पैसे से अमीर बनने की कोशीश मत करो, दिल से अमीर बनने की कोशिश करो !

यह पंक्तियाँ एक डॉक्टर को समझने में लगभग पंद्रह साल लगे. महाराष्ट्र से लेकर अमेरिका तक काम किया. समाज में इज़्ज़त के साथ ही पैसा था लेकिन जब खुद को खंगाला तो खुद से ज्यादा गरीब कोई नहीं दिखा. इसके बाद इंटरनेशनल आर्गेनाइजेशन के पद से इस्तीफा दिया और समाज के गरीब एवं जरूरतमंद लोगो के लिए काम करना शुरू कर दिया. धार्मिक स्थानों और सड़क एवं फुटपाथ पर जीवन बिताने वाले लोगो और खासकर वृद्धजनों को न केवल मेडिकल सहायता बल्कि आर्थिक सम्बल प्रदान करने की कोशिश कर रहे हैं. डॉक्टर्स से भिखारियों के डॉक्टर बने इस शख्स का नाम हैं डाॕ. अभिजीत सोनवणे (Dr Abhijit Sonawane).

डाॕ. अभिजीत सोनवणे अपनी पत्नी डॉ. मनीषा सोनवणे के साथ मिलकर महाराष्ट्र के पुणे शहर में ‘सोहम ट्रस्ट (Soham Trust)‘ नाम से संस्था चलाते हैं जो कि सड़क एवं फुटपाथ पर सोने वाले लोग और भीख मांगकर अपना गुजारा करने वाले वृद्धजनों की सहायता करती हैं. सड़क पर ही मेडिकल चेक-अप के साथ ही गंभीर बीमारियों के लिए अस्पताल में एडमिट करवाकर के इलाज करवाते हैं. वृद्धजनों को भीख मांगने की जगह-जगह छोटे-मोटे काम करने के लिए प्रेरित करते हैं. अब-तक वो 50 से ज्यादा वृद्धजनों को आत्म-निर्भर बना दिया हैं.

2015 में पुणे शहर से शुरू हुई यह संस्था अब तक हज़ारो लोगो के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला चुकी हैं. पश्चिमी सभ्यता के चलन के कारण कई बुजुर्गों को अपने बुढ़ापे में संघर्ष करना पड़ता हैं और घर से निकाल दिया जाता हैं. उम्र के इस पड़ाव में वृद्धजनों को सहारे की जरूरत होती हैं लेकिन अक्सर उन्हें हीन भावना से देखा जाता हैं. वृद्धजनों की इसी समस्या को हल करने के लिए ‘सोहम ट्रस्ट’ एक सकारात्मक कोशिश कर रहा हैं.

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मरीजों के साथ डॉ. मनीषा सोनवणे | तस्वीर साभार :इंटरनेट

बी पॉजिटिव इंडिया से बातचीत के दौरान डाॕ. अभिजीत सोनवणे बताते हैं कि लोग मुझे ‘भिखारियों का डाॕक्टर‘ बोलते है और मै खुद को डाॕक्टरों में से एक भिखारी बोलता हुँ. हम आम खाते है. नीचोड-नीचोड कर उसके रस का आनंद लेते हैं. लेकिन बाद में बचती है एक गुठली. उसे हम कचरे के डिब्बे में फेंक देते है. हम भुल जाते है कि ये गुठली भी कभी मिठी हुआ करती थी. उसमे भी रस था. फिर भी रस निकालने के बाद उस गुठली की कोई कीमत नही होती हैं.

ठीक यही हालत आजकल के बुजुर्गों की हैं. उनमे भी जीवन का अपार रस भरा हुआ था. उनके बेटे और बहुओं ने उनका पुरा रस निचोडा और जब उनकी गुठली बन गयी तब फेंक दिया कचरे के डिब्बे में. हम हमारे संस्थान की मदद से इन गुठलियों को कचरे के डब्बे से उठाते है, साफ करते है, वापस जमीन में बोने की कोशिश करते है, ताकि उस अधमरी गुठली से वापस एक मीठा आम का पेड उग जायें !

