किसान का नाम लेते ही बेबस सा चेहरा, अपनी फसल का पूरा मूल्य न मिलने की खीज, कर्ज से परेशान व्यक्ति नजर आता है. फटे पुराने और मेले-कुचेले कपड़ों में खेतों में मेहनत करता हुआ इंसान दिखाई देता है लेकिन आज हम एक ऐसे किसान की बात कर रहे है जिसने अपनी आरामदायक नौकरी को छोड़कर नयी तकनीक और बाजार की डिमांड के अनुसार खेती करना शुरू किया और आज वो साल के लाखो रुपये केवल खेतीबाड़ी से कमाते है. इस प्रगतिशील किसान का नाम है : आशुतोष पारीक (Ashutosh Pareek).

आशुतोष पारीक की उम्र महज़ 26 साल है और उन्होंने आईटी की अपनी आरामदायक नौकरी को छोड़कर खेती का दामन थामा लेकिन परंपरागत खेती करने के बजाय लीक से हटकर इन्होने नयी तकनीक को अपना साथी बनाया. कृषि अधिकारियों के साथ सतत चर्चा, रिसर्च और नयी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए आशुतोष ने अपनी पुश्तैनी जमीन पर ग्रीन हॉउस या पॉली हाउस लगवाया.

बैंक और सरकारी योजनाओं का फायदा उठाने के लिए कृषि विभाग एवं बैंक अधिकारीयों के संपर्क में रहे और 2016 में उन्होंने अपने पॉली हाउस से खीरे की पहली फसल ली. नवाचार और कीटनाशकों के कम प्रयोग के कारण उनकी लागत कम रही और पहली ही फसल से पांच लाख का फायदा हुआ.

इसके बाद आशुतोष ने डच गुलाब की खेती करना शुरू किया (उनके क्षेत्र में किसी ने भी इसके बारे में पहले सुना भी नहीं था) जो उनके लिए मुनाफे का सौदा साबित हुई और उनकी कमाई सालाना पचास लाख तक पहुँच गयी.

Ashutosh Pareek in his farm
अपने पॉलीहाउस में आशुतोष पारीक

आशुतोष पारीक राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के बीगोद क़स्बे के रहने वाले है. उनका परिवार पहले भीलवाड़ा शहर में रहता था लेकिन कुछ समय के बाद वापस गांव में रहने का निर्णय लिया. आशुतोष एक सयुंक्त परिवार में रहते है और परिवार के बीस से ज्यादा सदस्यों का खाना एक ही चूल्हे पर बनता है.

आशतोष ने बी पॉजिटिव से खास बातचीत में बताया कि मेरा जन्म एक किसान परिवार में हुआ और मेरा परिवार कई वर्षों से खेती-बाड़ी से जुड़ा हुआ है. हमारे क्षेत्र में संतरे की खेती होती है और उसमे हमारा परिवार अग्रणी रहा. मेने पांचवी तक पढाई भीलवाड़ा शहर में की लेकिन परिवार के शिफ्ट हो जाने के कारण आगे की पढाई गांव से की.

इसके बाद मैंने आईआईटी की कोचिंग के लिए दो साल तक कोटा में रहकर पढाई की. इसके बाद मेरा चयन जयपुर के निजी इंजीनियरिंग कॉलेज में स्कालरशिप के साथ हो गया. इंजीनियरिंग की पढाई के दौरान ही मेरा झुकाव खेती-बाड़ी की तरफ था और जयपुर में रहने के दौरान दुर्गापुरा स्थित कृषि रिसर्च संस्थान से आर्गेनिक खेती के साथ ही डच रोज़ एवं ग्रीन हाउस के बारे में ट्रेनिंग ली.

पढाई के दौरान ही मेने खेतीबाड़ी के गुर सींखने शुरू कर दिए लेकिन इसी बीच मेरा चयन देश की नामी आईटी कंपनी इनफ़ोसिस में छह लाख प्रतिवर्ष के पैकेज पर हो गया. इसके बाद मेने एक साल नौकरी की और सेल्सफोर्स जैसी नयी तकनीक पर भी ट्रेनिंग ली लेकिन नौकरी करने के दौरान मुझे महसूस हुआ कि मुझे खेती ही करनी है.

