प्लास्टिक के कारण हो रहे पर्यावरण प्रदुषण से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है, हर साल लाखो मेट्रिक टन प्लास्टिक वेस्ट पैदा हो रहा है । सस्ता और मजबूत होने के कारण प्लास्टिक आज हमारी दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चूका है ।

घरेलू सामान से लेकर हर जगह पर प्लास्टिक प्रोडक्ट्स की भरमार है और इस दौड़भरी ज़िन्दगी में किसी को भी प्रकृति की फ़िक्र नहीं है । प्लास्टिक को जमीं में पूरी तरह से गलने में हज़ारो साल लग जाते है और इस पूरी प्रक्रिया में पर्यावरण को बहुत हानि होती है ।

इन्वेस्टमेंट बैंकर योगेश जब अपने काम के सिलसिले में यूरोप के दौरे पर थे तो उन्होंने पाया कि वहां के किसान और बहुत आम लोग पर्यावरण को फायदा पहुंचाने के लिए प्राकृतिक पदार्थों से बने प्रोडक्ट्स पर ही ज़ोर दे रहे थे तथा प्लास्टिक और अन्य पदार्थों को लगभग प्रतिबंधित करने की कगार पर आ चुके है ।

जर्मनी में एक किसान से योगेश के हुए वार्तालाप ने कृषि और खेतीबाड़ी के प्रति योगेश के नजरिये को पूरी तरह से परिवर्तित कर दिया ।

उस किसान ने बताया कि जर्मनी ने केवल अत्याधुनिक तकनिकी संसाधन उपयोग में लेता है बल्कि उस से कई गुना ज्यादा उपज और प्रकृति को सरंक्षित करने में भी अव्वल है । वहां के किसानों की जीवनशैली और आत्मनिर्भरता ने योगेश को काफी प्रभावित किया और उन्होंने कृषि और पर्यावरण के क्षेत्र में कुछ करने का ठान लिया ।

पुणे के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे योगेश का खेतीबाड़ी से कोई सीधा संपर्क नहीं था । पुणे यूनिवर्सिटी से अपनी मास्टर्स पूरी करने के बाद उन्होंने आईटी इंडस्ट्री में कदम रखा और एक आरामदायक आईटी प्रोफेशनल की ज़िन्दगी बिताना शुरू कर दिया ।

आईटी इंडस्ट्रीज में मिले मौको ने योगेश को कई देशों की यात्रा करने का अनुभव प्रदान किया । विदेशी प्रवास के दौरान ही योगेश को विदेशी और भारतीय किसानों के बारे में सोचने का मौका मिला ।

भारत लौटने के बाद योगेश के दिमाग में हमेशा भारतीय किसानों का जीवनस्तर सुधारने के लिए काम करने की तमन्ना थी । वो चाहते थे कि भारत के किसान भी आत्मनिर्भर और अमीर हो और उनका जीवनस्तर ऊपर उठे । इसी बीच किसानों के आत्महत्या की खबरे उन्हें कचोटती थी ।

योगेश ने धीरे-धीरे आधुनिक खेतीबाड़ी और तकनीक के बारे में रिसर्च करना शुरू किया। शुरुआती दौर में वो विभिन्न किसानों से मिले, उनके खेती करने के तरीको के बारे में जाना और नवाचार के लिए विभिन्न प्रदर्शनियों के साथ ही इंटरनेट पर भी खोजबीन की ।

इसी रिसर्च के दौरान उनकी मुलाकात हेमंत बेड़कर से  हुई जो बांस के पेड़ पर रिसर्च कर रहे थे । उनसे मुलाकात के बाद योगेश ने बांस के प्रोडक्ट्स बेचने का फैसला लिया क्योंकि पुणे के आसपास बांस के पेड़ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे एवं बांस की खेती के लिए पुणे की जलवायु भी उपयुक्त थी ।

योगेश ने अपनी आरामदायक नौकरी को छोड़ दिया और अपने फार्म हाउस में 10 किसानों के साथ मिलकर बांस के प्रोडक्ट्स बनाने के लिए बम्बू इंडिया के नाम से मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की स्थापना की ।

शुरुआती दौर में सब नए प्रयोग किये गए जिनमे कई आइडियाज आये और चले गए । योगेश ने खुद से इंटरनेट की मदद से बांस के प्रोडक्ट्स बनाना सीखा और फिर उनकी यूनिट के किसानों को भी सिखाया ।

एक बार प्रोडक्ट्स तैयार होने के बाद टेस्टिंग के लिए इन प्रोडक्ट्स को अपने करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों को उपयोग में लेने के लिए राजी किया । अभी योगेश के पास कई प्रोडक्ट्स के प्रोटोटाइप तैयार है और नए प्रोडक्ट्स पर काम चल रहा है ।

उनके पास अभी 40 नए प्रोडक्ट्स बनने के लिए तैयार है जो बांस के पेड़ से बनाये जा सकते है । अभी लगभग 100 किसान परिवारों को 2017 के अंत तक Bamboo India  से जोड़ने का प्लान है । उनकी यूनिट शुरू से ही मुनाफे में चल रही है और नेचुरल प्रोडक्ट्स वाजिब दाम में देने का उनका आईडिया चल निकला ।

उनकी कंपनी मुख्यतया: पुणे के आसपास के किसानों के साथ काम कर रही है और बांस से निर्मित प्रोडक्ट्स जैसे टूथब्रश, स्पीकर्स के साथ ही सजावट के सामानो का निर्माण कर रही है । लगभग पिछले 3 सालों से किसानों का जीवनस्तर सुधारने के लिए यह कंपनी काम कर रही है ।

जून 2016 में उन्होंने अपना ऑनलाइन स्टोर भी खोल दिया है जिससे कोई भी बम्बू इंडिया के प्रोडक्ट्स भारत में कही से भी ऑनलाइन आर्डर दे सकते है। अभी उन्होंने लगभग 4000  से ज्यादा आर्डर पुरे कर दिए है और 60 लाख से ज्यादा का टर्नओवर हुआ है ।

पर्यावरण और किसानों की चिंता ने एक आईटी प्रोफेशनल को किसान बनने पर प्रेरित किया है । हम योगेश के जज्बे और साहस को सलाम करते है और इनके नेक कार्य के लिए शुभकामनाए देते है ।

आप भी अगर “Bamboo India ” के प्रोडक्ट्स खरीदना चाहते है तो यहाँ पर क्लिक करे ।

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