डाॕ. अभिजीत सोनवणे आगे बताते हैं कि 1999 में मुझे डाॕक्टर की डिग्री मिली. माँ बाप ने संघर्ष करके पढाया और परिवार में दो और भाई बहन की पढाई भी उन्हे देखनी थी, इसलिये सोचा कि अब घर से कुछ नही मांगेंगे. अपने बलबुते पर ही कुछ करेंगे ! सोच तो लिया, मगर मेरे पास डिग्री के अलावा कुछ नही था. एक झोपड-पट्टी में कम से कम किराये पर एक शेड लिया और दवाखाना शुरु किया. लेकिन सुविधाओं के अभाव में मरीज नहीं आते थे.

मैंने घर-घर जाकर इलाज करना शुरू किया लेकिन लोग इलाज करवाने के बजाय घर से भगा देते थे. दिनभर की दौड़भाग के बाद भी मुश्किल से पचास रुपये जमा कर पाता था. धीरे-धीरे परेशान होने लगा. गांव के एक मंदिर में एक कोने में मै बैठ जाता था और पैसा कमाने के बारे में सोचता लेकिन हर कोशिश नाकामयाब.

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मरीजों के साथ डॉ. मनीषा सोनवणे | तस्वीर साभार :इंटरनेट

धीरे धीरे मैं परेशान होने लगा . .

उसी मंदिर के बाहर एक बाबा भी बैठते थे, लोग उन्हें भिखारी समझते थे. एक दिन मुझे उन्होंने पुछा, क्या हुआ बेटा ? मैने रोते-रोते सब कुछ बता दिया. उन्होंने मेरा हाथ थामकर बोला कि ये दिन भी गुजर जायेगा बेटा, बस धीरज रख ! हमेशा के लिये कुछ रहता नही. ये सब बदलने वाला है.

उस दिन से हमारी दोस्ती हो गयी, धीरे धीरे मुझे पता चला, बाबा ने अच्छी पढाई-लिखाई की थी. दो हाॕटेल के मालिक थे लेकिन उनके भाईयों ने मिलके सब कुछ हड़प लिया था, तबसे वो रस्ते पर आ गये और 80 साल की इस उम्र में मंदिर में भिखारी की तरह बैठते थे.

उनका तो कोई नही था, मेरे सब थे, फिर भी मेरा कोई नही था. अपने आप हम दोनों मे एक रिश्ता तैयार होने लगा. धीरे-धीरे वो मुझे बेटा ही समझने लगे ! मै हमेशा उनको पुछता था, बाबा पैसे कमाने के कुछ तरीके बताओ ना ? मेरी कोई भी बात पैसे पर ही आकर रुकती थी.

वो हंसकर बोलते थे. पैसे से अमीर बनने की कोशिश मत करो, दिल से अमीर बननेकी कोशिश करो.
अच्छा इन्सान बनना सबसे बडी अमीरी है. अच्छा इन्सान बनोगे तो हर चीज अपने आप पीछे आयेगी. उस वक्त ये बात मुझे हजम नही होती थी. बाबा इसके साथ ही जीवन की कड़वी सचाइयों के बारे में बताते थे. यह सब बाते, मेरे “कान” तक तो पहुंचती थी, लेकीन “समझ” मे नही आती थी.

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मरीजों के साथ डॉ. मनीषा सोनवणे | तस्वीर साभार :इंटरनेट

एक साल इसी तरह गुजरा और बाबा ने मुझे इंसान बनाने की भरसक कोशिश की लेकिन मेरा दिमाग हमेशा पैसा कमाने में ही लगा रहा. एक दिन न्यूज़पेपर में डॉक्टर के बारे में इश्तिहार निकला और मैंने नौकरी के लिए आवेदन कर दिया. किस्मत कहो या संयोग मुझे वो नौकरी मिल गयी. इसके बाद वो गांव छोड़कर मैं पुणे शहर में आ गया. नौकरी के बाद मैने उस गांव मे जाना बंद किया, बाबा के साथ मेरी मुलाकाते रुक गयी.

आते वक्त आखिर में मैने उनको पुछा था, बाबा आपने मुझ पे इतने उपकार किये है, मै आपके ये ऊपकार वापस कैसे करुँ ?

बाबा बोले थे, बेटा किसी ने कभी मेरी मदद की थी, मै उनकी मदद वापस ना कर सका, इसलिये उनका रुप तुझमें देखकर मैने तुम्हारी मदद की, तुम भी मुझे कुछ वापस मत करो. कुछ करना है तो दुसरे की मदद करो. ये एक गेम है जिसे Game of Support कहते है. लेकिन , सिर्फ दो लोग इस गेम को खेले तो मजा नही है. मजा तो तब है, एक दुसरे की मदद करके सभी “लोग” एक-साथ यह गेम खेलें. मैने सब सुना पर समझा नही या फिर समझना नही चाहता था !