अपने पॉलीहाउस में आशुतोष पारीक

2016 में मैंने सात लाख के पैकेज वाली नौकरी को छोड़कर अपने गांव लौटने का निर्णय किया. शुरुआती कुछ समय के लिए मैंने अपने पुश्तैनी खेतों में ही काम किया और खेतीबाड़ी के बारे में रिसर्च करना बेहतर समझा.

कुछ नया करने के लिए मैंने बैंक से लोन लेने के बाद सरकारी योजनाओं का फायदा उठाते हुए अपने खेत में एक एकड़ में ग्रीन हाउस लगवाने का काम किया. दो-तीन महीने में जब पॉली हाउस बन कर तैयार हो गया तो शुरुआती फसल खीरा की ली जिसमे अच्छा खासा फायदा हुआ.

अगली दो से तीन फसल से मैंने बैंक का ऋण चुकाने के साथ ही पॉली हाउस को एक एकड़ से बढाकर साढ़े तीन एकड़ कर लिया और इसके बाद मैंने अपनी ट्रेनिंग का फायदा उठाते हुए डच रोज़ की खेती करने का निर्णय किया.

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आशुतोष पारीक के खेत से निकले गुलाब

2018 के मध्य में मैंने गुलाब की पहली फसल लगायी जिसका उत्पादन नवम्बर में शुरू हुआ. शादियों और नववर्ष और क्रिसमस के सीजन के चलते मार्केट में डिमांड बढ़ी जिससे मेरी कमाई में भी वृद्धि हुई. अपने खेत के गुलाब को हमने डिमांड के अनुसार अजमेर, भीलवाड़ा, जयपुर के साथ ही दिल्ली की मंडी में बेचा और औसतन एक गुलाब के फूल की कीमत 4 से पांच रुपये रहती है.

इस तरह से हमने गुलाब की फसल से नवम्बर 2018 से लेकर मार्च 2019 तक 25 लाख से ज्यादा का टर्नओवर किया और हमें लगभग आठ से दस लाख रुपये का फायदा हुआ. अभी मेरा प्लान एक लाख गुलाब के पौधे लगाने का है और इस वर्ष के अंत में खेती से एक करोड़ रुपये का टर्नओवर हासिल करने का लक्ष्य है.

आशुतोष के साथ उनके परिवार का भी योगदान रहता है और अपने खेतों पर वो 15 से ज्यादा लोगो को रोज़गार दे रहे है. खेतीबाड़ी के साथ ही आशुतोष की नज़र देश में बढ़ रहे आर्गेनिक मार्केट पर भी है और पायलेट प्रोजेक्ट के तहत जयपुर एवं सीकर से उन्होंने आर्गेनिक प्रोडक्ट्स की होम डिलीवरी करना शुरू किया है. उन्होंने जयपुर के पास ही लीज पर जमीन लेकर डेयरी फार्म लगाने की भी योजना बनाई है.

साथी किसानों से चर्चा को महत्वपूर्ण मानते है आशुतोष पारीक

आशुतोष कहते है कि खेतीबाड़ी में खूब पैसा है बशर्ते किसानों जागरूक रहते हुए मार्केट की डिमांड के अनुसार खेती करनी चाहिए. इसी के साथ अपने प्रोडक्ट्स को सही दाम दिलाने के लिए मार्केटिंग भी करनी पड़ती है. आर्गेनिक प्रोडक्ट्स का मार्केट अभी असंगठित है लेकिन हम राजस्थान और मध्यप्रदेश के 100 से ज्यादा किसानों के साथ काम कर रहे है.

बी पॉजिटिव, आशुतोष पारीक जैसे किसानों को शुभकामनाए देता है और उम्मीद करता है कि देश के अन्य किसान भी उनसे प्रेरणा लेकर अपना जीवनस्तर उठाएंगे.

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