असफलता हमारे जीवन की एक कड़वी सच्चाई है , कोई इस बात की सच्चाई को समझकर गाँठ बांध लेता है तो कोई पूरी ज़िन्दगी अपनी असफलता का रोना रोता रहता है । असफलता ही किसी भी व्यक्ति या बिज़नेस के सफल होने की प्रथम सींख या सीढी होती है । हमारे सामने ऐसे कई व्यक्ति या समूह होते है जिन्होंने अपने सफर में बहुत असफलताओं का सामना किया लेकिन उन्होंने निराश होने के बजाय असफलता का बारीकी से विश्लेषण किया।

नए जोश एवं योजना के साथ अपने कार्य को पूरा करने में लगे रहे और बाद में सफलता भी हार मानकर उन जुझारू और मेहनती व्यक्तियों या समूहों के कदम चूमने लगी । ऐसे ही कहानी है गुजरात के एक सूखा ग्रस्त इलाके से आने वाले व्यक्ति का जिसके पास जीवन-यापन करने के लिए कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं था लेकिन उसने नया हुनर सीखकर आज 1800 करोड़ की एक सफल कंपनी बना दी है । इस कंपनी का नाम है बालाजी वेफर्स (Balaji Wafers) और इसके संस्थापक है चंदूभाई वीरानी (Chandubhai Virani)

बालाजी वेफर्स का भारतीय खाद्य बाजार में बहुत बड़ा नाम बन चूका है और इसने विदेशी एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों से मिलने वाली प्रतिस्पर्धा में बाजी मारते हुए भारत की वेफर्स बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी बन चुकी है। राजस्थान एवं गुजरात में इसके प्रोडक्ट्स की बिक्री अन्य कई ब्रांड्स के मुकाबले कई ज्यादा हुई । जिसके चलते 10,000 रुपये के छोटे से शुरुआती निवेश से शुरू हुई,  यह कंपनी ने साल 2017 में 1800 करोड़ रुपये का कारोबार में सफल हुई । बालाजी वेफर्स की असाधारण कामयाबी के पीछे चंदुभाई वीरानी की कड़ी मेहनत और व्यापारिक दूरदर्शिता को श्रेय जाता है ।

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बालाजी वेफर्स के प्रोडक्ट

गुजरात के मराठवाड़ा इलाके में एक किसान परिवार में पैदा होने वाले चंदूभाई के परिवार में तीन भाई है । बार-बार अकाल के कारण उनके परिवार को खेतीबाड़ी में अक्सर नुकसान उठाना पड़ता था इसलिए साल 1972 में उनके पिता ने चारो भाईयों को 20,000 रुपये दिए थे ताकि वो कुछ नया बिजनेस कर सके। खेतीबाड़ी से जुड़े परिवार ने खेती के औजारों एवं यंत्रों में ही कुछ व्यापार करने का निर्णय किया ।

उन्होंने इन पैसो से खाद और खेती के साजो-सामान का बिजनेस किया, लेकिन व्यापार में अनुभव की कमी एवं रणनीति के कारण उनको भारी नुकसान झेलना पड़ा और इस तरह चंदूभाई ने पहली बार बिज़नेस में असफलता का स्वाद चखा। जब उन्होंने असफलता की जाँच-पड़ताल की तो पाया कि किसी ने धोखे से उन्हें नकली सामान बेच दिया था और इस कारण से बिजनेस में लगाये चारों भाइयों के सारे रुपए डूब गए लेकिन यह उनके लिए बहुत बड़ा सबक बना।

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पहले ही व्यापार में बड़े नुकसान और अकाल के चलते चंदूभाई और उनके भाइयों को अपने गांव से शहर पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा । इस तरह नौकरी की तलाश में चंदूभाई ने अपने नजदीकी शहर राजकोट का रुख किया। चंदुभाई ने अपने गांव से 10वी तक की पढाई की थी, इस वजह से उन्हें नौकरी ढूढने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी और एक सिनेमाघर के कैंटीन में नौकरी मिल गयी। कैंटीन में काम करने के अलावा उन्होंने अतिरिक्त आय के लिए फिल्मो के पोस्टर चिपकाने से लेकर सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी की। उन्होंने काम को कभी छोटा नहीं समझा और पैसे कमाने के लिए ज्यादा से ज्यादा मेहनत पर ध्यान दिया ।

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सिनेमाघर में कैंटीन चलाते चंदूभाई वीरानी

अपनी लगन और मेहनत के चलते  जल्द ही उनका कैंटीन मालिक भी खुश हो गया और चंदूभाई और उनके भाइयों को उसने अपनी कैंटीन ठेके में चलाने के लिए दे दी । ये चंदूभाई और उनके भाइयों के लिए बहुत बड़ी जीत थी । सिनेमाघर में चाय-पकोड़े के साथ ही पॉपकॉर्न एवं वेफर्स का भी चलन था, जिनमे से ज्यादातर चीज़े चंदूभाई और उनके भाई मिलकर बना लेते थे लेकिन आलू के वेफर्स के लिए उन्हें एक विक्रेता पर निर्भर रहना पड़ता था।

इसी बीच चंदूभाई ने कैंटीन से हुए मुनाफे के लिए राजकोट में ही घर खरीद लिया और घर पर वो कई तरह के नाश्ते के लिए व्यंजन तैयार करने लगे । उन्होंने कैंटीन के लिए खुद मसाला सैंडविच बनाना शुरू किया। उच्च गुणवत्ता और स्वाद के कारण घर पर चंदूभाई द्वारा तैयार किये हुए सैंडविच को लोगो ने पसंद करना शुरू कर दिया लेकिन सैंडविच के निर्माण में एक समस्या का सामना करना पड़ता है क्योंकि सैंडविच ज्यादा देर तक ताज़ा नही रह पाता था और जल्दी ख़राब हो जाता था जिससे उन्हें कभी नुकसान भी उठाना पड़ता था ।