समय का चक्र चला और कड़ी मेहनत के दम पर तीन सालों में ही तरक्की कर ली. अब मै इंटरनॅशनल आॕर्गनायझेशन में काम करने लगा. कुछ ही समय में इस संस्था का महाराष्ट्र इंचार्ज बन गया.

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मरीजों के साथ डॉ. मनीषा सोनवणे | तस्वीर साभार :इंटरनेट

1 लाख महीने की सॕलरी, खुद के क्लिनिक से 1लाख और बीवी की कमाई 1 लाख. महीने के तीन लाख तो ऐसे ही कमाने लगा. अब ये चोर उचक्का जैसे दिखने वाला आदमी अचानक साहब और सर बन गये, जो लोग देखके नाक मरोड के रास्ता बदलते थे, वही लोग नाक मेरी अपाॕंईंटमेंट मांगने लगे. जिसने कभी भिखारियों का खाना खाया था, उसे लोग फाईव्ह स्टार हाॕटेल मे खिलाने लगे.

ऐसे ही 15 साल गुजरें. 2000 से लेकर के 2015 तक. मैने हर वो चीज हासिल की, जो पैसे से मिल सकती है. आॕफिस के काम की वजह से आधी दुनिया देख ली. एक दिन आॕफिस ने मुझे हेड आॕफिस अमेरिका भेजा. क्या ताम झाम ? क्या हाॕटेल ? क्या मेरी गाडी ? कितना सम्मान ! मै सातवे आसमान पर था लेकिन उस होटल में आराम करते हुए जीवन की सचाई से रूबरू हो गया.

रूम में बैठे-बैठे मुझे गांव के वो बाबा याद आये जिन्होंने मुझे खाना खिलाया और जरूरत पड़ने पर पैसे भी दिए लेकिन 15 सालो में एक बार भी याद नही किया मै ने ?

क्या हुआ उस Game of Support का ? ये खेल तो मैने कभी खेला ही नही ! बाबा अभी ज़िंदा हैं या नहीं वो भी मुझे नहीं पता. मेरा आज उस दिन मर गया लेकिन बाबा का बनाया इंसान उस दिन ज़िंदा हो गया.

Dr Manisha Sonawane Soham trust
मरीजों के साथ डॉ. मनीषा सोनवणे | तस्वीर साभार : Milaap

देश वापस आने के बाद बाबा को ढुंढा, वो कही नही मिले. फिर पता चला मेरे जाने के एक साल बाद ही उनका सड़क पर देहांत हो गया, दो दिन बाॕडी वही पडी थी, फिर सरकारी लोग आये, और बाॕडी उठाके लेकर गए.

जिसने मुझे अपना सब कुछ दिया, उस बाबा को मै अपना एक कंधा भी न दे सका. इतना पैसा था मेरे पास. फिर भी मै कभी उनकी लाठी न बन सका. पुरा पैसा खर्च करके भी एक लाठी खरीदने की हैसीयत नही रही मेरी. औकात नही रही !

बाबा की सभी बातें जो पहले सुनी थी अब जाकर समझने आने लगी. जहन में उतरने लगी. कैसे चुकाउंगा मै बाबा का कर्ज ? बाबा तो गये ! उसी मंदिर मे बैठकर मै सोच रहा था कि बाबा गये तो क्या हुआ ? ऐसे ना जाने कितने बाबा और होंगे. जिनको जरुरत है. इस समाज के कीचड़ से उठाने की. गुजरे हुए बाबा का रुप, हर उस बाबा मे देखुंगा, जो अभी भी कीचड़ में सने हुए पड़े है.

उन सभी बाबा को मदद करुंगा, जिनका कोई अपना नही है. मै कर्जा चुकाऊंगा, अपने तरीके से. अब मैं खेलूंगा “Game of Support”. और इस तरह जन्म हुआ ‘भिखारियों के डॉक्टर‘ के विचार का .

