आईपीएल के मैच के प्रसारण के दौरान कई चीजों पर कैमरा फोकस किया जाता है. जब चौका या छक्का लगता है तो दर्शकगण अपने हाथ में लिये झंडे को ज़ोर-ज़ोर से लहरा कर उत्साहित होते दिखाई देते हैं. आईपीएल की सभी टीमों के अलग-अलग झंडे से लेकर फ्लेक्सीज है. किसी भी मैच में हज़ारों की संख्या दर्शक आते है और सैंकड़ों की संख्या में यह झंडे दिखाई देते हैं.

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मैच के दौरान झंडो के साथ दर्शक | Photo Credits : Internet

परंतु क्या कभी किसी ने सोचा है कि मैच खत्म होने के बाद इन झंडों का क्या हश्र होता है. अधिकतर दर्शक इन झंडों को अपनी कुर्सी के आसपास फेंक कर स्टेडियम से चले जाते हैं और अंत में यह झंडे गन्दगी का हिस्सा बन कर किसी कूड़ेदान या गटर की शोभा बढ़ा रहे होते हैं या डंपिंग यार्ड के किसी कोने में पड़े होते हैं.

यह बर्बादी बेंगलुरु के एक एनजीओ या सामाजिक संस्था को मंजूर नहीं थी. स्वाभिमान नामक इस एनजीओ ने इस बर्बादी को रोकने की एक शानदार योजना बनायीं. स्वाभिमान के कार्यकर्ताओं ने  “साहस : ज़ीरो वेस्ट ” नामक एक सामाजिक संस्थान की मदद से इन झंडों को चिन्नास्वामी स्टेडियम से एकत्रित करवाना शुरू कर दिया. हर मैच के बाद हज़ारों की संख्या में झंडे इकट्ठे होने लगे.

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RCB के फ्लैग का बैग बनाती महिला | Photo Credits : Internet

कार्यकर्ताओं ने 30 से अधिक स्थानीय महिलाओं से सम्पर्क स्थापित किया जो सिलाई का काम जानती थी. उन्हें सिलाई मशीन उपलब्ध करवाई गई. झुग्गियों में रहने वाली इन महिलाओं को झंडे दे दिये गए और उन्हें इन झंडों को सिलाई करके बैग (थैला) बनाने को कहा गया. हर बैग को सिलने का मेहनताना फिक्स कर दिया गया.

पायलेट प्रोजेक्ट कामयाब रहा तो हर रोज़ एक महिला 20 से अधिक बैग सिलने लगी. कुछ ही दिनों में सैंकड़ों बैग तैयार हो गये. इस सारे कार्यक्रम का दारोमदार संभाला हैं चिराग अरोड़ा ने. चिराग अरोड़ा ने अपनी टीम के साथ मिलकर इन बैग्स को स्थानीय फल सब्ज़ी बेचने वालों में मुफ्त में बांट दिया. चिराग अरोड़ा बेंगलुरु के कोरमंगला क्षेत्र में रहते हैं और एक निजी कंपनी में काम करते हैं.

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फ्लैग से बने बैग के साथ चिराग अरोड़ा | Photo Credits : Internet

चिराग बताते हैं कि इस सारे प्रयास से कई फायदे हुये हैं. पहला फायदा यह हुआ कि महंगे कपड़े से बने झंडे कबाड़ में जाने से बच गये और प्रदुषण भी कम हुआ. झंडों को सिल कर बैग बनाने की प्रक्रिया में महिलाओं को रोजगार मिल गया.

स्थानीय फल सब्ज़ी बेचने वालों को मुफ्त में बैग मिल गये और इस प्रयास से पॉलीथिन के बैग पर लगाम लग गयी जिनमें डाल कर विक्रेता फल सब्ज़ी बेचते थे.

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सहस : जीरो वेस्ट की टीम | Photo Credits : Saahas Zero Waste’s Facebook Page

एक पंथ दो काज का उदाहरण तो सुना था परंतु इस प्रयास से एक पंथ कई काज का उदाहरण बन गया. बी पॉजिटिव इंडिया, चिराग अरोड़ा और “साहस : ज़ीरो वेस्ट ” की पूरी टीम के प्रयासों की सराहना करता हैं.

( ये स्टोरी रचित सतीजा के फेसबुक वॉल से साभार ली गयी हैं. )

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