी भर एक मास्टर नहीं बन सका। लेकिन मेरा सपना था कि बेटे को डॉक्टर बना सकूँ।” ये कहना है चेहरे पर ख़ुशी की चमक लिए बयालीस वर्षीय जुगताराम चौधरी (Jugtaram Chaudhary)  का, जो जोधपुर रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करते हैं।

जुगताराम चौधरी के बेटे खेराज चौधरी ने तमाम तरह की मुश्किलों के बाद हाल ही में ओबीसी केटेगरी के तहत ऑल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट (AIPMT – 2015) में 283वां रैंक हासिल किया है।

“स्टेशन पर हर महीने मैं छात्रों को कोटा की ट्रेन पकड़ते हुए देखा करता था। मुझे बस इतना पता था कि वो वहां डॉक्टर या इंजीनियर बनने जाते हैं। एक दिन मैंने उनसे पूछ ही लिया कि डॉक्टर कैसे बनते हैं, उनकी पहली प्रतिक्रिया तो ये थी कि मैं जानकर क्या करूंगा। मैंने उन्हें बताया कि मैं उनकी तरह अपने बेटे को भी डॉक्टर बनाना चाहता हूँ।”

राजस्थान के बाड़मेर जिले से 80 कि.मी दूर सारनोर गांव में रहने वाले खेराज इससे पहले भी इस परीक्षा में बैठ चुके हैं, तब उनकी रैंक 18,500 थी। खेराज की इस बार की रैंक को देखते हुए उन्हें फिलहाल जोधपुर के एसएन मेडिकल कॉलेज में दाख़िला मिल सकता है।

जुगताराम चौधरी खुद बी.एड पास हैं। लेकिन इसके बावजूद उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिल पाई। वो जोधपुर रेलवे स्टेशन पर कई बार 20 घंटे लगातार काम करते हैं, ताकि बेटे की पढ़ाई के लिए पैसों की तंगी न हो। जब से बेटे की इस कामयाबी की ख़बर जुगता राम को मिली है, वो अपनी कमाई का आधा हिस्सा मिठाई खरीदने में खर्च कर रहे हैं।

परिवार को पैसों कमी ज़रूर है, लेकिन उनके सपने मज़बूत लगते हैं। कोटा में पढ़ते हुए खेराज को इंस्टीटयूट से मिली यूनिफॉर्म से ही काम चलाना पड़ा, क्योंकि घर की माली हालत इतनी ठीक नहीं थी कि वो और कपड़े खरीदे सकें। खेराज कहते हैं, “सिलेक्शन हो गया है, पैसों की कमी पड़ी तो किसी और से उधार लेंगे, लेकिन अब मैं रुकने वाला नहीं हूँ।

बेटे को आगे पढ़ाने के लिया लिया उधार

जोधपुर में स्कूली पढ़ाई के बाद जुगता राम ने खेराज को आगे पढ़ने के लिए कोटा भेज दिया था, ताकि वो वहां अच्छी कोचिंग ले सकें। इससे पहले 12वीं में खेराज को 79 प्रतिशत अंक हासिल हुए  थे। खेराज की पढ़ाई के लिए वो अब तक क़रीब एक लाख रुपए का उधार भी ले चुके हैं।

स्टेशन पर कुली का काम करने वाले जुगताराम चौधरी का सपना था कि वो अपने बेटे को डॉक्टर बना सकें। “मेरे को डॉक्टर बनके दिखाना है, वो दिखाना ही है। चाहे कितनी भी परेशानियां आयें” ये कहना है खेराज का।

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