आलू वेफर्स सप्लायर के साथ उन्हें काम करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था क्योंकि वो न तो समय पर कैंटीन में माल पहुंचता और धीरे-धीरे उसके वेफर्स की गुणवत्ता और स्वाद भी कम होता चला गया। चंदूभाई ने अन्य सप्लायर से भी बात की लेकिन कुछ ही दिनों में उन्हें वापस इसी तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा ।

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इन सब समस्यायों के समाधान के लिए चंदूभाई ने खुद से ही आलू वेफर्स का निर्माण करने के लिए योजना बनाना शुरू किया। उन्होंने मार्केट में काफी खोज-बीन करने के बाद 10,000 के शुरुआती निवेश से घर पर ही वेफर्स बनाने का निर्णय लिया। उस समय आलू छिलने की मशीन के दाम ज्यादा होने के कारण उन्होंने अपनी जरूरत के अनुसार राजकोट में ही कारीगरों से सस्ती मशीन बनवाई।

कम खर्च में ही उनका चिप्स एवं वेफर्स निर्माण संयत्र चालू हो गया लेकिन समस्याए अभी भी उनके दरवाजे पर दस्तक दे रही थी। कभी मशीन में कुछ तकनिकी खामी आ जाती तो कभी काम करने वाले हलवाई और मजदुर समय पर काम नहीं करते थे और महीने में कई दिन छुट्टी ले लेते ।

असफलताओं से खेलने वाले चंदूभाई कहाँ हार मानने वाले थे । उन्होंने खुद से ही काम करना चालू किया और देर रात तक चिप्स बनाने एवं उन्हें तेल में तलने का काम भी करने लगे । धीरे-धीरे उनका काम बढ़ने लगा और उन्हें तीन सिनेमाघरों के कैंटीन संभालने का भी कॉन्ट्रैक्ट मिल गया जिससे न केवल उनके वेफर्स की बिक्री बढ़ी बल्कि अच्छा-खासा मुनाफा भी कमाने लग गए ।

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अपने बिज़नेस को विस्तार देने की रणनीति के तहत उन्होंने 30 से ज्यादा दुकानों पर भी वेफर्स बेचना शुरू कर दिया । कमाई बढ़ने के साथ ही समस्याए भी बढ़ती गयी और दुकानदार उनका पैसा चुकाने में कभी देरी करते तो कभी गुणवत्ता के बहाने उनको खुले पैकेट लौटा देते लेकिन चंदूभाई ने इसे एक अवसर के रूप में लिया और उन्हें भारतीय बाजार की बारीकियां सीखने में मदद मिली ।

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बालाजी वेफर्स के स्वचालित संयत्र में काम करता कर्मचारी

चिप्स एवं वेफर्स निर्माण में छुपी असीम सम्भावनाएं दिख रही थी इसीलिए उन्होंने अपनी सारी पूंजी लगाकर एक फैक्ट्री लगाने का निर्णय लिया और जोखिम उठाने के लिए प्रसिद्ध चंदूभाई ने राजकोट के GIDC एरिया में फैक्ट्री की शुरुआत की जिसका नाम उन्होंने “बालाजी वेफर्स” रखा । उस समय तक बालाजी वेफर्स उत्पादन के हिसाब से गुजरात की सबसे बड़ी वेफर्स निर्माता कंपनी थी ।

उच्च गुणवत्ता के साथ ही चंदूभाई ने आक्रामक मार्केटिंग रणनीति अपनाते हुए अपने प्रोडक्ट्स को गुजरात से बाहर बेचने का साहसिक प्रयास किया और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से कड़ी चुनौती के बावजूद उन्होंने बहुत कम समय में अपना शानदार डीलरशिप नेटवर्क खड़ा कर दिया । कम दाम एवं लाजवाब स्वाद के कारण बालाजी वेफर्स ने उत्तर-भारत के छोटे-छोटे गांवों में अपनी खास जगह बना दी । चंदुभाई ने कभी भी प्रोडक्ट की गुणवत्ता से समझौता नही किया जिसकी बदौलत आज बालाजी वेफर्स अपने क्षेत्र में सबसे बड़ी कंपनी बनकर उभरी।

आज बालाजी वेफर्स के आँकड़े देखकर सभी अचंभित हो जाते है क्योंकि आज भारत में कंपनी के चार मैन्युफैक्चरिंग प्लांट के साथ ही 20,000 डीलर्स का जबरदस्त नेटवर्क हैं। उनके प्लांट प्रतिदिन 6.5 लाख किलो आलू वेफर्स और 10 लाख किलो नमकीन बनाने की क्षमता रखते है । बालाजी आलू वेफ़र्स के अलावा 30 तरह के नमकीन और अन्य स्नैक्स का निर्माण भी करता है ।

एक सिनेमाघर में चाय एवं पकोड़े बेचने वाले चंदूभाई ने अपनी काबिलियत और मेहनत से भारतीय खाद्य उद्योग में एक बिज़नेस साम्राज्य खड़ा कर दिया है। उन्होंने बिना कोई मैनेजमेंट की डिग्री के अपने अनुभव से भारतीय मार्केट का चहेता ब्रांड बना दिया है । उम्मीद है आज के युवा चंदूभाई के जीवन सफर से कुछ प्रेरणा लेंगे और किसी भी काम को छोटा समझे बिना अपनी लगन और मेहनत से सफलता के नए आयाम स्थापित करेंगे ।

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