इस तरह मैंने 15 अगस्त 2015 को इंटरनेशनल आर्गेनाइजेशन के पद से इस्तीफा दे दिया. 16 अगस्त से इस मुहिम की शुरुआत हुई. Game of Support नाम के इस खेल में नियम कानून मालूम नहीं थे. फिर भी समय के साथ कुछ बाते पता चली.

Dr Abhijit Sonawane with patient
मरीजों के साथ डॉ. अभिजीत सोनवणे | तस्वीर साभार : Milaap

जैसे हम किसी को अपॉइंटमेंट देते है ठीक उसी तरह से भगवान को भी दिनों में बांट दिया.जिस दिन, जिस भगवान का दिन, उस दिन भक्तगणों की संख्या ज्यादा. जहां भक्त ज्यादा, वहां भीख मांगने वालों की भी भीड ज्यादा!

मैने इस सच्चाई का फायदा उठाया. मै और मेरी पत्नी डाॕ. मनिषा मंदिर, मस्जिद, चर्च के बाहर रुकते है. एक साथ कम से कम 40-50 भीख मांगने वाले बुजुर्गों से हमें मिलते है. हम उनके साथ घुलमिल जाते है. सड़क पर ही दवा देते है, ड्रेसिंग करते है. रक्त और मूत्र की जाँच करते है. किसी को कृत्रिम पैर देते है तो किसी को बैशाखी. हम रोज सुबह 10 से लेके 4 बजे तक सोमवार से शनिवार तक यह कार्य करते है.

जो सेवा हम सड़क पर नही दे सकते जैसे कि ऑपरेशन, सोनोग्राफी, X Ray के लिए लोगों को हाॕस्पिटल में एडमिट करके इलाज करवाते. जो बेसहारा बुजुर्ग फुटपाथ पर सालों-साल पड़े है, उनको नहलाकर के वृद्धाश्रम में भेजते है.

उम्र के इस पड़ाव में बुजुर्ग लोग अपना नाम, पता कुछ सब भुले होते है. ऐसे लोगों को हम अच्छा सा नाम देते है और उनके नाम के पीछे हमारा ही सरनेम लगाते है. 15 बुजुर्ग हमारे नाम लगाकर बची हुयी जिंदगी आराम से जी रहे है.

Dr Abhijit Sonawane during Treatment
सड़क पर इलाज करते डॉ. अभिजीत सोनवणे | तस्वीर साभार : Milaap

समाज में ऐसी प्रथा है कि माँ बाप अपने बच्चे का नाम रखते हैं लेकिन हमारे संस्थान में उलटा सिस्टम चलता है. यहां हम अपने माँ बाप को नाम देते है. हमारे यहाँ कुल 850 बुजुर्ग रजीस्टर्ड है और समय-समय पर हम इनको फ्री मेडिकल सर्विसेज देते है.

पहले तो लग रहा था कि हम अच्छा कुछ कर रहे है, पर समय के साथ ऐसे लगने लगा की सिर्फ मेडिकल सर्विस फ्री देना ही एकमात्र ही हल नहीं हैं. समाज में इन बुजुर्गों का भी कोई स्थान होना चाहिये. लेकिन भीख मांगने वालों को स्थान कौन देगा ? इज्जत कौन देगा ?

अब ये हासिल करना हो तो इन बुजुर्गों को भीख मांगने से रोकना होगा. हां… मगर कैसे… ?

मेडिकल सर्व्हिस देते हुये इन बुजुर्गों के साथ हमारा अच्छा रिलेशन बन जाता है, कोई मुझे बेटा समझता है, कोई पोता, कोई मनिषा को बेटी समझता है, कोई बहु ! हम इस रिलेशनशीप का फायदा उठाते है…

किसी माँ का हाथ-हाथ मे लेकर बोलते है. माई अब तु मुझे बेटा मानती है, बाबा : आप मुझे पोता बोलते हो. अब आपका बेटा और बहु डाॕक्टर है तो, हमारे होते हुये भीख मांगना आपको शोभा देता है ?

Doctors of beggars treatment
सड़क पर इलाज करते डॉ. अभिजीत सोनवणे | तस्वीर साभार : Milaap

अगर आप ये भीख मांगना छोड़ देंगे तो जिंदगी भर हम आपके बनकर रहेंगे. लेकिन आपको भीख ही मांगनी है तो मनिषा और मुझे आप भुल जाओ !

