अमेरिका और कनाडा में अपने प्रवास के दौरान भी भारत प्रेम हमेशा इनके दिल में रहा. उन्हें जब भी मौका मिलता वो अपने गृह क्षेत्र में आकर कुछ करने की कोशिश करते थे. समय के साथ उन्होंने गाय और आर्गेनिक खेती के बारे में रिसर्च किया. उनके रिसर्च ने उन्हें भारतीय पुरातन जीवन शैली के काफी करीब ला दिया.

उन्होंने अपने भतीजे से आर्गेनिक खेतीबाड़ी और गौ-पालन के बारे में बात की. इसी चर्चा के बाद उन्होंने बैंगलोर शहर के पास उन्होंने दस एकड़ जमीन खरीदी. आज उनके पास 80 से ज्यादा गौ धन एवं 100 से ज्यादा भेड़-बकरिया है. गाय से मिले दूध से अपने फार्म पर ही मिल्क प्रोडक्ट्स बनाकर बेचते है.

गायों को सहारा देने वाले इस प्रगतिशील चिंतक एवं किसान का नाम है बालाजी. उनके इस नेक काम में हाथ बंटा रहे है बालाजी के भतीजे: गोवर्धन .

balaji and govardhan
अपने भतीजे गोवर्धन के साथ बालाजी

बैंगलोर एयरपोर्ट के पास ही आने वाले हेग्गानहल्ली जो कि देवनहल्ली क़स्बे के अंतर्गत आता है, में बालाजी ने एक डेयरी फार्म खोला है. अमेरिका एवं कनाडा में पिछले चालीस वर्षों से काम कर रहे बालाजी मुलत: तमिलनाडु के कोयंबटूर से आते है.

पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर बालाजी ने भारतीय और अमेरिकी संस्कृति दोनों को बड़े करीब से देखा है. अमेरिका प्रवास के दौरान उन्होंने पाया कि भारत में किसानों की हालत बहुत ही चिंताजनक है. इसका सबसे बड़ा कारण वैश्वीकरण है. भारतीयों ने भारतीय संस्कृति एवं खेती पद्धति को त्याग दिया. जिसके चलते खेतीबाड़ी में उनकी लागत कई गुना बढ़ गयी.

इस विकट स्थिति से निपटने के लिए उन्होंने रिसर्च करने का फैसला किया. अपने रिसर्च में उन्होंने पाया कि भारतीय किसान अगर रसायनो एवं यंत्रो पर निर्भरता घटा दे तो उनकी स्तिथि में सुधार आ सकता है.

इसी के साथ बैल एवं गाय पालकर वो अपने खर्चे कम कर सकता है. बालाजी ने अपने खर्चे से जमीन लेकर एक गाय फार्म हाउस खोला. जिसमे उन्होंने गायों को पालने एवं उनके प्रोडक्ट्स बेचने का काम कर रहे है.

बालाजी ने बी पॉजिटिव मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को यह तकनीक एवं संस्कृति देनी होगी. शहरों में आज बोतलबंद पेय एवं दूध पदार्थों का प्रयोग बढ़ा है. बच्चों को यह मालूम नहीं है कि दूध का उत्पादन कैसे किया जाता है

cow dairy farms
बालाजी के गाय डेयरी फार्म की एक झलक

लोगों को खुद को किसान कहने में शर्म आती है. जबकि उनके बिना हमारा एक दिन भी ज़िंदा रहना मुश्किल है. वैश्वीकरण के प्रभाव ने भारतीय पद्धति एवं तकनीक की कमर तोड़ दी है. अब वो दिन दूर नहीं जब बड़े कॉर्पोरेट घराने खेती करके लाखों का मुनाफा कमाएंगे. भारत किसानों एवं गांवों का देश है. इसे बचाने की जिम्मेदारी हम सब की है.

बालाजी के इस काम में सहयोग कर रहे है गोवर्धन. गोवर्धन ने अपनी इंजीनियरिंग की पढाई के बाद खेती करने का फैसला किया. आर्गेनिक खेती का उन्हें लगभग पंद्रह साल का अनुभव है. वो अपने गांव जो कि तमिलनाडु के कोयंबटूर के पास स्तिथ है , में आर्गेनिक खेती कर रहे है.

उन्होंने बालाजी के साथ मिलकर बैंगलोर में भी गाय डेयरी फार्म खोला है. बालाजी के सान्निध्य में गोवर्धन ही इसका सारा काम काज देखते है.

गोवर्धन ने बी पॉजिटिव मीडिया को बताया कि डेयरी फार्म में 80 से ज्यादा गोधन है जिनमे तमिलनाडु के जल्लिकट्टु नस्ल के साथ ही राजस्थान से आयी गिर गाय भी है. गिर गाय को भारतीय गायों की उन्नत नस्ल माना जाता है. इसी के साथ भेड़ एवं बकरी पालन भी साथ में किया जा रहा है. पशुओं के खाने-पीने का पूरा ध्यान रखा जाता है.

गोवर्धन कहते है कि अभी हम शुरुआती चरण में है तथा आर्गेनिक विधि से उपजे चारे का उपयोग कर रहे है. गाय के दूध से दूध के साथ ही गाय का देशी घी एवं छाछ बनायीं जाती है. अभी मार्केटिंग एवं जागरूकता के अभाव में बिक्री कम है. लेकिन समय के साथ बढ़ने कि पूरी उम्मीद है.

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डेयरी फार्म में गायों की देखभाल करते है दुदाराम गुर्जर

गोवर्धन की सहायता के लिए दुदाराम गुर्जर भी अपनी टीम के साथ लगे हुए है. मुलत: राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के आसींद क्षेत्र से आने वाले दुदाराम गायों का सारा काम देखते है. उन्होंने ही बालाजी को गिर नस्ल के बारे में बताया और गाय का डेयरी फार्म खोलने के लिए प्रेरित किया . दुदाराम गायों का दूध निकालने से लेकर उनके पुरे प्रबंधन का जिम्मा सँभालते है.

इस डेयरी फार्म में कही पर भी मशीनों से काम नहीं किया जाता है. गायों से दूध दुहने से लेकर घी बनाने तक का काम मनुष्यों से ही किया जाता है . अभी यह डेयरी फार्म शुरुआती चरण में है. लेकिन आने वाले समय में गौ-रक्षा एवं सरंक्षण में मील का पत्थर साबित होगा.

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