शिक्षा में सबसे ज्यादा ताकत होती है, जिससे पूरी दुनिया को बदला जा सकता है. (Akshar Forum school)

यह पंक्तियाँ असम के गुवाहाटी में संचालित एक स्कूल के लिए सटीक बैठती है. शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान से न जोड़कर स्किल्स पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है. बड़ी क्लास के बच्चे अपने से छोटी क्लास के बच्चों को पढ़ाते है जिससे छोटे बच्चों को पढ़ने में समस्या नहीं आती है.

आसपास के वातावरण को साफ़ रखने के लिए फीस के तौर पर प्लास्टिक का कचरा लिया जाता है जिसे रीसायकल करके या प्रोडक्ट बनाकर दुबारा इस्तेमाल किया जाता है. खदान में काम करने वाले गरीब बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहा है ‘अक्षर फाउंडेशन (Akshar Foundation)‘. अक्षर फाउंडेशन की शुरुआत की है पारमिता शर्मा (Parmita Sarma) और मज़ीन मुख्तार (Mazin Mukhtar) ने.

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बच्चो के साथ पारमिता शर्मा  | Photo Credits : Parmita Sarma’s Facebook Profile

पारमिता और मज़ीन ने मिलकर जून 2016 में अक्षर फोरम (Akshay Forum School) की शुरुआत की. शुरू में केवल 20 बच्चे आये थे और उनके घरवालों को बच्चों की पढाई के लिए मनाना कठिन काम था क्योंकि यह बच्चे खदान में काम करके आजीविका चला रहे थे. इसके चलते उन्होंने एक नयी योजना शुरू की जिसे टॉय मनी (Toy Money) के रूप में जाना जाता है.

इस योजना के जरिये बड़ी क्लास के बच्चे छोटी क्लास के बच्चों को पढ़ाते है और उन्हें होमवर्क करवाने में मदद करते है. इसके बदले बड़े बच्चों को कुछ पैसा दिया जाता है जिसका इस्तेमाल वो अपने व्यक्तिगत खर्चे के लिए कर सकते है. इस योजना के कई फायदे हुए.

toy money scheme
स्कूल के बड़े बच्चे पढ़ाते है छोटे बच्चों को | Photo Credits : Akshar Foundation’s Facebook Page

बच्चों को पैसा मिलता है जिससे वो अपना खर्चा निकाल सकते है. इसके साथ ही छोटे बच्चों को पढ़ाने से उनके अंदर आत्मविश्वास का भाव आता है. ज्यादात्तर छोटे बच्चे गरीब एवं अशिक्षित परिवारों से आते है तो उन्हें घर की बजाय स्कूल में ही पढ़ने में मदद मिल जाती है.

बी पॉजिटिव इंडिया से बातचीत में पारमिता शर्मा कहती है कि स्कूल में ही छोटे बच्चों का ख्याल रखा जाता है क्योंकि इन्हे घर पर पढ़ाने वाला कोई नहीं होता है. इससे बड़े बच्चे लीडरशिप के साथ ही टीचिंग के गुण भी सींखते है और बदले में उन्हें कुछ पैसा दिया जाता है जिससे वो कपड़े, जुत्ते या कोई अन्य वस्तु खरीद सकते है.

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स्कूल में शतरंज की बाजी खेलते हुए बच्चे  | Photo Credits : Akshar Foundation’s Facebook Page

देश के बच्चों को शिक्षित करने के उद्देश्य से मैंने और मज़ीन ने 2013 में असम के ही लखीमपुर में पढ़ाना शुरू किया लेकिन उस स्कूल के जरिये हम ज्यादा बच्चो तक पहुँच नहीं बना पा रहे थे. इसके बाद हमने गुवाहाटी के पामोही इलाके में गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए जून 2016 में ‘अक्षर फोरम(Akshar Forum School)’ की शुरुआत की.

शुरुआत में हमारे पास 20 बच्चे थे जिनमे से अधिकांश बच्चे खदानों में काम करते थे. इनके माता-पिता को समझाना हमारे लिए बड़ा कार्य था. इसके लिए हमने टॉय मनी की शुरुआत की जिससे बच्चों के मन में आत्मनिर्भरता का भाव आ सके. इसके बाद हमने स्कूल को किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रखा बल्कि बच्चों को स्किल्स में पारंगत करना शुरू किया.

स्कूल में पढाई के साथ बच्चों की वोकेशनल ट्रेनिंग पर खास ध्यान दिया जाता है. ट्रेनिंग के जरिये बच्चों को टीचिंग, सिंगिंग, डांस, आर्ट एंड क्राफ्ट, खेलकूद एवं छोटे-मोटे काम करना सिंखाया जाता है. बच्चे पढाई के साथ ही अन्य कार्यों में भी रूचि लेते है जिससे उनके व्यक्तित्व का निर्माण होता है.

