एक किसान अपने पौने दो एकड़ नीबू के बगीचे की लागत से परेशान था, सिर्फ लागत ही लाखों रुपए में पहुंच जाती थी। अभिषेक जैन ने इस बढ़ी लागत को कम करने के लिए बाजार से रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाएं लेनी बंद कर दी। पिछले डेढ़ साल से जैविक तरीके अपनाने से इनकी हजारों रुपए की लागत कम हो गयी है। लागत कम होने से ये नीबू के बगीचे से बाजार भाव के हिसाब से सालाना पांच से छह लाख रुपए बचा लेते हैं।

राजस्थान के भीलवाड़ा जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर संग्रामपुर गाँव के अभिषेक जैन (Abhishek Jain) बीकॉम करने के बाद मार्बल के बिजनेस से जुड़ गये। अभिषेक जैन गाँव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, “पिता के देहांत के बाद बिजनेस छोड़कर पुश्तैनी जमीन को सम्भालना पड़ा। खेती करने के दो तीन साल बाद मैंने ये अनुभव किया कि एक तिहाई खर्चा सिर्फ खाद और दवाइयों में निकल जाता है। इस बढ़ती लागत को कम करने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया था।

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वो आगे बताते हैं, “लागत कम करने के लिए पिछले डेढ़ साल पहले साकेत ग्रुप के बारे में पता चला, जो जैविक खेती के लिए किसानों को प्रशिक्षण देता है। इस ग्रुप से जुड़ने के बाद हम पूरी तरह से नीबू के बगीचे को जैविक ढंग से कर रहे हैं, इससे जो लागत 33 प्रतिशत आती थी अब वो 10 प्रतिशत पर आ गयी है।

अभिषेक को खेती करने का पहले कोई अनुभव नहीं था। इनकी कुल छह एकड़ सिंचित जमीन है, पौने दो एकड़ जमीन में नीबू की बागवानी और दो एकड़ में अमरुद की बागवानी ये पिछले कई वर्षों से कर रहे हैं। साल 2007 में इनके पिता को हार्ट अटैक से देहांत हो गया। पुश्तैनी जमीन को करने के लिए इन्होने अपने बिजनेस को बंद किया और 2008 से खेती करने लगे। “खेती को लेकर पहले मेरा कोई अनुभव नहीं था, पर जब खेती करना शुरू किया तो धीरे-धीरे चीजों को सीखने लगा था। हमारे यहाँ नीबू का बगीचा हमेशा से पिता जी खुद करते थे, अमरुद और बाकी की फसलें बटाई पर उठा दी जाती थी।

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अभिषेक बताते हैं, “नीबू की बागवानी में हर साल सात आठ लाख रुपए निकल आते थे लेकिन लागत भी डेढ़ से पौने दो लाख आती थी। इस लागत में सबसे ज्यादा पैसा खाद और कीटनाशक दवाइयों में खर्च हो रहा था। इस लागत को कम करने के लिए जब मैंने बहुत रिसर्च किया तो सोशल साइट के जरिये साकेत पेज पर पहुंचे, जहाँ किसानो को लागत कम करने के तौर तरीके सिखाए जाते थे।

एक बार नीबू का बगीचा लगाने पर 30 साल तक रहता है जबकि अमरुद का बगीचा 25 साल तक रहता है। अभिषेक के पौने दो एकड़ खेत में नीबू के लगभग 300 पौधे 15 साल पहले से लगे हैं। 25 रुपए एक पौधा पर खर्चा आता है। नीबू के पौधे लगाने के तीन या साढ़े तीन साल बाद से फल निकलने शुरू हो जाते हैं। दो साल तक इसमे कोई भी फसल ले सकते हैं।

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अभिषेक बताते हैं, “नीबू के बगीचे में अगर खाद और कीटनाशक दवाएं न डालनी पड़ें तो इसमे ज्यादा कोई खर्चा नहीं होता है। नीबू और गोबर की खाद का ही प्रयोग करें तो सिर्फ मजदूर खर्च ही आता है, बाकी की लागत बच जाती है। एक पौधे का एक साल में देखरेख में सिर्फ 100 रुपए का खर्चा आता है।

वैसे तो नीबू की पैदावार सालभर होती रहती है। लेकिन सबसे ज्यादा नीबू जुलाई से अक्टूबर में निकलता है। अभिषेक का कहना है, “एक पौधे से एक साल में बाजार भाव के हिसाब से औसतन तीन हजार का प्रोडक्शन निकल आता है, नीबू बाजार भाव के अनुसार 20 रुपए से लेकर 150 रुपए किलो तक रहता है। पिछले साल आठ लाख रुपए का नीबू बेचा था, इस साल छह साढ़े पांच लाख रुपए का बेच चुका हूँ।”

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वो आगे बताते हैं, “अमरुद के बगीचे से सालाना छह लाख रुपए निकल आते हैं, नीबू और अमरुद के बगीचे से लागत निकाल कर हर साल 12 से 14 लाख रुपए बच जाते हैं। बगीचे के अलावा मक्का, ज्वार, उड़द, मूंगफली, गेहूँ, जौ, चना सरसों उगाते हैं। सब्जियों में मिर्च, भिन्डी, ग्वारफली, बैंगन, टमाटर, फूलगोभी, पत्तागोभी बोई जाती हैं।”

अभिषेक सभी किसानो को ये सन्देश देते हैं, “अगर खेती में मुनाफा कमाना है तो बाजार पर अपनी निर्भरता को कम करना होगा। जैविक खादें और कीटनाशक दवाइयां घर पर बनानी होंगी, पुराने बीजों को बचा कर रखना होगा। तभी एक आम किसान की लागत कम होगी और बचत ज्यादा होगी।

पिछले डेढ़ साल में सिर्फ जैविक तौर तरीके अपनाकर हमने अपनी लाखों रुपए की लागत कम कर ली है, जबकि नीबू के उत्पादन में कोई असर नहीं पड़ा।” अभिषेक धीरे-धीरे अपनी पूरी खेती को जैविक तरीके से करने लगे हैं क्योंकि इसमे इनकी लागत बहुत कम हो रही है।

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साभार : गांव कनेक्शन

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