बैठ के भीख मांगते हो तो बैठके फुल बेचो, हम आपको फुल देंगे. बैठकर सब्जी बेचो, हम आपको सब्जी देंगे. बैठकर बुट पाॕलिश करो, हम सामान देंगे. बैठकर शेव्हिंग करो, हम सामान देंगे. ATM केबीन के बाहर बैठकर वाॕचमन का जाॕब करो, मै नौकरी ढुंढता हुँ. सोसायटी के गेट पर बैठकर वाॕचमन का जाॕब करो, मै नौकरी ढुंढता हुँ. बच्चे संभालने का जाॕब करो. मै नौकरी ढुंढता हुँ.

हाथ पैर नही है ? वजनकाटा देता हुँ, लोग वजन करके पैसा आपको देंगे. पैर नही है ? हाथ अच्छे है ? चलो, व्हिलचेअर देता हुँ, हाथ से सायकल चलाओ, सायकल पर रुमाल / स्कार्फ जैसी चीजे बेचो.

जो लोग सच में भीख मांगना छोड़ना चाहते है, वो हमारे गले लगकर, हमारा हाथ पकड़ते है. हमारा साथ देते है. हम उन सभी को व्यवसाय शुरु करने में हर चीज की मदद करते है.

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मरीज के साथ डॉ. अभिजीत सोनवणे और डॉ. मनीषा सोनवणे | तस्वीर साभार : Milaap

यह बताने में हमें गर्व है कि 16 आॕगस्ट 2015 से लेकर के मई 2019 तक 54 बुजुर्ग को व्यवसाय शुरु करने में मदद की है ! हर किसी को एक माँ और एक ही बाप होता है. मुझे बताने में खुशी है कि मेरे कम से कम 200 बाप है, उससे भी ज्यादा माँए है, उतनी ही दादी है. इस उमर में कम से कम 100 बच्चे है मेरे. दुनिया का सबसे अमीर इन्सान मैं हुँ !

दुख बस इस बात का है कि मेरी ये फॕमिली फुटपाथ पर ही रहती है. चाहे धुप हो, चाहे ठंड. जीते भी वहीं है, मरते भी वहीं. हमेशा के लिये इस समस्या का हल निकाल पाऊँ तो बाबा का कर्ज शायद कुछ कम हो जाये.

पहले मै बहुत सोचता था, जिंदगी की शुरुआत में मै बॕग लेके घुमता था तो लोग मुझे चोर समझते थे, कुत्ते पीछे पडते थे, लोग मुझे जोकर कहकर बुलाते थे. आज भी मै पुना के रोड पर गलीयों मे बॕग लेके घुमता हुँ, मगर कोई मुझ पर हँसता नही, कुत्ते पीछे नहीं पड़ते हैं. कोई मुझे जोकर कहकर नहीं चिढाता हैं.

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डॉ. अभिजीत सोनवणे एक कॉन्फ्रेंस के दौरान | तस्वीर साभार : YourStory

उल्टा लोग अब सम्मान देते है. 500 से भी ज्यादा अॕवाॕर्ड मिले, आते जाते लोग प्यार से दुआ देते है. हाथ चुमते है. लोग मुझसे पुछते है. डाॕक्टर, आप रोज मंदिर मस्जिद में जाते हो, आप किसकी पुजा करते हो ? सच कहुं… मुझे मेरा अल्लाह, भगवान, यीशु , मंदिर और मस्जिद के बाहर ही मिल जाता है.

मेरे कान में स्टेथोस्कोप होता है. किसी बुजुर्ग को चेक करते समय मुझे ऐसा लगता है कि मै कोई आरती कर रहा हुँ. उनको मेडिसीन देता हुँ तो लगता है कि भगवान को प्रसाद चढा रहा हुँ. प्यार से बजुर्ग हमारे सरपर हाथ रखते है, दुआ देते है, तो लगता है कि भगवान नीचे आकर के खुद आशिर्वाद दे रहे है.

अब आप ही बताओ, मुझे भगवान पाने के लिये और कहां जाने की जरुरत है….???

अगर आप भी डाॕ. अभिजीत सोनवणे या सोहम ट्रस्ट से संपर्क करना चाहते हैं तो यहाँ क्लिक करे !

बी पॉजिटिव इंडिया, डाॕ. अभिजीत सोनवणे और सोहम ट्रस्ट के कार्यों की सराहना करता हैं और भविष्य के लिए शुभकामनाए देता हैं.

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