देश में भिक्षावृति विकराल समस्या का रूप ले चुकी है. हर गली, नुक्कड़ , सड़क या चौराहे पर बच्चों से लेकर जवान और उम्रदराज भीख मांगने के लिए मजबूर है. भिक्षावृति बड़े शहरों में एक बिज़नेस का रूप ले चुकी है. देश के विभिन्न शहरों से बच्चों का अपहरण करके मेट्रो सिटीज में भीख मांगने के लिए छोड़ दिया जाता है.

ऐसे ही एक बच्चे की एक युवा से दिल्ली की सड़क पर मुलाकात होती है. इस मुलाकात के बाद उस युवक की ज़िन्दगी पलट जाती है और वो देश को बाल भिक्षावृति से मुक्त कराने के लिए निकल पड़ता है. इस युवा आंदोलनकारी का नाम है आशीष शर्मा (Ashish Sharma).

जम्मू से शुरू हुआ सफर, रामेश्वरम में होगा खत्म

दिल्ली के रहने वाले आशीष ने देश को बाल-भिक्षावृति से मुक्त करने के लिए 17000 किलोमीटर की पैदल यात्रा करने का प्रण लिया. पिछले वर्ष अगस्त से शुरू हुआ उनका सफर अक्टूबर 2019 में ख़त्म होगा.

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अपनी यात्रा के दौरान आशीष शर्मा

जम्मू के उधमपुर से शुरू हुआ उनका आंदोलन देश के 29 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों से गुजरता हुआ डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के जन्म स्थान रामेश्वरम में ख़त्म होगा.

आशीष शर्मा एक बाल-भिक्षावृति मुक्त भारत का सपना देखते हैं और अपने सपनों को पूरा करने के लिए वो कष्टदायक और लम्बी 17 हजार किलोमीटर की यात्रा पर निकले हैं.

अपने सफर में वो 10,000 से अधिक किलोमीटर की यात्रा तय कर चुके है. वो लगभग 5000 गाँवो के साथ ही शहरों को कवर करेंगे. वहां पर वो स्कूल एवं कॉलेज में जाकर बच्चों को भिक्षावृति से निकालने के साथ ही उन्हें शिक्षा से जोड़ने का काम करेंगे.

शानदार नौकरी छोड़ी, कर रहे है पैदल यात्रा ..

एक 29 साल के पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर आशीष शर्मा ने एक मल्टीनेशनल कंपनी में अपनी नौकरी छोड़ दी. ताकि वह देश की पैदल यात्रा करके भीख माँगने के लिए धकेले जाने वाले बच्चों के अधिकारों के लिए जागरूकता फैला सके.

भारतीय राष्ट्र-ध्वज, एक सामान से युक्त बैग, एक मोबाइल फ़ोन और कुछ पैसे लेकर निकले आशीष शर्मा ने अपनी यात्रा के दौरान मिलने वाले हर इंसान को ‘जय हिंद’ कहा. कई बाधाओं का सामना करने के बावजूद, आशीष सड़कों पर भीख मांगने वाले बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ने के लिए एक अनवरत चलने वाले मिशन पर आगे बढ़ रहे हैं.

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अपनी यात्रा के दौरान आशीष शर्मा

आशीष के अनुसार ” छोटे बच्चों को ज़िंदा रहने के लिए भीख माँगते देखना बहुत ही शर्मनाक है. उन्हें अपने माँ-बाप का कोई पता नहीं है. उन्होनें 9 ऐसे बच्चों को बचाया और उन्हें बाल-सुधार गृह में भेजा. उनमें से ज्यादातर बाल-अपहरण और भिक्षावृति फ़ैलाने वाले समूहों से पीड़ित थे।

वो आगे कहते है कि कई लोग बच्चों को पैसे देकर उन्हें दया का पात्र बनाते हैं। धीरे-धीरे यह बच्चे भीख मांगने के आदि हो जाते हैं। भिक्षावृत्ति को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर कोई गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे हैं, जिससे बड़ी संख्या में बच्चे भीख मांगते दिख रहे हैं।

बचपन से सामाजिक कार्यों में रही रूचि, परिवार भी करता है सपोर्ट

आशीष के मुताबिक वह 6वीं कक्षा से ही वृद्धाश्रम जा रहे हैं। इससे उन्हें अहसास हो गया कि इस समस्या की जड़ बच्चों में ही है। अगर बच्चे ही खुश नहीं होंगे तो बुजुर्ग कैसे सुखी रह सकेंगे।

6 लाख रुपये सालाना देने वाली नौकरी छोड़ने पर, आशीष को अपने परिवार वालों का विरोध भी सहना पड़ा. अपने काम के लिए दृढ-निश्चयी आशीष ने कहा कि शुरुआत में इस बात के लिए उन्हें घरवालों द्वारा अक्सर लड़ाई होती थी. लेकिन धीरे-धीरे, वो उनकी एक सपने और उद्देश्य को समझ गये और अब वो आशीष का पूरा सपोर्ट करते हैं.

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अपनी यात्रा के दौरान आशीष शर्मा

सरकार के साथ समाज की भी जिम्मेदारी . .

इस सामाजिक कार्यकर्त्ता ने सरकार में अपना विश्वास खो दिया है क्योंकि उन्हें लगता है कि उनसे अधिकार मांगना केवल बहरे कानों पर आवाज़ लगाने जैसा है. उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के सत्तर साल बाद भी हमें बच्चों के भीख माँगने के खिलाफ आवाज उठानी पड़ रही है तो ये सरकारों की विफलता ही है.

उन्हें लगता है कि समाज की भी उतनी ही ज़िम्मेदारी है जितनी कि सरकार की है. समाज के लोगों को भी आगे आकर इन शोषित बच्चों के अधिकारों की रक्षा करनी होगी.

(ये स्टोरी बी पॉजिटिव के लिए प्रकाश पांडेय ने की है)

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