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बच्चों को सोलर पैनल का काम भी सिंखाया जाता है | Photo Credits : Akshar Foundation’s Facebook Page

पारमिता आगे बताती है कि हमने बच्चों को प्लास्टिक कचरा घर से लाने के लिए कहा था. शुरू में कुछ बच्चे लाते थे और कुछ नहीं लाते थे. इसके चलते हमने बच्चों को सप्ताह में 25 बैग प्लास्टिक कचरा लाना अनिवार्य किया.

इसके चलते दो फायदे हुए, पहला : बच्चों के घरों के आसपास प्लास्टिक कचरा कम होने लगा जिससे पर्यावरण का नुकसान भी बहुत हद तक कम हुआ. दूसरा : इकट्ठे किये गए कचरे से हम इको-ब्रिक्स बनाते है जो हमारे स्कूल के निर्माण कार्य में काम आती है. इन इको-ब्रिक्स से हमने दीवार बनाई है और अब हम मजबूत रास्ता बना रहे है जिससे कि बरसात के समय बच्चों को ज्यादा दिक्कते न हो.

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प्लास्टिक वेस्ट से बनायीं गयी दीवार | Photo Credits : Akshar Foundation’s Facebook Page

पारमिता का जन्म मुंबई में और लालन-पालन असम में हुआ और उन्होंने गुवाहाटी स्थित टाटा इंस्टिट्यूट फॉर सोशल साइंस (TISS ) से मास्टर्स किया है जबकि मज़ीन ने न्यूयार्क से है . मज़ीन ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेरीलैंड से इंजीनियरिंग की पढाई बीच में ही छोड़कर शिक्षा क्षेत्र में काम करना शुरू कर दिया.

मज़ीन मानते है कि अच्छी कॉलेज एवं शिक्षा केवल कुछ लोगो तक ही सीमित हो गयी है क्योंकि महँगी फीस देना सब के बस की बार नहीं है. गरीब बच्चों को शिक्षा के साथ ही स्किल्स सींखाने के लिए अपना शानदार करियर छोड़कर मज़ीन भारत आ गए.

अक्षर फोरम (Akshar Forum school)‘ में अभी 100 से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे है और बारहवीं तक की पढाई करवाई जाती है. बच्चों को पढ़ाने के लिए छह शिक्षक है. बच्चों को पढाई के साथ ही स्कूल में सिंगिंग, डांसिग, सोलर पैनेलिंग, गार्डनिंग, ऑर्गेनिक फार्मिंग, कारपेंटर, कॉस्मेटोलॉजी, इलेक्ट्रोनिक्स और रिसाइक्लिंग के कोर्स करवाए जाते हैं. अक्षर स्कूल में एडमिशन के लिए पारंपरिक स्कूलों की तरह कोई उम्र की सीमा तय नहीं की गई है.

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अक्षर फाउंडेशन की टीम के साथ मज़ीन  |  Photo Credits : Akshar Foundation’s Facebook Page

पारमिता बताती है कि अक्षर फोरम (Akshar Forum school) के मॉडल की सफलता के बाद हम मोटिवेशन फॉर एक्सीलेंस (Motivation For Excellence) के साथ मिलकर दिल्ली सरकार के प्राइमरी स्कूल में काम कर रहे है. दिल्ली के बच्चों को भी अक्षर फोरम की तरह बड़े बच्चों के माध्यम से छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए तैयार कर रहे है. हमारा मकसद अगले कुछ सालों में ऐसे 100 स्कूल से जुड़ने का है और सभी बच्चों के शिक्षित होने तक यह मिशन चलता रहेगा.

अक्षर फाउंडेशन‘ के साथ कई शिक्षाविद एवं सामाजिक कार्यकर्ता जुड़े हुए है. अक्षर फाउंडेशन से आयल इंडिया लिमिटेड (Oil India Limited), ओएनजीसी (ONGC), बुक माय शो , TISS , यूनाइटेड नेशन, मोटिवेशन फॉर एक्सीलेंस साथ ही कई नामी-गिरामी संस्थाए जुड़ी हुई है.

Donation to Akshar Foundation and Akshar Forum school
आप भी अक्षर फाउंडेशन की मदद कीजिये | Photo Credits : Akshar Foundation’s website

अगर आप भी ‘अक्षर फाउंडेशन‘ की मदद करना चाहते है तो यहाँ क्लिक करे !

बी पॉजिटिव इंडिया, पारमिता और मज़ीन के साथ ही ‘अक्षर फाउंडेशन‘ की पूरी टीम के कार्यों की प्रशंसा करता है. हम उम्मीद करते है कि आपके कार्यों से प्रेरित होकर देश के हर बच्चे को शिक्षा के साथ ही हुनर भी सिंखने को मिलेंगे.

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