IAS अधिकारी रहते हुए इन्होने नयी दिल्ली का कायाकल्प कर दिया और रिटायरमेंट के बाद भाजपा की तरफ से चुनाव लड़ते हुए केंद्रीय पर्यटन मंत्री की कुर्सी पर जा बैठे । ये कोई इत्तेफाक या किस्मत नहीं है बल्कि उन्होंने सफलता की कहानी अपने धैर्य एवं पसीने की बूंदो से लिखी है । हमने बहुत सारी कहानियाँ सुनी है जिनमे बच्चा एक घटना के बाद पूरा बदल जाता है और फिर वो दुनिया पर राज करता है । बचपन की इन्ही कहानियों से मिलती जुलती कहानी है भारत सरकार के केंद्रीय पर्यटन मंत्री अल्फोंस कन्नथानम (Alphons Kannanthanam) की ।

इनकी ज़िन्दगी किसी फिल्म या रोचक कहानी से कम नहीं है, दसवीं तक क्लास का सबसे बुध्दू बच्चा, जिसके बारे में उसके शिक्षक भी मान लेते है कि वो दसवीं उत्तीर्ण नहीं कर पायेगा और पुरे स्कूल में  उसके फ़ैल होने तक की बात होती है । वहीँ बच्चा अगले कुछ सालों में भारत की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा IAS का टॉपर बन जाता है ।

कलेक्टर रहते हुए केरल के कोट्टायम जिले को देश का पहला पूर्ण साक्षर राज्य बना देता है और अपने रिटायरमेंट के बाद राजनीती में उतर कर निर्दलीय खड़ा होकर बड़े अंतर से जीत दर्ज करके प्रभावशाली विधायक बन जाता है ।

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प्रदेश की राजनीती के बाद वो राष्ट्रीय राजनीती में पहुंचते है और केरल और देश के बीजेपी के कद्दावर नेता बन जाते है और अपनी काबिलियत के दम पर पर्यटन मंत्रालय जैसा मुख्य विभाग के मंत्री बन जाते है ।

ऐसी ही कुछ फ़िल्मी कहानी है अल्फोंस कन्नथानम (Alphons Kannanthanam) की जो अभी राज्यसभा के चुनाव राजस्थान से लड़ चुके है । केरल में बीजेपी को मजबूत बनाने में अल्फोंस कन्नथानम का महत्वपूर्ण योगदान रहा है और वामपंथियों के गढ़ में अब बीजेपी को भी उम्मीद नजर आने लगी है ।

अल्फोंस कन्नथानम (Alphons Kannanthanam) का जन्म 8/8/1953 को भारत के केरल राज्य के कोट्टायम जिले के मणिमाला नाम के ऐसे गांव में हुआ जिसके लिए बिजली भी उपलब्ध नहीं थी । उनके पिता द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग ले चूके थे और युद्ध के बाद स्कूल शिक्षक बन गए थे। उनके माता-पिता के नौ बच्चे थे; उन्होंने अनाथालय से दो बच्चो को अपनाया,जिससे उनके कुल 11 भाई -बहन हो गए थे । बचपन में सामान्य विद्यार्थी रहे अल्फोंस कन्नथानम की ज़िन्दगी को एक घटना ने बदल दिया और उसके बाद उन्होंने मेहनत के दम पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया ।

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उस घटना के बारे में अल्फोंस कन्नथानम ने एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि दसवीं में पढ़ते समय स्कूल प्रिंसिपल ने उसके माता-पिता को स्कूल बुलाया और बताया की उनका बच्चा दसवीं पास नहीं हो सकता । यही बेइज़्ज़ती किशोर अल्फोंस कन्नथानम के दिल में घर कर गयी और उन्होंने खूब मेहनत और लगन से पढ़ने की ठान ली ।

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ये तस्वीर Alphons Kannanthanam की वेबसाइट से ली गयी ।

वो दिन और आज का दिन, अल्फोंस कन्नथानम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज देश के सबसे प्रभावशाली लोगों में उनकी गिनती होती है । अपनी राजकीय सेवा के दौरान भी अल्फोंस कन्नथानम को सादगी एवं ईमानदारी की मूरत माना जाता था । कड़क और ईमानदार छवि के कारण ही उन्होंने पहले केरल के कोट्टायम को अशिक्षा से मुक्त करवाकर देश का पहला शत-प्रतिशत साक्षर राज्य बनवाया ।

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दिल्ली में दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) का आयुक्त रहते हुए उन्होंने दिल्ली के विकास के लिए कई कार्यों में सहयोग दिया । दिल्ली को अतिक्रमण से मुक्त करवाने में उनकी मुख्य भूमिका रही और लगभग 10,000 से ज्यादा इमारतों को ध्वस्त कर दिया ।

रिटायरमेंट के बाद अल्फोंस कन्नथानम ने वकालत करने की ठानी और राजनीती के साथ वो वकालत भी कर रहे है । कई पत्रिकाओं के कवर पेज में आ चुके अल्फोंस कन्नथानम एक अच्छे लेखक भी है और लगातार विभिन्न समाचार-पत्रों में उनके लेख छपते रहते है । कन्नथनम को 1994 के टाइम्स मैगजीन में शीर्ष 100 यंग ग्लोबल लीडर्स की लिस्ट में भी जगह मिली थी ।

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एक अच्छे वक्त के साथ ही अल्फोंस कन्नथानम ने शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और शिक्षा विभाग में कार्य करते हुए उन्होंने प्राइवेट क्षेत्रों को भी शिक्षा में निवेश करने का मौका दिया जिससे केरल का शिक्षा स्तर भारत में सबसे अच्छा हो गया ।

अल्फोंस कन्नथानम ने “Making a Difference” नाम से एक पुस्तक का लेखन किया है जिसका हिंदी समेत विभिन्न स्थानीय भाषाए जैसे मलयालम और तमिल में भी अनुवाद हुआ है । जन भागीदारी एवं सहयोग बढ़ाने के लिए उन्होंने “जनशक्ति” नाम के NGO की स्थापना की जो शोषित वर्ग को न्याय एवं अधिकार दिलाने के लिए काम करता है ।

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एक बुद्धू बच्चे से रॉकस्टार बनने वाले अल्फोंस कन्नथानम की जीवन गाथा बहुत ही प्रेरणादायी है । अल्फोंस कन्नथानम ने सिद्ध किया कि सकारात्मक रह कर कैसे जीवन की मुसीबतों से पार पाया जा सकता है और सफल होने के लिए मेहनत के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होता है ।

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